केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में बड़ा बयान देते हुए कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर दी जाएगी। इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश (यूपी) में भी यूसीसी लागू होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि, विपक्ष इस कदम को चुनाव से पहले ध्रुवीकरण की कोशिश बता रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि देश में यूसीसी को लेकर मौजूदा स्थिति क्या है और गुजरात, असम जैसे राज्यों के बिल अभी तक क्यों अटके हुए हैं।

देश में अभी कहां-कहां लागू है यूसीसी?

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भारत में अभी 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बीजेपी और एनडीए का शासन है। वर्तमान स्थिति यह है:

  • उत्तराखंड: यह देश का पहला राज्य है जहां जनवरी 2025 से यूसीसी आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। इसमें बहुविवाह पर प्रतिबंध, विवाह पंजीकरण अनिवार्य और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए रजिस्ट्रेशन जैसे सख्त नियम शामिल हैं।
  • गुजरात, असम और मध्य प्रदेश: इन तीनों राज्यों की विधानसभाओं ने यूसीसी कानून पारित कर दिया है। लेकिन, ये बिल अभी राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लंबित हैं। संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति किसी विधेयक को कितने दिन में मंजूरी देंगे, इसकी कोई समय सीमा तय नहीं है, इसलिए इन राज्यों में यूसीसी लागू होने में अभी वक्त लग सकता है।
  • गोवा: यहां यूसीसी की जगह 'गोवा सिविल कोड' पहले से लागू है, जो 1867 के पुर्तगाली नागरिक संहिता पर आधारित है।
  • अन्य राज्य: राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में यूसीसी बिल लाने की प्रक्रिया चल रही है।

क्या यूपी में लागू होगा यूसीसी?

उत्तर प्रदेश में फिलहाल यूसीसी लागू होने की संभावना कम नजर आ रही है। इसका मुख्य कारण राज्य में अगले साल की शुरुआत में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव हैं। वर्तमान सरकार के पास इस बड़े कानून को लाने और लागू करने के लिए पर्याप्त समय नहीं है। अगर चुनाव के बाद बीजेपी दोबारा सत्ता में आती है, तो नई सरकार इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकती है।

यूसीसी से किसे रखा गया है बाहर?

बीजेपी शासित राज्यों द्वारा लाए जा रहे यूसीसी कानूनों में एक अहम समानता यह है कि इनमें 'अनुसूचित जनजातियों' (ST) को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। उत्तराखंड को यूसीसी की पहली प्रयोगशाला बनाने के पीछे भी यही रणनीति थी, क्योंकि वहां मुस्लिम आबादी कम है और यह एक हिंदू बहुल 'देवभूमि' है, जिससे वहां बड़े स्तर पर विरोध नहीं हुआ।

विपक्ष और सहयोगियों का विरोध

अमित शाह के बयान के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है।

  • विपक्ष: एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 का उल्लंघन बताया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे 'अंडरग्राउंड कम्युनल कॉन्सपिरेसी' करार दिया है। वहीं, जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला ने सवाल उठाया है कि अगर सरकार के पास बहुमत है, तो इसे अलग-अलग राज्यों के बजाय सीधे संसद में क्यों नहीं लाया जाता।
  • एनडीए के सहयोगी दल: यूसीसी पर केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर भी असमंजस है। बिहार में बीजेपी की सहयोगी जेडीयू ने साफ कर दिया है कि राज्य में यूसीसी लागू नहीं होगा और इसे थोपा नहीं जाना चाहिए। लोजपा (रामविलास) और एनसीपी ने भी अभी तक इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है।

राज्य विधानसभाओं के जरिए क्यों आ रहा यूसीसी?

विवाह, तलाक, गोद लेना, वसीयत और उत्तराधिकार जैसे मामले संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) में आते हैं। इसलिए, संसद और राज्य विधानसभाएं दोनों इस पर कानून बना सकती हैं। बीजेपी राजनीतिक और संवैधानिक रणनीतियों के तहत इसे राष्ट्रीय स्तर पर संसद में लाने के बजाय, अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं के जरिए पास करवा रही है। 2029 का लक्ष्य इसलिए रखा गया है क्योंकि उसी साल अगले लोकसभा चुनाव होने हैं।

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