सपनों के शहर मुंबई में हाउसिंग सोसाइटीज के भीतर होने वाले विवाद कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन जब मामला करोड़ों की वसूली, अवैध कब्जे और प्रशासनिक तानाशाही का हो, तो वह सुर्खियां बन ही जाता है। मायानगरी के सबसे खूबसूरत और शांत माने जाने वाले इलाकों में से एक, मड आइलैंड (Madh Island) की सूचक को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी (Suchak Cooperative Housing Society) इन दिनों गंभीर आरोपों के भंवर में फंसी हुई है।READ ALSO:-'भाभी डायन है!' यामी गौतम की फिल्म 'नयी नवेली' के टीज़र ने इंटरनेट पर मचाई सनसनी, दशहरे पर रिलीज होगी फैंटेसी ड्रामा
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सोसाइटी के ही कुछ जागरूक सदस्यों ने प्रबंधन (Management Committee) की कार्यप्रणाली के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। आरोप है कि प्रबंधन द्वारा सदस्यों का आर्थिक और मानसिक शोषण किया जा रहा है। इस पूरे विवाद ने तब एक बड़ा रूप ले लिया, जब सदस्यों ने प्रेस के सामने आकर दस्तावेजों के साथ सोसाइटी की कथित 'काली सच्चाई' को उजागर किया।
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शुभम विला में हुआ 'धमाका': दस्तावेजों के साथ सामने आए सदस्य
\r\n\r\nहाल ही में मड आइलैंड स्थित 'शुभम विला' (Shubham Villa) में एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस बैठक में सोसाइटी के प्रमुख सदस्यों— मेहुल मेहता, प्रमोद तुलस्यान और रेश्मा पटेल ने एक साथ मिलकर सोसाइटी प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
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सदस्यों का साफ तौर पर कहना था कि सोसाइटी का कामकाज पूरी तरह से मनमाने ढंग से चलाया जा रहा है। महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट (Maharashtra Cooperative Societies Act) के जो नियम पारदर्शिता और सदस्यों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं, उन्हें सूचक सोसाइटी का प्रबंधन पूरी तरह से नजरअंदाज कर रहा है। सदस्यों ने मीडिया के सामने कई अहम दस्तावेज भी पेश किए, जो कथित तौर पर प्रबंधन की वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की ओर इशारा करते हैं।
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विवाद की जड़: क्या हैं वो बड़े आरोप, जिन्होंने उड़ाई नींद?
\r\n\r\nसूचक सोसाइटी के प्रबंधन पर सदस्यों द्वारा लगाए गए आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं। आइए इन आरोपों को विस्तार से समझते हैं:
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1. वित्तीय पारदर्शिता का पूर्ण अभाव सदस्यों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि सोसाइटी के फंड्स और खर्चों को लेकर कोई पारदर्शिता नहीं है। हिसाब-किताब के ऑडिट और बैलेंस शीट को सदस्यों के साथ नियमित रूप से साझा नहीं किया जा रहा है।
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2. पानी के कनेक्शन पर मनमानी वसूली पानी जैसी बुनियादी जरूरत को लेकर भी सोसाइटी में कथित तौर पर खेल चल रहा है। सदस्यों का आरोप है कि बीएमसी (BMC) द्वारा तय किए गए नियमों से इतर, पानी के कनेक्शन और अन्य मदों के नाम पर मनमाना और अनुचित शुल्क वसूला जा रहा है, जिसका कोई स्पष्ट हिसाब नहीं दिया गया है।
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3. बिना सुविधाओं के 'फैसिलिटेशन चार्ज' का दबाव इस विवाद में शुभम विला के मालिक प्रमोद तुलस्यान का मामला बेहद चौंकाने वाला है। उन्होंने दावा किया है कि वह सोसाइटी की किसी भी सुविधा (जैसे क्लब हाउस, स्विमिंग पूल या अन्य मेंटेनेंस सेवाओं) का इस्तेमाल नहीं करते हैं। उनके पास अपने कमर्शियल दस्तावेज मौजूद हैं, जो उनके दावों की पुष्टि करते हैं। इसके बावजूद, सोसाइटी प्रबंधन द्वारा उन पर जबरन ‘फैसिलिटेशन चार्ज’ (Facilitation Charge) थोपा जा रहा है। प्रमोद तुलस्यान ने इसे पूरी तरह से 'भेदभावपूर्ण और अनुचित कार्रवाई' करार दिया है।
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4. 2 करोड़ रुपये की रहस्यमयी मांग! प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जो सबसे बड़ा और हैरान करने वाला आरोप सामने आया, वह एक भारी-भरकम फंड की मांग को लेकर था। सदस्यों ने खुलासा किया कि प्रबंधन द्वारा प्रति प्लॉट लगभग चार लाख रुपये की भारी-भरकम राशि की मांग की जा रही है। सोसाइटी के कुल प्लॉट्स की संख्या के आधार पर यह रकम लगभग दो करोड़ रुपये (2 Crore Rupees) बैठती है। सदस्यों का सवाल है कि आखिर बिना किसी जनरल बॉडी मीटिंग (AGM/SGM) के स्पष्ट प्रस्ताव और बिना किसी बड़े डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के, इतनी बड़ी धनराशि क्यों और किस आधार पर मांगी जा रही है?
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5. करोड़ों की जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप मड आइलैंड में जमीन की कीमतें आसमान छूती हैं। ऐसे में सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया है कि सोसाइटी की करोड़ों रुपये की बेशकीमती जमीन पर कथित रूप से अवैध कब्जे किए जा रहे हैं और प्रबंधन इस मामले में या तो मूकदर्शक बना हुआ है या उसकी मिलीभगत है।
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6. निजी आवास पर सोसाइटी का रिकॉर्ड! नियमों के अनुसार, किसी भी को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के आधिकारिक दस्तावेज और रिकॉर्ड सोसाइटी के पंजीकृत कार्यालय (Registered Office) में ही रखे जाने चाहिए। लेकिन, सूचक सोसाइटी में यह आरोप है कि प्रबंधन से जुड़े कुछ रसूखदार लोग सोसाइटी के महत्वपूर्ण दस्तावेजों को अपने 'निजी निवास' (Private Residence) पर रख रहे हैं। यह स्थिति दस्तावेजों से छेड़छाड़ की गंभीर आशंका को जन्म देती है।
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7. कमेटी में बैठे हैं 'डिफॉल्टर' सदस्य सहकारी समितियों के नियम स्पष्ट कहते हैं कि कोई भी सदस्य जो सोसाइटी के बकाये का भुगतान नहीं करता (यानी डिफॉल्टर है), वह मैनेजिंग कमेटी का हिस्सा नहीं बन सकता। सदस्यों का आरोप है कि सूचक सोसाइटी की वर्तमान समिति में कुछ ऐसे लोग अहम पदों पर काबिज हैं, जो खुद सोसाइटी के बकाएदार (Defaulters) हैं।
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"हमें इंसाफ चाहिए": सदस्यों की प्रमुख मांगें
\r\n\r\nइन तमाम गंभीर आरोपों और कथित धांधली से तंग आकर अब मेहुल मेहता, प्रमोद तुलस्यान, रेश्मा पटेल और अन्य सदस्यों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
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- \r\n स्वतंत्र जांच (Independent Probe): इस पूरे प्रकरण की रजिस्ट्रार ऑफ को-ऑपरेटिव सोसाइटीज (Registrar of Cooperative Societies) द्वारा एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच बैठाई जाए।\r\n \r\n
- \r\n फॉरेंसिक ऑडिट: सोसाइटी के पिछले कई वर्षों के वित्तीय और प्रशासनिक रिकॉर्ड का एक स्वतंत्र 'फॉरेंसिक ऑडिट' (Forensic Audit) कराया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सदस्यों का पैसा कहां और कैसे खर्च हुआ है।\r\n \r\n
- \r\n कमेटी को भंग किया जाए: यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो वर्तमान प्रबंधन समिति को तत्काल प्रभाव से भंग कर वहां एक सरकारी प्रशासक (Administrator) नियुक्त किया जाए।\r\n \r\n
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\r\n\r\n\r\n"हम केवल अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। हमसे लाखों रुपये वसूले जा रहे हैं, लेकिन जब हम हिसाब मांगते हैं तो हमें दरकिनार कर दिया जाता है। यह सरासर तानाशाही है और हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।" - एक असंतुष्ट सदस्य (प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान)\r\n
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प्रबंधन की रहस्यमयी चुप्पी
\r\n\r\nहैरानी की बात यह है कि शुभम विला में हुए इस भारी हंगामे और मीडिया में मामला उछलने के बावजूद, सूचक को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के प्रबंधन (Managing Committee) की ओर से समाचार लिखे जाने तक कोई भी आधिकारिक प्रतिक्रिया (Official Statement) सामने नहीं आई है। प्रबंधन की इस चुप्पी ने सदस्यों के संदेह को और अधिक गहरा कर दिया है।
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अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या महाराष्ट्र का सहकारिता विभाग (Cooperation Department) इस मामले का संज्ञान लेकर कोई त्वरित कार्रवाई करता है, या मड आइलैंड की यह पॉश सोसाइटी इसी तरह विवादों के दलदल में धंसती चली जाएगी। यह पूरा मामला मुंबई की अन्य हाउसिंग सोसाइटियों के लिए भी एक बड़ा सबक है, जहां जागरूकता की कमी के कारण अक्सर लोग प्रबंधन की मनमानी का शिकार हो जाते हैं।