कुछ सपने और जुनून इंसान को सुरक्षित रास्तों से हटाकर एक नई मंजिल की ओर ले जाते हैं। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है 22 वर्षीय युवा गायिका दिज़ा सक्सेना ने। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) से ग्रेजुएशन करने के बाद स्पेन में एक शानदार कॉर्पोरेट करियर की शुरुआत करने वाली दिज़ा ने अचानक अपने जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने अपनी सुरक्षित नौकरी की कुर्सी को छोड़कर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत (Hindustani Classical Music) की दुनिया में अपना भविष्य बनाने का साहसिक फैसला लिया है।
आठ वर्षों की कड़ी ट्रेनिंग और सुरों का जुनून दिज़ा सक्सेना का यह फैसला रातोरात नहीं लिया गया था। इसके पीछे संगीत के प्रति उनका गहरा समर्पण और आठ वर्षों की हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की कठिन ट्रेनिंग है। इसी मजबूत आधार पर दिज़ा अब अपनी एक अलग पहचान गढ़ रही हैं। दिज़ा का जीवन अनुभवों से भरा रहा है; वह दुनिया के पांच अलग-अलग देशों में रह चुकी हैं और 50 से अधिक देशों की यात्रा कर चुकी हैं। दुबई की छोटी घरेलू महफ़िलों से शुरू हुआ उनका यह संगीतमय सफर अब मुंबई के बड़े मंचों तक पहुंच चुका है।
'बैठो ना' महफिल में परंपरा और Gen Z का दिखा संगम हाल ही में मुंबई में आयोजित 'बैठो ना' शाम के जरिए दिज़ा ने अपनी गायकी का शानदार प्रदर्शन किया। इस महफिल में उन्होंने सेमी-क्लासिकल, ग़ज़ल, उर्दू शायरी और मॉडर्न म्यूजिक का एक ऐसा अद्भुत संगम पेश किया, जिसमें भारतीय संगीत की पुरानी परंपरा के साथ-साथ आज की पीढ़ी (Gen Z) की ताजगी भी झलक रही थी।
दिज़ा ने अपनी मधुर आवाज में 'लग जा गले', 'इन आँखों की मस्ती' और अमीर खुसरो की मशहूर रचना 'छाप तिलक' जैसी बेहतरीन प्रस्तुतियां देकर वहां मौजूद सभी संगीतप्रेमियों का दिल जीत लिया। इसके अलावा उन्होंने गजल सम्राट जगजीत सिंह को भी अपनी गायकी के जरिए संगीतमय श्रद्धांजलि अर्पित की।
Follow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join ›विरासत को आज की जुबान में सुनाने की है चाहत भारतीय संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहीं दिज़ा सक्सेना का मानना है कि संगीत की असली खूबसूरती अपनी विरासत को सहेजने में है। वह चाहती हैं कि इस सदियों पुरानी सांगीतिक विरासत को आज की आधुनिक जुबान और शैली में पिरोकर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, ताकि हिंदुस्तानी संगीत का यह कारवां यूं ही आगे बढ़ता रहे।