जिस ब्रिटिश राज ने करीब 80 साल पहले भारत को दो देशों में बांटने की प्रक्रिया को अंजाम दिया, आज उसी ब्रिटेन के सामने अपने देश को एक साथ रखने की चुनौती खड़ी है। स्कॉटलैंड में फिर से अलग देश बनने की मांग उठ रही है। वेल्स में भी आजादी की बात करने वाली राजनीतिक ताकतें सक्रिय हैं। नॉर्दर्न आयरलैंड में ब्रिटेन से अलग होकर आयरलैंड के साथ जाने का सवाल पहले से मौजूद है।

ऐसे में भारतीयों के लिए सवाल स्वाभाविक है—क्या इतिहास अब पलट रहा है? क्या जिस UK का कभी दुनिया के बड़े हिस्से पर शासन था, वह खुद कई हिस्सों में बंट सकता है?

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इस सवाल का जवाब इतना सीधा नहीं है। लेकिन ब्रिटेन के अंदर चल रही मौजूदा राजनीति को समझें तो तस्वीर जरूर दिलचस्प है।

14 सितंबर को बनी राण रणनीति

14 सितंबर 2026 को यह मामला तब और चर्चा में आया, जब स्कॉटलैंड की SNP, वेल्स की Plaid Cymru और नॉर्दर्न आयरलैंड की Sinn Féin के नेताओं ने कार्डिफ में बैठक की। तीनों दल UK से ज्यादा अधिकार और आगे चलकर अपने-अपने क्षेत्रों के अलग भविष्य की मांग करते हैं। बैठक के बाद नेताओं ने अपने लोगों के भविष्य का फैसला खुद करने के अधिकार पर जोर दिया। 

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि UK टूटने का फैसला हो चुका है। असल कहानी इससे कहीं ज्यादा लंबी है।

पहले समझिए: UK है क्या?

आम बोलचाल में लोग पूरे UK को कई बार “इंग्लैंड” या “ब्रिटेन” कह देते हैं। लेकिन दोनों शब्दों का मतलब एक नहीं है। United Kingdom of Great Britain and Northern Ireland में चार हिस्से हैं:

  • इंग्लैंड
  • स्कॉटलैंड
  • वेल्स
  • नॉर्दर्न आयरलैंड

आज का UK कई ऐतिहासिक समझौतों और Union के जरिए बना है। इसलिए अगर भविष्य में UK की मौजूदा व्यवस्था बदलती है, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि “इंग्लैंड टूट गया।” असली सवाल होगा कि UK के दूसरे हिस्से उसके साथ रहना चाहते हैं या अलग रास्ता चुनते हैं। 

House of Commons Library भी UK के इतिहास और इसके अलग-अलग हिस्सों की संवैधानिक स्थिति को इसी तरह समझाती है। यही वजह है कि “ब्रिटेन का बंटवारा” और “इंग्लैंड का बंटवारा” दो अलग बातें हैं।

अब स्कॉटलैंड क्यों कह रहा है: हमें अपना देश चाहिए?

स्कॉटलैंड में आजादी की मांग नई नहीं है। 2014 में वहां स्वतंत्रता पर बाकायदा जनमत संग्रह हुआ था। लोगों से पूछा गया था:

“Should Scotland be an independent country?”

यानी क्या स्कॉटलैंड एक स्वतंत्र देश होना चाहिए? नतीजे में करीब 55.25% लोगों ने स्वतंत्रता के खिलाफ वोट किया, जबकि करीब 44.75% ने स्वतंत्रता के पक्ष में मतदान किया। कुल 36 लाख से ज्यादा वोट पड़े और मतदान प्रतिशत 84.6% रहा। 

उस समय मामला खत्म होता दिखाई दिया था। लेकिन स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता की मांग खत्म नहीं हुई। अब 2026 में यह मुद्दा फिर तेजी से सामने आया है।

2026 में क्या हुआ?

28 अगस्त 2026 को Scottish Government ने Draft Independence Referendum Bill जारी किया। इस बिल में फिर वही सवाल रखा गया है:

“Should Scotland be an independent country?”

यानी लोगों से पूछा जाए कि क्या वे स्कॉटलैंड को अलग देश बनाना चाहते हैं। लेकिन यहां एक बहुत जरूरी बात है। यह अभी सिर्फ ड्राफ्ट बिल है। इसका मतलब यह नहीं कि स्कॉटलैंड में जनमत संग्रह की तारीख तय हो गई है।

Scottish Government खुद कहती है कि बिल को संसद में आगे बढ़ाने के लिए जरूरी अधिकार पहले हासिल करने होंगे।

UK सरकार क्यों रोक रही है?

यहीं मामला थोड़ा पेचीदा हो जाता है। स्कॉटलैंड की सरकार कहती है कि वहां के लोगों को अपने भविष्य पर वोट करने का अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन UK सरकार इस समय स्वतंत्रता या दूसरा independence referendum कराने के समर्थन में नहीं है।

10 सितंबर 2026 को UK Parliament में पूछे गए सवाल के जवाब में Scotland Office ने साफ कहा कि मौजूदा सरकार को स्वतंत्रता या दूसरे referendum का समर्थन करने का जनादेश नहीं मिला है। 

इसके पीछे एक कानूनी मामला भी है। 2022 में UK Supreme Court ने फैसला दिया था कि Scottish Parliament अपने दम पर independence referendum कराने का कानून नहीं बना सकती। अदालत ने कहा था कि UK से Scotland के Union से जुड़े मुद्दे Westminster यानी UK Parliament के अधिकार वाले मामलों में आते हैं। 

यानी स्कॉटलैंड में राजनीतिक इच्छा हो सकती है, लेकिन सिर्फ Scottish Parliament के फैसले से referendum कराना आसान नहीं है। यही इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी कानूनी अड़चन है।

फिर 2026 में मामला इतना बड़ा क्यों हो गया?

क्योंकि मई 2026 के Scottish Parliament चुनाव के बाद Scottish Government ने कहा कि स्वतंत्रता समर्थक MSPs को अब तक का सबसे बड़ा समर्थन मिला है।

Scottish Government के मुताबिक मई चुनाव में pro-independence majority सबसे बड़ी रही। इसके बाद सरकार ने Draft Independence Referendum Bill जारी किया। 

यानी Scotland की सरकार अब इस मुद्दे को सिर्फ भाषणों तक नहीं रखना चाहती। उसने referendum के सवाल वाला ड्राफ्ट कानून भी तैयार कर दिया है।

अब वेल्स भी क्यों चर्चा में है?

अगर सिर्फ Scotland की बात होती तो इसे पुरानी राजनीतिक लड़ाई माना जा सकता था। लेकिन अब वेल्स में भी अलग भविष्य की चर्चा ज्यादा दिखाई दे रही है।

7 मई 2026 को Wales में Senedd चुनाव हुआ। इस चुनाव में Plaid Cymru ने 43 सीटें जीतकर सबसे ज्यादा सीटें हासिल कीं और सरकार बनाई। Senedd के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार कुल 96 सीटों वाली नई Senedd में Reform UK को 34, Welsh Labour को 9, Welsh Conservatives को 7, Wales Green Party को 2 और Welsh Liberal Democrats को 1 सीट मिली। 

Plaid Cymru वेल्स के लिए ज्यादा अधिकार और स्वतंत्रता की मांग करने वाली प्रमुख राजनीतिक पार्टी है।इसलिए चुनाव के बाद वेल्स में भी यह सवाल फिर चर्चा में आया कि क्या Wales को UK के अंदर ही ज्यादा अधिकार चाहिए या भविष्य में अलग देश बनने पर भी विचार होना चाहिए।

Scotland और Wales ने साथ आने की कोशिश क्यों की?

14 सितंबर 2026 को Scotland और Wales की सरकारों ने Cardiff Agreement पर हस्ताक्षर किए।इसमें दोनों सरकारों ने गरीबी, महंगाई, अर्थव्यवस्था, रोजगार, climate change और यूरोप के साथ संबंध जैसे कई मुद्दों पर मिलकर काम करने की बात कही है। 

लेकिन समझौते का एक हिस्सा सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है। दोनों सरकारों ने माना कि Scotland और Wales के लोगों को अपने संवैधानिक भविष्य का फैसला लोकतांत्रिक तरीके से करने का अधिकार होना चाहिए।

हालांकि Cardiff Agreement कानूनी रूप से UK से अलग होने की प्रक्रिया शुरू नहीं करता। Scottish Government ने भी साफ किया है कि यह समझौता दोनों सरकारों की मौजूदा कानूनी शक्तियों को नहीं बदलता। 

इसका मतलब यह हुआ कि राजनीतिक सहयोग बढ़ा है, लेकिन UK टूटने की कोई कानूनी प्रक्रिया इससे शुरू नहीं हुई।

14 सितंबर की बैठक में Sinn Féin क्यों शामिल हुई?

यहीं कहानी और दिलचस्प हो जाती है। 14 सितंबर को Cardiff में सिर्फ Scotland और Wales के नेता नहीं मिले। नॉर्दर्न आयरलैंड की Sinn Féin भी इस बैठक में शामिल हुई।

SNP, Plaid Cymru और Sinn Féin के नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों के लोगों के भविष्य का फैसला खुद करने की बात कही। तीनों पार्टियों के अलग-अलग लक्ष्य और रास्ते हैं, लेकिन तीनों UK की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। 

हालांकि यह समझना जरूरी है कि यह तीनों सरकारों की संयुक्त बैठक नहीं थी। यह संबंधित राजनीतिक दलों के नेताओं की बैठक थी। इसलिए इसे सीधे “तीनों देश UK से अलग होने जा रहे हैं” कहना सही नहीं होगा।

नॉर्दर्न आयरलैंड का मामला सबसे अलग क्यों है?

नॉर्दर्न आयरलैंड की स्थिति Scotland और Wales से काफी अलग है। यहां 1998 का Good Friday Agreement लागू है। यह समझौता तीन दशक तक चले हिंसक संघर्ष के बाद हुआ था और इसी ने नॉर्दर्न आयरलैंड की राजनीतिक व्यवस्था और संवैधानिक स्थिति के लिए नया ढांचा बनाया। 

इस समझौते में यह सिद्धांत रखा गया कि नॉर्दर्न आयरलैंड का संवैधानिक भविष्य वहां के लोगों की सहमति पर निर्भर करेगा।

अगर परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि Northern Ireland के लोगों का बहुमत आयरलैंड गणराज्य के साथ जुड़ना चाहता है, तो वहां border poll यानी इस सवाल पर जनमत संग्रह कराने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह Scotland से अलग है।

Scotland में ऐसा कोई सीधा संवैधानिक प्रावधान नहीं है जिसमें केवल सार्वजनिक समर्थन दिखने पर अपने आप independence referendum हो जाए।Northern Ireland में Good Friday Agreement ने इसके लिए खास व्यवस्था बनाई है।

क्या Northern Ireland भी UK से अलग हो सकता है?

सैद्धांतिक रूप से हां। लेकिन अभी इसका मतलब यह नहीं कि ऐसा होने वाला है। अगर कभी UK सरकार को लगे कि परिस्थितियां ऐसी बन गई हैं कि Northern Ireland के लोगों का बहुमत UK से निकलकर Ireland के साथ जुड़ना चाहता है, तो Secretary of State को border poll पर विचार करना पड़ सकता है।

इसमें भी कई राजनीतिक और कानूनी चरण होंगे। यानी Scotland, Wales और Northern Ireland तीनों के मामले अलग हैं।

क्या तीनों मिलकर UK को तोड़ सकते हैं?

राजनीतिक रूप से तीनों जगह की अलगाव समर्थक ताकतों का एक मंच पर आना महत्वपूर्ण है। 14 सितंबर की Cardiff बैठक को इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। SNP, Plaid Cymru और Sinn Féin के नेताओं ने पहली बार इस तरह एक साथ UK के अंदर अपने क्षेत्रों के भविष्य की बात रखी।  लेकिन सिर्फ एक बैठक से UK नहीं टूटता। तीनों की कानूनी स्थिति अलग है।

Scotland: स्वतंत्रता पर referendum के लिए UK स्तर पर कानूनी रास्ते की जरूरत है। 2022 में Supreme Court ने Scottish Parliament की एकतरफा शक्ति को खारिज किया था। 

Wales: वहां स्वतंत्रता की राजनीतिक मांग मौजूद है, लेकिन Scotland जैसा referendum वाला सीधा कानूनी रास्ता नहीं है।

Northern Ireland: यहां Good Friday Agreement के तहत border poll की खास व्यवस्था है। 

इसलिए तीनों का राजनीतिक रूप से साथ आना और तीनों का UK से अलग हो जाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

तो क्या सच में ब्रिटेन टूटने वाला है?

अभी यह कहना सही नहीं होगा कि “UK अब टूटने ही वाला है।”ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि UK की एकता पर बहस अब फिर काफी तेज हो गई है।

एक तरफ Scotland ने independence referendum का Draft Bill जारी कर दिया है। दूसरी तरफ Wales में independence समर्थक Plaid Cymru सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है।तीसरी तरफ Northern Ireland में Ireland के साथ जुड़ने का सवाल Good Friday Agreement के तहत पहले से मौजूद है। और अब तीनों क्षेत्रों की प्रमुख अलगाव समर्थक पार्टियों के नेता एक साथ बैठकर भविष्य की बात कर रहे हैं।  यानी मामला सिर्फ Scotland तक सीमित नहीं रह गया है।