मेरठ। उल्देपुर क्षेत्र में अवैध कॉलोनियों और निर्माणों के खिलाफ चल रही कार्रवाई के विरोध में शुक्रवार को उल्देपुर चौराहे के पास अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया। धरने में क्षेत्र के किसान, कॉलोनी विकसित करने वाले लोग, भूखंड और मकान खरीदने वाले लोग, शहर के व्यापारी तथा अस्पताल संचालक शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि जब तक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक नहीं लगती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
यह धरना संयुक्त मेरठ बचाओ आंदोलन समिति के अध्यक्ष रविंद्र गुर्जर के नेतृत्व में शुरू किया गया। आंदोलनकारियों ने केंद्र और प्रदेश सरकार से मांग की कि प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए कानूनी रास्ता निकाला जाए। उन्होंने या तो नया कानून बनाने या सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी पैरवी कर ध्वस्तीकरण के आदेश से राहत दिलाने की मांग रखी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बढ़ी हलचल
उल्देपुर में कार्रवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद तेज हुआ है। 21 सितंबर 2026 की सुनवाई के बाद जारी आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने उल्देपुर क्षेत्र में अवैध कॉलोनियों और निर्माणों को लेकर सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यहां मौजूद अवैध निर्माणों को जल्द ध्वस्त करने और ध्वस्तीकरण से निकलने वाले मलबे को नियमित रूप से हटाने के निर्देश मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) को दिए हैं।

कोर्ट ने इस पूरे मामले की गहन जांच के लिए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग गठित करने का भी आदेश दिया है। आयोग को उल्देपुर में जमीन के स्वामित्व, जमीन की खरीद-फरोख्त, कॉलोनियों के विकास और मेडा की भूमिका समेत कई बिंदुओं की जांच करनी है।
Follow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join ›आयोग यह भी जांच करेगा कि यदि जमीन निजी व्यक्तियों की थी तो उसके मालिकों और खरीदारों के बीच लेन-देन किस तरह हुआ। इसके साथ ही यह सवाल भी जांच के दायरे में है कि पिछले वर्षों में इन कॉलोनियों के विकसित होने के दौरान मेडा की ओर से कार्रवाई क्यों नहीं की गई और क्या किसी अधिकारी की भूमिका रही।
धरने में किसान, खरीदार और व्यापारी शामिल
शुक्रवार को शुरू हुए धरने में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। आयोजकों के अनुसार, इनमें उल्देपुर क्षेत्र के किसान, कॉलोनी मालिक, मकान और भूखंड खरीदने वाले लोग तथा शहर के व्यापारी और अस्पताल संचालक शामिल रहे।
रविंद्र गुर्जर ने कहा कि उल्देपुर क्षेत्र के कॉलोनी मालिकों और भूखंड खरीदने वाले लोगों ने उनसे मुलाकात कर ध्वस्तीकरण के खिलाफ आंदोलन में समर्थन मांगा था। इसके बाद आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया गया।
धरने को ओमप्रकाश पाल, गौरव सिंह, प्रवीण चौहान और उल्देपुर के पूर्व प्रधान शीतल चौहान समेत अन्य वक्ताओं ने संबोधित किया।
प्रदर्शनकारियों ने कार्रवाई को बताया एकतरफा
धरने के दौरान वक्ताओं ने आरोप लगाया कि अवैध निर्माणों के संबंध में संबंधित लोगों को पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। उनका दावा है कि जिन भवनों और कॉलोनियों को कार्रवाई के दायरे में रखा गया है, उनके मालिकों और खरीदारों की स्थिति को अलग-अलग तरीके से सुना जाना चाहिए।
रविंद्र गुर्जर और अन्य वक्ताओं ने आरोप लगाया कि पहले आवास विकास और अब मेरठ विकास प्राधिकरण की ओर से सुप्रीम कोर्ट के सामने अवैध निर्माणों से संबंधित जो जानकारी रखी गई, उसमें प्रभावित लोगों का पक्ष पर्याप्त रूप से सामने नहीं आया।
हालांकि, यह प्रदर्शनकारियों के आरोप हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में उल्देपुर में बिना स्वीकृत मानचित्र विकसित की गई कॉलोनियों और निर्माणों की स्थिति को लेकर अलग से जांच का प्रावधान किया गया है।
सरकार से कानून बनाने और सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की मांग
धरने के दौरान संयुक्त मेरठ बचाओ आंदोलन समिति के अध्यक्ष रविंद्र गुर्जर और किसान नेता विजय राघव ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की।
वक्ताओं ने कहा कि यदि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से आम लोगों के मकान और भूखंड प्रभावित होते हैं तो केंद्र या प्रदेश सरकार को उनके हितों को ध्यान में रखते हुए कानूनी समाधान तलाशना चाहिए। उन्होंने सरकार से नया कानून बनाने या सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी पैरवी कर राहत दिलाने की मांग की।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि जब तक कार्रवाई टालने या प्रभावित लोगों को राहत देने का कोई रास्ता नहीं निकलता, तब तक धरना जारी रहेगा।
कॉरपोरेट निर्माणों को लेकर भी उठाए सवाल
किसान नेता विजय राघव ने आरोप लगाया कि कार्रवाई में समानता का पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि मेरठ शहर में बड़ी कंपनियों और कॉरपोरेट संस्थानों से जुड़े भी कई ऐसे निर्माण हैं, जिन्हें वे अवैध मानते हैं।
उन्होंने मांग की कि यदि अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की जा रही है तो बड़े व्यावसायिक और कॉरपोरेट निर्माणों की भी जांच होनी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को एक सप्ताह में ऐसे कथित निर्माणों की सूची तैयार कर कार्रवाई के लिए सामने लाने की चेतावनी दी।
यह आरोप फिलहाल आंदोलनकारियों की ओर से लगाए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं हुई है।
उल्देपुर में क्या है सुप्रीम कोर्ट का रुख?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक उल्देपुर में अवैध आवासीय कॉलोनियों को लेकर पांच प्रमुख सवालों की जांच की जानी है। इनमें जमीन का स्वामित्व, जमीन मालिकों और खरीदारों के बीच लेन-देन, कॉलोनियों के विकास में संबंधित प्राधिकरण की भूमिका और अधिकारियों की संभावित जिम्मेदारी शामिल है।
कोर्ट ने मेडा को उल्देपुर में प्रत्येक अवैध निर्माण को जल्द से जल्द ध्वस्त करने का निर्देश दिया है। साथ ही ध्वस्तीकरण के बाद मलबा रोजाना हटाने को कहा गया है।
इस मामले में न्यायिक आयोग की जांच आगे की स्थिति के लिए महत्वपूर्ण होगी। आयोग के माध्यम से यह भी जांचा जाना है कि इन कॉलोनियों के विकास की प्रक्रिया क्या थी और संबंधित सरकारी एजेंसियों की इसमें क्या भूमिका रही।
16,726 निर्माणों का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में
मेरठ में अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख केवल उल्देपुर तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने शहर के जोन-ए में चिन्हित 16,726 अनधिकृत निर्माणों को लेकर भी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह मामला शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान सामने आया।
उल्देपुर के मामले में अब स्थानीय लोगों के धरने से प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है। फिलहाल प्रदर्शनकारियों ने धरना जारी रखने की घोषणा की है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत न्यायिक आयोग की जांच और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
नोट: अवैध निर्माण और कॉलोनियों को लेकर प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए आरोप उनके पक्ष का बयान हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और न्यायिक आयोग की जांच के आधार पर मामले के तथ्य आगे स्पष्ट होंगे।
Sabse pehle comment karne wale banein.