मेरठ के पल्लवपुरम फेस-2 स्थित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) से 15 सितंबर को क्लोरीन गैस के रिसाव की सूचना मिली। रिपोर्ट के अनुसार, गैस का असर प्लांट के आसपास करीब 50 मीटर तक महसूस किया गया। कुछ लोगों की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया।
प्रभावित क्षेत्र के करीब 100 मीटर हिस्से को खाली कराया गया और लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई। घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि STP में क्लोरीन गैस का इस्तेमाल क्यों किया जाता है और इसका रिसाव होने पर लोगों को सांस लेने में परेशानी क्यों होने लगती है।
STP में क्लोरीन गैस की जरूरत क्यों पड़ती है?
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम सिर्फ गंदे पानी से ठोस कचरा अलग करना नहीं होता। सीवेज में कई तरह के सूक्ष्मजीव मौजूद हो सकते हैं। उपचार की प्रक्रिया के बाद पानी को दोबारा इस्तेमाल या निर्धारित मानकों के अनुसार बाहर छोड़ने से पहले कीटाणुरहित करना जरूरी हो सकता है।

इसी प्रक्रिया में क्लोरीन का इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी यानी EPA के अनुसार, नगरपालिका के wastewater treatment में क्लोरीन एक व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला disinfectant है। यह सूक्ष्मजीवों को निष्क्रिय करने में मदद करता है। क्लोरीन का इस्तेमाल गैस, hypochlorite solution या दूसरे chlorine compounds के रूप में किया जा सकता है।
यानी STP में क्लोरीन अपने आप में कोई अनावश्यक पदार्थ नहीं है। नियंत्रित मात्रा में इसका इस्तेमाल पानी के उपचार के लिए किया जाता है। समस्या तब पैदा होती है, जब क्लोरीन उस नियंत्रित प्रक्रिया से बाहर निकलकर हवा में फैलने लगे।
बाहर निकलने पर क्लोरीन गैस का असर क्यों होता है?
क्लोरीन गैस पीले-हरे रंग की गैस होती है और इसकी तेज, परेशान करने वाली गंध होती है। CDC के अनुसार, क्लोरीन हवा में फैलने पर मुख्य रूप से सांस के जरिए शरीर में पहुंच सकता है। यह आंखों, नाक, गले और फेफड़ों जैसे नमी वाले ऊतकों को प्रभावित करता है।
यही वजह है कि गैस रिसाव के दौरान सबसे पहले आंखों में जलन, नाक और गले में परेशानी, खांसी या सांस लेने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ज्यादा मात्रा में संपर्क होने पर सीने में जकड़न और गंभीर सांस संबंधी समस्या भी हो सकती है। प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति कितनी मात्रा में गैस के संपर्क में आया और कितनी देर तक संपर्क रहा।
मेरठ की घटना में आसपास के लोगों को सांस लेने में परेशानी होने की जानकारी सामने आई। इसे क्लोरीन के ज्ञात प्रभावों के संदर्भ में समझा जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की बीमारी की गंभीरता का आकलन केवल खबर के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसका निर्धारण डॉक्टर ही कर सकते हैं।
गैस हवा में फैलने के बाद खतरा कैसे बढ़ता है?
क्लोरीन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह हवा से भारी होती है। CDC के अनुसार, क्लोरीन गैस नीचे की ओर जमा हो सकती है और निचले स्थानों में संपर्क का खतरा बढ़ सकता है। हवा की दिशा और गति भी गैस के फैलाव को प्रभावित करती है।
इसलिए गैस रिसाव वाली जगह के आसपास रहने वाले लोगों के लिए प्रशासन के निर्देश महत्वपूर्ण होते हैं। सिर्फ घटनास्थल से कुछ कदम दूर चले जाना हमेशा पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रभावित क्षेत्र से दूरी बनाना और अधिकारियों द्वारा बताए गए सुरक्षित स्थान पर जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
100 मीटर का इलाका खाली कराने की जरूरत क्यों पड़ी?
मेरठ की घटना में रिपोर्ट के अनुसार प्रभावित क्षेत्र के करीब 100 मीटर हिस्से को खाली कराया गया। इसका उद्देश्य लोगों को संभावित गैस के संपर्क से दूर रखना था।
किसी गैस रिसाव में सुरक्षित दूरी एक तय संख्या से निर्धारित नहीं होती। यह रिसाव की मात्रा, हवा की स्थिति, इलाके की बनावट और गैस के फैलाव जैसे कारकों पर निर्भर कर सकती है। इसलिए स्थानीय प्रशासन और आपातकालीन टीमों के निर्देश को प्राथमिकता देना जरूरी होता है।
गैस की गंध आने पर क्या करना चाहिए?
अगर किसी व्यक्ति को क्लोरीन जैसी तेज गंध महसूस हो और आसपास गैस रिसाव की सूचना हो, तो सबसे पहले उस क्षेत्र से दूर जाना चाहिए। CDC खुले क्षेत्र में क्लोरीन रिसाव की स्थिति में प्रभावित स्थान से हटने और सुरक्षित स्थान पर जाने की सलाह देता है। अगर अधिकारियों की ओर से घर के अंदर रहने की सलाह दी जाए तो खिड़कियां बंद रखने और बाहर की हवा अंदर आने वाली ventilation systems को बंद करने की सलाह दी जाती है।
सिर्फ गंध को खतरे का सटीक पैमाना मानना भी सही नहीं है। लंबे समय तक संपर्क रहने पर गंध महसूस करने की क्षमता कम हो सकती है। इसलिए अगर गैस की गंध कम महसूस होने लगे, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वातावरण पूरी तरह सुरक्षित हो गया है।
सांस लेने में परेशानी हो तो क्या करें?
अगर किसी व्यक्ति को गैस के संपर्क के बाद सांस लेने में परेशानी, लगातार खांसी, सीने में जकड़न या आंखों में तेज जलन हो रही है, तो उसे चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। CDC के अनुसार, क्लोरीन के ज्यादा संपर्क में फेफड़ों पर असर पड़ सकता है और कुछ मामलों में लक्षण तुरंत दिखाई देने के बजाय बाद में भी बढ़ सकते हैं।
इसलिए अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों को गैस के संभावित संपर्क के बारे में जानकारी देना जरूरी है। खुद से कोई दवा लेने के बजाय चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।
मेरठ की घटना में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल क्या है?
पल्लवपुरम STP में गैस का रिसाव किस वजह से हुआ, यह अभी जांच का विषय है। रिपोर्ट के अनुसार, घटना के बाद रिसाव को नियंत्रित करने और क्षेत्र को सुरक्षित बनाने के प्रयास किए गए। रिसाव के कारणों की जांच भी की जा रही है।
जांच में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि गैस कहां से लीक हुई, वहां गैस के भंडारण और इस्तेमाल की व्यवस्था कैसी थी, सुरक्षा उपकरण काम कर रहे थे या नहीं और आपात स्थिति से निपटने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।
इस घटना से एक बात स्पष्ट होती है कि STP जैसी जगहों पर इस्तेमाल होने वाले रसायनों के लिए केवल उपचार प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि storage, handling और emergency safety व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। EPA भी chlorine के इस्तेमाल में storage, handling और transportation से जुड़े सुरक्षा जोखिमों का उल्लेख करता है।
फिलहाल मेरठ में गैस रिसाव के वास्तविक कारण की पुष्टि जांच के बाद ही होगी। तब तक प्रभावित क्षेत्र से दूरी बनाए रखना और प्रशासन की ओर से जारी सुरक्षा निर्देशों का पालन करना सबसे जरूरी है।