वाराणसी की दो बालिग युवतियों के समलैंगिक और अंतरधार्मिक (हिंदू और मुस्लिम) लिव-इन संबंध को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी स्वेच्छा से साथी चुनने, अपनी स्वायत्तता बनाए रखने और सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में व्यतीत करने का पूर्ण और मौलिक अधिकार प्राप्त है।

क्या है पूरा मामला?

मामला वाराणसी की रहने वाली दो बालिग और शिक्षित युवतियों से जुड़ा है। दोनों में से एक हिंदू और दूसरी मुस्लिम समुदाय से है। दोनों अपनी स्वतंत्र इच्छा से एक-दूसरे के साथ लिव-इन संबंध में रह रही हैं। अलग-अलग धर्मों और समान लिंग से होने के कारण उनके परिवार, रिश्तेदार और समाज के लोग इस रिश्ते का कड़ा विरोध कर रहे थे। युवतियों ने कोर्ट को अवगत कराया कि उनके इस फैसले से नाराज परिजनों से उनकी जान-माल को गंभीर खतरा बना हुआ है। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर सुरक्षा दिए जाने और उनके व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप न किए जाने की गुहार लगाई थी।

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कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: सामाजिक विरोध के नाम पर सुरक्षा से समझौता नहीं

जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलों और कानूनी नजीरों का विश्लेषण करने के बाद राज्य सरकार के तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में प्रमुख बातें रेखांकित कीं:

  • सामाजिक स्वीकार्यता और सुरक्षा: सामाजिक स्वीकार्यता की कमी, पारंपरिक मान्यताओं या पारिवारिक विरोध के आधार पर दो बालिग नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और शारीरिक सुरक्षा पर कोई आंच नहीं आने दी जा सकती।
  • अनुच्छेद-21 का अधिकार: भले ही समलैंगिक विवाह को कानूनी ढांचा प्रदान करना विधायिका के क्षेत्राधिकार में आता हो, फिर भी संविधान का अनुच्छेद-21 ऐसे जोड़ों को भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक संबंध स्थापित कर साथ रहने का पूर्ण अधिकार प्रदान करता है।
  • वैवाहिक दर्जे की अनिवार्यता नहीं: वैवाहिक दर्जे का अभाव किसी भी रिश्तेदार, तीसरे पक्ष या प्रशासनिक तंत्र को बालिग नागरिकों की स्वायत्तता और सुरक्षा पर हमला करने का अधिकार नहीं देता।

पुलिस अधिकारियों को तत्काल सुरक्षा देने के निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस आयुक्त, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) या पुलिस अधीक्षक (SP) को सख्त निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ताओं के बालिग होने की पुष्टि करने के बाद उन्हें तत्काल और प्रभावी सुरक्षा मुहैया कराई जाए। कोर्ट ने साफ किया कि जोड़े के परिवार या समाज के किसी भी व्यक्ति को उनके लिव-इन संबंध में बाधा डालने की अनुमति नहीं होगी।

​इसके अलावा, कोर्ट ने निजी प्रतिवादियों को यह छूट दी है कि यदि याचियों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं, तो वे आदेश को वापस लेने के लिए रिकॉल आवेदन दायर कर सकते हैं। सुनवाई के अंत में कोर्ट ने इस जटिल कानूनी विषय पर समर्पित शोध कार्य के लिए अपनी रिसर्च एसोसिएट सुश्री जाह्नवी सिंह के प्रति विशेष आभार भी व्यक्त किया।

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