दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है और इंटरनेट अब रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर कारोबार, रक्षा और बैंकिंग प्रणाली का एक अपरिहार्य हिस्सा बन चुका है। इस विशाल डिजिटल साम्राज्य को संचालित करने में समुद्र के नीचे बिछी अंडरसी (सबमरीन) केबलों की मुख्य भूमिका है। हाल ही में भारत और अमेरिका ने इन अति-महत्वपूर्ण केबल नेटवर्क को सुरक्षित और मजबूत बनाने के लिए 'TRUST' पहल की शुरुआत की है। दोनों देशों के बीच यह रणनीतिक साझेदारी ऐसे समय में हुई है, जब साइबर हमलों, समुद्री गतिविधियों और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण अंडरसी इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा पर गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं।

क्या है भारत-अमेरिका की TRUST पहल? TRUST का पूर्ण रूप 'Transforming the Relationship Utilising Strategic Technologies' (रणनीतिक प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके संबंधों में बदलाव) है। यह भारत और अमेरिका के बीच अत्याधुनिक और संवेदनशील तकनीकों में सहयोग का एक प्रमुख ढांचा है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच सुरक्षित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, नई तकनीकों के विकास और भरोसेमंद ग्लोबल सप्लाई चेन को स्थापित करना है। समुद्र की गहराई में मौजूद केबल नेटवर्क अब इस रणनीतिक सहयोग का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया है।

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वैश्विक डिजिटल नेटवर्क की रीढ़ हैं ये केबल समुद्र की तलहटी से होकर हजारों किलोमीटर की दूरी तय करने वाली ये सबमरीन केबल आधुनिक इंटरनेट की असली रीढ़ हैं। एक आम धारणा के विपरीत, वैश्विक इंटरनेट सैटेलाइट्स के बजाय 95 से 99 प्रतिशत तक इन्हीं केबलों पर निर्भर करता है। महाद्वीपों के बीच होने वाले डेटा का बड़ा हिस्सा इन्हीं से होकर गुजरता है। इंटरनेट ब्राउजिंग, वीडियो कॉलिंग, ई-मेल और सोशल मीडिया के अलावा अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग, शेयर बाजार और बड़े वित्तीय लेन-देन इसी नेटवर्क के जरिए सेकंड्स में पूरे होते हैं। वर्तमान समय में क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकों की बढ़ती मांग ने इन केबलों की उपयोगिता को कई गुना बढ़ा दिया है।

भारत की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए क्यों हैं अहम? भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार अप्रत्याशित गति से हो रहा है। देश का ऑनलाइन बैंकिंग ढांचा, यूपीआई (UPI) पेमेंट्स, सरकारी डेटा सेवाएं और आईटी उद्योग पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्टिविटी पर आधारित हैं। ऐसे में यदि समुद्र के नीचे बिछी किसी प्रमुख केबल में कोई तकनीकी खराबी आती है या किसी विरोधी राष्ट्र/तत्व द्वारा इसे नुकसान पहुंचाया जाता है, तो भारत समेत कई देशों की इंटरनेट आधारित सेवाएं पूरी तरह ठप हो सकती हैं। यही कारण है कि सबमरीन केबलों की सुरक्षा सीधे तौर पर देश की आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ जाती है।

कैसे काम करती हैं सबमरीन केबल? अंडरसी केबल की आंतरिक संरचना अत्यधिक जटिल और उच्च तकनीक से लैस होती है:

  • फाइबर-ऑप्टिक कोर: केबल के केंद्र में बेहद पतले कांच (Glass) के फाइबर होते हैं, जिनकी मोटाई इंसान के बाल जितनी होती है। डेटा को बिजली के रूप में नहीं, बल्कि प्रकाश की तरंगों (Light Signals) के रूप में भेजा जाता है, जिससे गति अत्यधिक तेज रहती है।
  • मजबूत सुरक्षा परतें: समुद्र की गहराइयों के भारी दबाव, खारे पानी के संक्षारण (जंग) और समुद्री जीवों के काटने से बचाने के लिए फाइबर के ऊपर कॉपर, स्टील के तार और पॉलीइथिलीन प्लास्टिक की कई मजबूत सुरक्षात्मक परतें चढ़ाई जाती हैं।
  • सिग्नल रिपीटर: लंबी दूरी तय करने के दौरान प्रकाश के सिग्नल कमजोर न पड़ें, इसके लिए केबल के मार्ग में नियमित अंतराल पर 'रिपीटर' नामक उपकरण लगाए जाते हैं, जो सिग्नल को री-एंप्लीफाई करके उसकी गति और ताकत को बनाए रखते हैं।

समुद्र के नीचे केबल बिछाने की जटिल प्रक्रिया इन केबलों को समुद्र में बिछाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण और खर्चीला काम होता है। इसके लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए 'केबल-लेइंग जहाजों' का उपयोग किया जाता है। केबल बिछाने से पहले समुद्र के संबंधित हिस्से की सोनार तकनीक से विस्तृत मैपिंग और सर्वे किया जाता है। तटीय इलाकों और कम गहरे पानी में केबल को जहाजों के लंगर (Anchor) या मछुआरों के जाल से बचाने के लिए समुद्री तल के अंदर गड्ढा खोदकर दबाया जाता है। वहीं, गहरे समुद्र में इसे सीधे समुद्र की तलहटी (Seabed) पर सपाट बिछा दिया जाता है। भविष्य में वैश्विक डेटा सुरक्षा और साइबर संप्रभुता बनाए रखने के लिए भारत-अमेरिका की TRUST पहल एक निर्णायक कदम साबित होगी।