मेरठ के शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण मामले में व्यापारियों की आखिरी कानूनी उम्मीद भी अब धूमिल हो गई है। सोमवार, 21 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई अहम सुनवाई ने पूरे मेरठ शहर में हड़कंप मचा दिया है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विश्वनाथन की पीठ ने अवैध निर्माण को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए मेरठ विकास प्राधिकरण (एमडीए) के 'जोन ए' में चिन्हित 16,726 अवैध इमारतों को तत्काल सील करने का ऐतिहासिक और कड़ा आदेश दिया है।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि निर्माण चाहे 25 साल पुराना हो या 50 साल, यदि आवासीय भूखंड का इस्तेमाल व्यावसायिक (कामर्शियल) गतिविधियों के लिए किया जा रहा है, तो वह पूरी तरह से अवैध है और उसे बिना किसी देरी के बंद कराया जाना चाहिए। अब यह मामला सिर्फ आवास विकास या शास्त्रीनगर क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) का दायरा इसकी जद में आ गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर तय की गई है।
मेडा (MDA) का 'जोन ए': जानिए किन इलाकों पर चलेगा अदालत का डंडा
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि मेडा के 'जोन ए' में कौन-कौन से इलाके आते हैं। अदालत ने जोन ए, बी, सी और डी के सभी अवैध अतिक्रमणों को चिन्हित करने का आदेश दिया है, लेकिन फिलहाल जोन ए में मौजूद 16,726 अवैध निर्माणों पर सीधी सीलिंग की कार्रवाई होनी है।
जोन ए की भौगोलिक सीमा इस प्रकार है: यह क्षेत्र हापुड़ रोड बिजली बंबा बाईपास पुलिस चौकी से शुरू होता है। वहां से मेरठ शहर की तरफ बढ़ते हुए बाईं तरफ का पूरा हिस्सा इसके अंतर्गत आता है। इसमें हापुड़ रोड की बाईं साइड, जाकिर कॉलोनी, हापुड़ अड्डा, शाहपीर गेट, बच्चा पार्क और एम प्रकाश नर्सिंग होम वाली साइड शामिल है। इसके आगे बेगमपुल से जगत सिनेमा हॉल के सामने से सोतीगंज की साइड, दिल्ली रोड, बंसल सिनेमा, रोडवेज साइड, जली कोठी, केसरगंज, फुटबॉल चौक, मेवला फाटक और माधवपुरम वाले मंदिर के सामने तक का लगभग पूरा पुराना शहर इस जोन में आता है। लिसाड़ीगेट, ब्रह्मपुरी, भगवतपुरा और तारापुरी जैसे घनी आबादी वाले इलाके भी इसी 'जोन ए' का हिस्सा हैं, जहां बड़े पैमाने पर आवासीय संपत्तियों में व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं।
Follow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join ›अदालत ने केवल एक जोन (जोन ए) की रिपोर्ट पेश करने और बाकी तीन जोन (बी, सी, और डी) की रिपोर्ट दाखिल न करने पर मेडा सचिव अर्पित गुप्ता पर कड़ी नाराजगी जताई और 9 दिसंबर तक पूरी अनुपालन आख्या दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
उल्देपुर की कॉलोनियों से लेकर सेटबैक उल्लंघन तक सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने उल्देपुर में विकसित की गई अवैध कॉलोनियों को लेकर भी सख्त रुख अपनाया। सुनवाई के दौरान ऑनलाइन मौजूद रहे प्रमुख सचिव पी. गुरु प्रसाद से अदालत ने सीधा सवाल किया कि ये अवैध कॉलोनियां अस्तित्व में ही कैसे आईं। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि उल्देपुर की प्रत्येक अवैध कॉलोनी को ध्वस्त किया जाए।
44 सील भवनों और सेटबैक उल्लंघन पर कार्रवाई: आवास एवं विकास परिषद की ओर से कोर्ट में 14 जुलाई के आदेश की अनुपालन रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि 44 आवासीय भवनों में व्यावसायिक निर्माण पाए गए थे। इनमें से छह भवन बिना किसी नक्शे के बने थे, जिन्हें 16 सितंबर को पूरी तरह ध्वस्त किया जा चुका है (इनमें पांच कॉम्प्लेक्स और एक बैंक्वेट हॉल शामिल था)। बाकी 38 संपत्तियों के पास आवासीय स्वीकृति थी, लेकिन उनमें अतिरिक्त निर्माण कर व्यावसायिक उपयोग हो रहा था। इनमें से 24 के अवैध निर्माण आवंटियों ने खुद तोड़ दिए हैं, जबकि 20 पर कार्रवाई चल रही है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि इन सभी 44 सील भवनों के अवैध हिस्से ध्वस्त कर नए सिरे से रिपोर्ट पेश की जाए।
इसके अलावा, 201 संपत्तियां ऐसी पाई गईं जिनमें सेटबैक (भवन के चारों ओर छोड़ी जाने वाली अनिवार्य खाली जगह) में अवैध निर्माण था। इनमें से 63 का निर्माण हटाया जा चुका है, जबकि 138 पर कार्रवाई जारी है। अदालत ने प्रमुख सचिव आवास एवं शहर नियोजन, चेयरमैन आवास विकास परिषद और प्रमुख सचिव नगर विकास को इस पूरी कार्रवाई की स्वयं निगरानी करने के निर्देश दिए हैं।
पुनर्वास नीति, व्यापारियों की गुहार और महिलाओं का 171 दिन का धरना
राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पैरवी की। उन्होंने कोर्ट को आश्वस्त किया कि ईडब्ल्यूएस (EWS) और एलआईजी (LIG) वर्ग के 486 आवासों के प्रभावित होने के मामले में सरकार एक नई पुनर्वास नीति ला रही है। कोर्ट ने भी सरकार को इन वर्गों के लिए जल्द नीति बनाने को कहा है।
वहीं, व्यापारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सूरत सिंह ने ध्वस्तीकरण से पहले पुनर्वास और तब तक यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने की मांग करते हुए पक्ष रखने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने इसे सुनने से इनकार कर दिया और कहा कि इस मामले को आवास एवं विकास परिषद देखेगा।
जमीनी स्तर पर इस कार्रवाई का भारी विरोध हो रहा है। शास्त्रीनगर सेक्टर-2 में महिलाएं पिछले 171 दिनों से धरने पर बैठी हैं। शीतल पुजानी, राधा गुप्ता, जगरोशनी, रजनी और ऊषा समेत कई महिलाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि मकानों को तोड़ने की किसी भी कार्रवाई का पुरजोर विरोध किया जाएगा। इस बीच, कुछ व्यापारियों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के मेरठ दौरे के दौरान उनसे मिलने का समय मांगा था। हालांकि, मेरठ बचाओ संयुक्त संघर्ष समिति के अध्यक्ष रविंद्र गुर्जर ने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, ऐसे में राजनीतिक मुलाकातें बेमानी हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता को धमकी: "सुरक्षा का खतरा है तो शहर छोड़ दें"
इस पूरे मामले को उजागर करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता लोकेश खुराना की सुरक्षा का मुद्दा भी अदालत में गूंजा। उनके अधिवक्ता तुषार जैन ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता को लगातार धमकियां मिल रही हैं और उनकी जान को खतरा है। छोटे व्यवसाय और स्थानीय दबाव की दलीलें दी गईं। इस पर अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उन्हें सुरक्षा का इतना ही खतरा महसूस हो रहा है, तो वे शहर छोड़ दें। हालांकि, बाद में अदालत ने मामले की गंभीरता को समझते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता लोकेश खुराना की पुख्ता सुरक्षा सुनिश्चित करे।
आवास विकास परिषद के उप आवास आयुक्त अनिल कुमार सिंह ने स्पष्ट किया है कि सर्वोच्च अदालत के हर आदेश का अक्षरशः पालन कराया जाएगा। 9 दिसंबर की अगली सुनवाई तक मेरठ के व्यापारियों, निवासियों और प्रशासनिक अधिकारियों की धड़कनें तेज रहेंगी, क्योंकि शहर के एक बड़े हिस्से का ढांचागत भविष्य अब सीधे सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है।