ब्रह्मांड हमेशा से ही इंसानों के लिए कौतूहल और रहस्य का विषय रहा है। रात के घने अंधेरे में आसमान की ओर निहारना और अचानक एक तारे को टूटते हुए देखना, किसी जादू से कम नहीं लगता। अगर आप भी खगोलीय घटनाओं (Astronomical Events) में दिलचस्पी रखते हैं, तो सितंबर 2026 का महीना आपके लिए एक बेहद रोमांचक अनुभव लेकर आ रहा है। अगस्त में होने वाली प्रसिद्ध 'पर्सिड उल्का वर्षा' के समाप्त होने के बाद, अब अंतरिक्ष में एक और रहस्यमयी घटना आकार ले रही है जिसे विज्ञान की भाषा में 'एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा' (Epsilon Perseids Meteor Shower) कहा जाता है।
\r\n\r\nवीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के जाने-माने खगोलविद (Astronomy Educator) अमर पाल सिंह ने इस विशेष और दुर्लभ खगोलीय नज़ारे से जुड़ी कई अहम और रोचक जानकारियाँ साझा की हैं। उनके अनुसार, यह उल्का वर्षा भले ही आकार में छोटी हो, लेकिन वर्ष 2026 में इसे देखने की परिस्थितियाँ इतनी आदर्श हैं कि यह खगोल प्रेमियों के लिए किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होगी।
\r\n\r\n
क्या है एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा और 2026 में यह क्यों है इतनी ख़ास?
\r\n\r\nखगोलविद अमर पाल सिंह बताते हैं कि एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा हर साल सितंबर के महीने में सक्रिय होती है। वर्ष 2026 में यह 5 सितंबर से लेकर 21 सितंबर तक सक्रिय रहेगी। लेकिन, इसका सबसे चरम समय (Peak Time) 9 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि से लेकर 10 सितंबर 2026 की तड़के सुबह (भोर) तक रहेगा।
\r\n\r\nइस साल इस घटना के सबसे ख़ास होने की सबसे बड़ी वजह है—'चंद्रमा की स्थिति'। 9 सितंबर को चंद्रमा 'न्यू मून' (अमावस्या) के बेहद करीब होगा। इसका मतलब है कि आसमान में चाँद की रोशनी का व्यवधान (Moonlight interference) लगभग शून्य होगा। जब आसमान में घुप्प अंधेरा होता है, तो हल्की चमक वाले और बेहद तेज़ तैरते हुए उल्कापिंड भी आसानी से देखे जा सकते हैं। अगर मानसून के बादल छंट जाते हैं और आसमान साफ़ रहता है, तो यह रात तारों की बारिश देखने के लिए साल की सबसे बेहतरीन रातों में से एक होगी।
\r\n\r\n
भारत में कब, कहाँ और कैसे देखें यह अद्भुत नज़ारा?
\r\n\r\nभारत, पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में स्थित है, और अच्छी बात यह है कि यह उल्का बौछार मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध के देशों में ही दिखाई देगी।
\r\n\r\nदेखने का सबसे सही समय: भारत में इसे देखने का सबसे उत्तम समय 9 सितंबर की रात 11:00 बजे के बाद से लेकर अगले दिन (10 सितंबर) सुबह सूरज निकलने से पहले तक है।
\r\n\r\n
कितने उल्कापिंड दिखेंगे: आदर्श अंधेरी परिस्थितियों में प्रति घंटे लगभग 5 से 8 उल्काएं देखी जा सकेंगी। इनकी गति अत्यधिक तेज़ होती है, जो लगभग 64 किमी/सेकंड से लेकर 70 किमी/सेकंड तक हो सकती है।
\r\n\r\nकिस दिशा में देखें: इसका दीप्तिमान (Radiant) उत्तर-पूर्वी क्षितिज की ओर, 'पर्सियस तारामंडल' के पास होगा।
\r\n\r\nक्या किसी उपकरण की आवश्यकता है? बिल्कुल नहीं! इसे देखने के लिए किसी विशेष टेलीस्कोप या दूरबीन की आवश्यकता नहीं है। इसे नग्न आँखों (Naked eyes) से देखा जा सकता है। बस अपनी आँखों को अंधेरे के अनुकूल ढलने के लिए कम से कम 30 मिनट का समय दें।
\r\n\r\n'रेडिएंट पॉइंट' (विकीर्णक बिंदु) क्या होता है?
\r\n\r\nखगोलविद अमर पाल सिंह ने इसे एक बहुत ही आसान उदाहरण से समझाया है। जिस तरह आप किसी खाली पड़ी रेलगाड़ी की पटरियों को दूर तक देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि वे आगे जाकर एक बिंदु पर मिल रही हैं (दृष्टि प्रभाव)। ठीक उसी तरह, आसमान में जिस तारामंडल क्षेत्र की तरफ़ से उल्का वृष्टि आती हुई दिखाई देती है, उसे विज्ञान में 'रेडिएंट पॉइंट' या विकीर्णक बिंदु कहा जाता है। चूँकि ये उल्काएं पर्सियस तारामंडल क्षेत्र से आती हुई प्रतीत होती हैं, इसीलिए इनका नाम 'एप्सिलॉन पर्सिडस' रखा गया है। हालांकि, उल्काएं पूरे आसमान में कहीं भी दिखाई दे सकती हैं, इसलिए पूरे आकाश पर नज़र रखना सबसे अच्छा तरीका है।
\r\n\r\nसबसे बड़ा रहस्य: अज्ञात धूमकेतु (The Unknown Parent Comet)
\r\n\r\nइस एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य वह स्रोत है जहाँ से यह पैदा होती है। खगोलविदों ने अगस्त की पर्सिड उल्का वर्षा के जनक 'स्विफ्ट-टटल' (Comet Swift-Tuttle) धूमकेतु की खोज तो कर ली है, लेकिन सितंबर में होने वाली इस उल्का वर्षा का जनक धूमकेतु (Parent Comet) आज तक अज्ञात है!
\r\n\r\nखगोलविद अमर पाल सिंह की 'विचार प्रयोग परिकल्पना' (Thought Experiments Hypothesis) के अनुसार, इसके लिए ज़िम्मेदार पिंड कोई एक अज्ञात दीर्घ-अवधि (Unknown Long-Period) वाला धूमकेतु हो सकता है। यह धूमकेतु ऊर्ट बादल (Oort cloud) से उत्पन्न हुआ होगा, जिसे सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में हज़ारों साल लगते हैं।
\r\n\r\nसिंह बताते हैं कि मानव इतिहास में ऐसे कई धूमकेतु हैं जो हज़ारों साल पहले सूर्य के पास से गुज़रे होंगे और फिर अंतरिक्ष के गहरे अंधकार में कहीं खो गए। जब तक ये दोबारा सूर्य के करीब नहीं आते, तब तक आधुनिक दूरबीनें भी इन्हें नहीं खोज सकतीं। पृथ्वी हर साल सितंबर में इसी 'अज्ञात और रहस्यमयी' धूमकेतु द्वारा हज़ारों साल पहले छोड़े गए धूल और बर्फ के मलबे की पट्टी से गुज़रती है। जब ये कण हमारे वायुमंडल में टकराते हैं, तो भीषण घर्षण के कारण जल उठते हैं, और हमें टूटते तारों का यह जादुई नज़ारा दिखाई देता है।
\r\n\r\nउल्का और उल्कापिंड में क्या अंतर है? (Meteor vs Meteorite)
\r\n\r\nविज्ञान की भाषा में इसे समझना बेहद ज़रूरी है। अंतरिक्ष में तैरते क्षुद्रग्रहों (Asteroids) या धूमकेतुओं (Comets) के जो धूल और चट्टानी कण जब तेज़ गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो हवा के घर्षण (Friction) से पैदा हुई अत्यधिक गर्मी के कारण वे हवा में ही जल जाते हैं। प्रकाश की इस चमकीली धारी को 'उल्का' (Meteor) या टूटता तारा कहा जाता है।
\r\n\r\nलेकिन, अगर कोई चट्टानी टुकड़ा आकार में बड़ा हो और वायुमंडल में पूरी तरह जलने से बचकर सीधा पृथ्वी की सतह (जमीन) पर आ गिरे, तो उसे 'उल्कापिंड' (Meteorite) कहा जाता है।
\r\n\r\nएक ख़ास चेतावनी और सुझाव (दर्शकों के लिए टिप्स)
\r\n\r\nखगोलविद अमर पाल सिंह विशेष ज़ोर देते हुए कहते हैं कि "सही ज्ञान ही सभी समस्याओं का समाधान है, और यही विज्ञान है।" अगस्त और सितंबर के पर्सिड्स को एक समझने की भूल न करें। दोनों की उत्पत्ति अलग-अलग धूमकेतुओं से हुई है।
\r\n\r\nअगर आप इस शानदार नज़ारे का गवाह बनना चाहते हैं, तो 9-10 सितंबर की रात को शहर की चकाचौंध और प्रकाश प्रदूषण (Light Pollution) से दूर किसी शांत और खुले ग्रामीण इलाके में जाएँ। बस प्रार्थना करें कि मानसून के बादल आपकी और तारों की इस मुलाकात में खलल न डालें। खुले आसमान के नीचे लेटकर, हज़ारों साल पहले किसी अज्ञात धूमकेतु द्वारा छोड़े गए ब्रह्मांडीय कणों को जलते हुए देखना, जीवन का एक ऐसा अनुभव है जिसे आप कभी भुला नहीं पाएंगे।