भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया को लेकर एक ऐसा भूचाल आ गया है, जिसने सीधे तौर पर भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner - CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। CJP ने ज्ञानेश कुमार को पद से इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे का सख्त अल्टीमेटम दिया है। पार्टी का स्पष्ट कहना है कि यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर इस्तीफा नहीं दिया गया, तो पूरे देश में एक व्यापक जनांदोलन छेड़ा जाएगा और इसका केंद्र देश की राजधानी दिल्ली होगी।

यह पूरा विवाद स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (Special Intensive Revision - SIR) नामक मतदाता सत्यापन प्रक्रिया, चुनाव आयोग के भीतर चुनाव आयुक्तों के बीच गहरे मतभेद और करोड़ों मतदाताओं के वोटिंग अधिकार छीने जाने के गंभीर आरोपों के इर्द-गिर्द घूम रहा है।

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CJP का हल्ला बोल: "ज्ञानेश कुमार देश के सबसे बड़े गद्दार"

गुरुवार को दिल्ली में आयोजित एक खचाखच भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में CJP के फाउंडर अभिजीत दीपके ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधे और तीखे प्रहार किए। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को "देश का सबसे बड़ा गद्दार" तक करार दे दिया।

अभिजीत दीपके ने कहा कि SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया की आड़ में देश भर में एक बहुत बड़ा और सुनियोजित खेल खेला गया है। दीपके के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत पूरे देश से 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के वोट अवैध रूप से डिलीट (Delete) कर दिए गए हैं। उन्होंने इसे एक संवैधानिक संकट बताते हुए कहा, "लोकतंत्र का मूल आधार यही है कि जनता अपनी सरकार खुद चुने। लेकिन विडंबना देखिए, जब से ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठे हैं, तब से यह चुनाव आयोग नहीं, बल्कि सरकार खुद यह तय कर रही है कि देश में कौन वोट करेगा और कौन नहीं।"

दीपके का यह बयान ऐसे समय में आया है जब चुनाव आयोग की साख को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर है और अब इंडियन एक्सप्रेस (Indian Express) की एक रिपोर्ट ने आग में घी डालने का काम किया है।

इंडियन एक्सप्रेस का खुलासा: चुनाव आयोग के भीतर 14 बार दर्ज हुई लिखित आपत्ति

CJP के आरोपों को बल उस समय मिला जब बुधवार (23 सितंबर 2026) को प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक 'इंडियन एक्सप्रेस' ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट ने चुनाव आयोग जैसे सर्वोच्च बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय के भीतर चल रही गहरी खींचतान को बेनकाब कर दिया है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्तमान चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू (Sukhbir Singh Sandhu) और विवेक जोशी (Vivek Joshi) ने पिछले 10 महीनों में आयोग द्वारा लिए गए विभिन्न फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार अपनी लिखित आपत्तियां (Written Dissent/Objections) दर्ज कराई हैं। यह आपत्तियां 28 अक्टूबर 2025 से लेकर 14 अगस्त 2026 के बीच दर्ज की गईं।

इन आपत्तियों का मुख्य केंद्र मतदाता सूची (Voter List), नए वोटरों के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6, और केंद्रीकृत वोटर डेटाबेस से जुड़े संवेदनशील मुद्दे थे। रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने अपनी इन आपत्तियों की प्रतियां सीधे CEC ज्ञानेश कुमार को भी भेजी थीं, लेकिन उन पर कोई ठोस कार्रवाई या सुधार नहीं किया गया। यह पूरा विवाद मुख्य रूप से जून 2025 में बिहार से शुरू हुए SIR (Special Intensive Revision) अभियान के दौरान सतह पर आया।

ममता-केजरीवाल की सीटों पर वोट डिलीट: दीपके के 4 गंभीर आरोप

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अभिजीत दीपके ने केवल हवा में तीर नहीं चलाए, बल्कि पूरे राजनीतिक परिदृश्य को समझाते हुए 4 प्रमुख आरोप लगाए, जो यह दर्शाते हैं कि SIR की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए किया जा रहा है:

  1. 2024 के नतीजों के बाद BJP का डर: दीपके ने विश्लेषण करते हुए कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने दम पर स्पष्ट बहुमत हासिल करने में विफल रही। '400 पार' का अति-महत्वाकांक्षी नारा देने के बावजूद पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई। इसी परिणाम ने सत्ताधारी दल को यह अहसास करा दिया कि क्षेत्रीय पार्टियां (Regional Parties) अब बेहद मजबूत हो रही हैं और उनके किले को भेद रही हैं।

  2. क्षेत्रीय क्षत्रपों को एक-एक कर हराने की सुनियोजित साजिश: दीपके ने आरोप लगाया कि 2024 के चुनावों में जो भी प्रमुख विपक्षी नेता एक साथ आए थे और जिन्होंने भाजपा के खिलाफ मुखर होकर प्रचार किया था, उन्हें अब SIR के जरिए निशाना बनाया जा रहा है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार की NCP, तमिलनाडु में एमके स्टालिन, केरल में पिनराई विजयन, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी—इन सभी मुख्यमंत्रियों और कद्दावर नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में वोटर्स को टारगेट किया गया है। दीपके के अनुसार, "यह महज संयोग नहीं हो सकता कि इन सभी राज्यों में वोटिंग पैटर्न और वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ के आरोप लग रहे हैं।"

  3. संपूर्ण विपक्ष को खत्म करने का सवाल: CJP फाउंडर ने एक बड़ा लोकतांत्रिक सवाल खड़ा करते हुए कहा, "क्या यह कदम सिर्फ मजबूत विपक्षी नेताओं को खत्म करने के लिए उठाया गया था? हमें विपक्ष या किसी खास राजनीतिक पार्टी से कोई विशेष व्यक्तिगत लगाव नहीं है। हमारा मुद्दा देश का लोकतंत्र है। अगर किसी भी लोकतंत्र में पूरे विपक्ष को ही जड़ से खत्म कर दिया जाए, तो क्या उसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जा सकता है?"

चुनाव आयोग का पलटवार: 8 पॉइंट में दावों का जवाब और कुछ अहम मुद्दों पर साधी 'चुप्पी'

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और राजनीतिक हल्कों में मचे बवाल के बाद, 23 सितंबर की शाम को ही चुनाव आयोग (EC) को मजबूरन सामने आना पड़ा। आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर एक विस्तृत 8 सूत्रीय बयान जारी कर रिपोर्ट में किए गए दावों पर अपना आधिकारिक पक्ष रखा। हालांकि, इस बचाव में आयोग ने कुछ सवालों के तो तकनीकी जवाब दिए, लेकिन सबसे गंभीर सवालों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली।

EC का 8-पॉइंट डिफेंस और उसकी हकीकत:

  1. लिखित आपत्तियों पर जवाब: चुनाव आयुक्तों द्वारा 14 बार आपत्ति जताने के दावे पर EC ने कहा कि एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था (Multi-member body) में अलग-अलग राय, सुझाव या टिप्पणी आना एक बेहद 'सामान्य प्रक्रिया' है। आयोग ने तर्क दिया कि इससे फैसलों में पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया की शुद्धता सुनिश्चित होती है और अंतिम फैसला होने से पहले इस तरह की स्वस्थ चर्चा होना जरूरी है।

  2. नाम जोड़ने-हटाने का अधिकार: वोटर लिस्ट में नाम हटाने के आरोप पर आयोग ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह काम दिल्ली मुख्यालय से नहीं होता। राज्यों में जिला स्तर पर इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) और डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर (DEO) के पास यह कानूनी अधिकार होता है, जो जमीनी स्तर पर तय प्रक्रिया के तहत काम करते हैं।

  3. वोटर डेटा के केंद्रीकरण (Centralization) पर सफाई: ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की सुरक्षा पर उठे सवालों पर EC ने दावा किया कि ये सिस्टम सख्त डेटा सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं। किसी भी अनधिकृत बदलाव (Unauthorized manipulation) को रोकने के लिए पुख्ता IT सिक्योरिटी चेक और ऑडिट कंट्रोल लागू हैं।

  4. 'गैरकानूनी' कदमों के आरोप पर: आयोग ने स्पष्ट किया कि सभी आधिकारिक आदेश कानूनी प्रक्रिया और 2023 के नए चुनाव आयुक्त कानून के तहत ही जारी किए जाते हैं।

जिन दावों पर चुनाव आयोग ने साधी रहस्यमयी चुप्पी: आयोग का बचाव तब कमजोर पड़ गया जब उसने दो सबसे महत्वपूर्ण और संगीन दावों पर कोई भी सफाई पेश नहीं की।

  • दावा 5 (Form-6 में बदलाव): रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन वाले Form-6 में SIR से जुड़ा एक नया सवाल जोड़ा गया था, जिसमें आवेदक से पूछा गया था कि क्या उसके या माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR वोटर लिस्ट में था। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर संधू दोनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि 'नियमों में विधिवत बदलाव किए बिना' Form-6 के प्रारूप में इस तरह का बदलाव करना गैरकानूनी है। (इस पर EC ने कोई जवाब नहीं दिया)

  • दावा 6 (गोवा में 97 वोटरों का गायब होना): गोवा में SIR के दौरान 97 वैध वोटरों के नाम सिस्टम से हट गए थे। जांच में अधिकारियों ने गलती मानी और नाम दोबारा जोड़ने की सिफारिश की, लेकिन केंद्रीकृत ECINet सिस्टम में नाम वापस जोड़ने का कोई विकल्प (Option) ही मौजूद नहीं था। अधिकारी लगातार मांग करते रहे, लेकिन अंतिम सूची में वे 97 वोटर अपने अधिकार से वंचित रह गए। (इस तकनीकी और प्रशासनिक विफलता पर भी EC ने कुछ नहीं कहा)

इसके अतिरिक्त, आयोग ने रिपोर्ट को 'अधूरी तस्वीर' पेश करने वाला करार दिया और कहा कि पिछले 10 महीनों में आयोग ने 40 नई पहल की हैं। आयोग ने यह भी गिनाया कि उसने बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में सफलतापूर्वक बड़े चुनाव संपन्न कराए हैं।

क्या है SIR (Special Intensive Revision) और देश में इसका वर्तमान स्टेटस?

विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची को शुद्ध करने, फर्जी नामों को हटाने और नए वोटरों को जोड़ने की एक विशाल प्रक्रिया है। लेकिन जिस तरह से इस प्रक्रिया को लागू किया जा रहा है, उसने इसे विवादों में ला दिया है।

  • पहले और दूसरे फेज के परिणाम: SIR के पहले और दूसरे फेज में अब तक 10 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेश कवर किए जा चुके हैं। इस प्रक्रिया के बाद जिन राज्यों में चुनाव हुए, वहां के परिणाम भी काफी दिलचस्प रहे। बिहार, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी और असम विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जीत दर्ज की। वहीं, केरल में कांग्रेस गठबंधन और तमिलनाडु में TVK ने जीत हासिल की। असम में भी विशेष पुनरीक्षण (SR) के बाद भाजपा सरकार की सत्ता में वापसी हुई।

  • तीसरा फेज और 36.73 करोड़ वोटरों का भविष्य: चुनाव आयोग ने 14 मई को देश के 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के तीसरे फेज की घोषणा कर दी थी। इस लिस्ट में दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और उत्तराखंड जैसे राजनीतिक रूप से अति-संवेदनशील राज्य शामिल हैं। यह पूरी प्रक्रिया 30 मई से शुरू हो चुकी है और 23 दिसंबर तक चलेगी।

  • इस तीसरे फेज के तहत देश भर के 36.73 करोड़ वोटरों का सघन वेरिफिकेशन किया जा रहा है।

यह तीसरा फेज इसलिए भी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और राजनीतिक विवादों का केंद्र बन गया है क्योंकि जिन राज्यों में अभी SIR चल रहा है, उनमें से पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में अगले ही साल (2027) विधानसभा चुनाव होने हैं। शेष 13 राज्यों में 2028 और 2029 में चुनाव प्रस्तावित हैं।

ऐसे में CJP और अन्य विपक्षी दलों का यह डर लाजिमी है कि यदि SIR की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और चुनाव आयोग के भीतर ही शीर्ष अधिकारियों (चुनाव आयुक्तों) की आपत्तियों को दरकिनार किया जाता रहा, तो आगामी चुनावों की निष्पक्षता पूरी तरह से सवालों के घेरे में आ जाएगी। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार CJP के 48 घंटे के अल्टीमेटम का कोई जवाब देंगे, या देश को एक बार फिर चुनाव आयोग मुख्यालय के बाहर बड़े जन-आंदोलन और राजनीतिक टकराव का गवाह बनना पड़ेगा।

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया को लेकर एक ऐसा भूचाल आ गया है, जिसने सीधे तौर पर भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner - CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। CJP ने ज्ञानेश कुमार को पद से इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे का सख्त अल्टीमेटम दिया है। पार्टी का स्पष्ट कहना है कि यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर इस्तीफा नहीं दिया गया, तो पूरे देश में एक व्यापक जनांदोलन छेड़ा जाएगा और इसका केंद्र देश की राजधानी दिल्ली होगी।

यह पूरा विवाद स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (Special Intensive Revision - SIR) नामक मतदाता सत्यापन प्रक्रिया, चुनाव आयोग के भीतर चुनाव आयुक्तों के बीच गहरे मतभेद और करोड़ों मतदाताओं के वोटिंग अधिकार छीने जाने के गंभीर आरोपों के इर्द-गिर्द घूम रहा है।

CJP का हल्ला बोल: "ज्ञानेश कुमार देश के सबसे बड़े गद्दार"

गुरुवार को दिल्ली में आयोजित एक खचाखच भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में CJP के फाउंडर अभिजीत दीपके ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधे और तीखे प्रहार किए। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को "देश का सबसे बड़ा गद्दार" तक करार दे दिया।

अभिजीत दीपके ने कहा कि SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया की आड़ में देश भर में एक बहुत बड़ा और सुनियोजित खेल खेला गया है। दीपके के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत पूरे देश से 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के वोट अवैध रूप से डिलीट (Delete) कर दिए गए हैं। उन्होंने इसे एक संवैधानिक संकट बताते हुए कहा, "लोकतंत्र का मूल आधार यही है कि जनता अपनी सरकार खुद चुने। लेकिन विडंबना देखिए, जब से ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठे हैं, तब से यह चुनाव आयोग नहीं, बल्कि सरकार खुद यह तय कर रही है कि देश में कौन वोट करेगा और कौन नहीं।"

दीपके का यह बयान ऐसे समय में आया है जब चुनाव आयोग की साख को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर है और अब इंडियन एक्सप्रेस (Indian Express) की एक रिपोर्ट ने आग में घी डालने का काम किया है।

इंडियन एक्सप्रेस का खुलासा: चुनाव आयोग के भीतर 14 बार दर्ज हुई लिखित आपत्ति

CJP के आरोपों को बल उस समय मिला जब बुधवार (23 सितंबर 2026) को प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक 'इंडियन एक्सप्रेस' ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट ने चुनाव आयोग जैसे सर्वोच्च बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय के भीतर चल रही गहरी खींचतान को बेनकाब कर दिया है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्तमान चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू (Sukhbir Singh Sandhu) और विवेक जोशी (Vivek Joshi) ने पिछले 10 महीनों में आयोग द्वारा लिए गए विभिन्न फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार अपनी लिखित आपत्तियां (Written Dissent/Objections) दर्ज कराई हैं। यह आपत्तियां 28 अक्टूबर 2025 से लेकर 14 अगस्त 2026 के बीच दर्ज की गईं।

इन आपत्तियों का मुख्य केंद्र मतदाता सूची (Voter List), नए वोटरों के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6, और केंद्रीकृत वोटर डेटाबेस से जुड़े संवेदनशील मुद्दे थे। रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने अपनी इन आपत्तियों की प्रतियां सीधे CEC ज्ञानेश कुमार को भी भेजी थीं, लेकिन उन पर कोई ठोस कार्रवाई या सुधार नहीं किया गया। यह पूरा विवाद मुख्य रूप से जून 2025 में बिहार से शुरू हुए SIR (Special Intensive Revision) अभियान के दौरान सतह पर आया।

ममता-केजरीवाल की सीटों पर वोट डिलीट: दीपके के 4 गंभीर आरोप

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अभिजीत दीपके ने केवल हवा में तीर नहीं चलाए, बल्कि पूरे राजनीतिक परिदृश्य को समझाते हुए 4 प्रमुख आरोप लगाए, जो यह दर्शाते हैं कि SIR की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए किया जा रहा है:

  1. 2024 के नतीजों के बाद BJP का डर: दीपके ने विश्लेषण करते हुए कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने दम पर स्पष्ट बहुमत हासिल करने में विफल रही। '400 पार' का अति-महत्वाकांक्षी नारा देने के बावजूद पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई। इसी परिणाम ने सत्ताधारी दल को यह अहसास करा दिया कि क्षेत्रीय पार्टियां (Regional Parties) अब बेहद मजबूत हो रही हैं और उनके किले को भेद रही हैं।

  2. क्षेत्रीय क्षत्रपों को एक-एक कर हराने की सुनियोजित साजिश: दीपके ने आरोप लगाया कि 2024 के चुनावों में जो भी प्रमुख विपक्षी नेता एक साथ आए थे और जिन्होंने भाजपा के खिलाफ मुखर होकर प्रचार किया था, उन्हें अब SIR के जरिए निशाना बनाया जा रहा है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार की NCP, तमिलनाडु में एमके स्टालिन, केरल में पिनराई विजयन, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी—इन सभी मुख्यमंत्रियों और कद्दावर नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में वोटर्स को टारगेट किया गया है। दीपके के अनुसार, "यह महज संयोग नहीं हो सकता कि इन सभी राज्यों में वोटिंग पैटर्न और वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ के आरोप लग रहे हैं।"

  3. संपूर्ण विपक्ष को खत्म करने का सवाल: CJP फाउंडर ने एक बड़ा लोकतांत्रिक सवाल खड़ा करते हुए कहा, "क्या यह कदम सिर्फ मजबूत विपक्षी नेताओं को खत्म करने के लिए उठाया गया था? हमें विपक्ष या किसी खास राजनीतिक पार्टी से कोई विशेष व्यक्तिगत लगाव नहीं है। हमारा मुद्दा देश का लोकतंत्र है। अगर किसी भी लोकतंत्र में पूरे विपक्ष को ही जड़ से खत्म कर दिया जाए, तो क्या उसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जा सकता है?"

चुनाव आयोग का पलटवार: 8 पॉइंट में दावों का जवाब और कुछ अहम मुद्दों पर साधी 'चुप्पी'

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और राजनीतिक हल्कों में मचे बवाल के बाद, 23 सितंबर की शाम को ही चुनाव आयोग (EC) को मजबूरन सामने आना पड़ा। आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर एक विस्तृत 8 सूत्रीय बयान जारी कर रिपोर्ट में किए गए दावों पर अपना आधिकारिक पक्ष रखा। हालांकि, इस बचाव में आयोग ने कुछ सवालों के तो तकनीकी जवाब दिए, लेकिन सबसे गंभीर सवालों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली।

EC का 8-पॉइंट डिफेंस और उसकी हकीकत:

  1. लिखित आपत्तियों पर जवाब: चुनाव आयुक्तों द्वारा 14 बार आपत्ति जताने के दावे पर EC ने कहा कि एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था (Multi-member body) में अलग-अलग राय, सुझाव या टिप्पणी आना एक बेहद 'सामान्य प्रक्रिया' है। आयोग ने तर्क दिया कि इससे फैसलों में पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया की शुद्धता सुनिश्चित होती है और अंतिम फैसला होने से पहले इस तरह की स्वस्थ चर्चा होना जरूरी है।

  2. नाम जोड़ने-हटाने का अधिकार: वोटर लिस्ट में नाम हटाने के आरोप पर आयोग ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह काम दिल्ली मुख्यालय से नहीं होता। राज्यों में जिला स्तर पर इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) और डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर (DEO) के पास यह कानूनी अधिकार होता है, जो जमीनी स्तर पर तय प्रक्रिया के तहत काम करते हैं।

  3. वोटर डेटा के केंद्रीकरण (Centralization) पर सफाई: ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की सुरक्षा पर उठे सवालों पर EC ने दावा किया कि ये सिस्टम सख्त डेटा सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं। किसी भी अनधिकृत बदलाव (Unauthorized manipulation) को रोकने के लिए पुख्ता IT सिक्योरिटी चेक और ऑडिट कंट्रोल लागू हैं।

  4. 'गैरकानूनी' कदमों के आरोप पर: आयोग ने स्पष्ट किया कि सभी आधिकारिक आदेश कानूनी प्रक्रिया और 2023 के नए चुनाव आयुक्त कानून के तहत ही जारी किए जाते हैं।

जिन दावों पर चुनाव आयोग ने साधी रहस्यमयी चुप्पी: आयोग का बचाव तब कमजोर पड़ गया जब उसने दो सबसे महत्वपूर्ण और संगीन दावों पर कोई भी सफाई पेश नहीं की।

  • दावा 5 (Form-6 में बदलाव): रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन वाले Form-6 में SIR से जुड़ा एक नया सवाल जोड़ा गया था, जिसमें आवेदक से पूछा गया था कि क्या उसके या माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR वोटर लिस्ट में था। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर संधू दोनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि 'नियमों में विधिवत बदलाव किए बिना' Form-6 के प्रारूप में इस तरह का बदलाव करना गैरकानूनी है। (इस पर EC ने कोई जवाब नहीं दिया)

  • दावा 6 (गोवा में 97 वोटरों का गायब होना): गोवा में SIR के दौरान 97 वैध वोटरों के नाम सिस्टम से हट गए थे। जांच में अधिकारियों ने गलती मानी और नाम दोबारा जोड़ने की सिफारिश की, लेकिन केंद्रीकृत ECINet सिस्टम में नाम वापस जोड़ने का कोई विकल्प (Option) ही मौजूद नहीं था। अधिकारी लगातार मांग करते रहे, लेकिन अंतिम सूची में वे 97 वोटर अपने अधिकार से वंचित रह गए। (इस तकनीकी और प्रशासनिक विफलता पर भी EC ने कुछ नहीं कहा)

इसके अतिरिक्त, आयोग ने रिपोर्ट को 'अधूरी तस्वीर' पेश करने वाला करार दिया और कहा कि पिछले 10 महीनों में आयोग ने 40 नई पहल की हैं। आयोग ने यह भी गिनाया कि उसने बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में सफलतापूर्वक बड़े चुनाव संपन्न कराए हैं।

क्या है SIR (Special Intensive Revision) और देश में इसका वर्तमान स्टेटस?

विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची को शुद्ध करने, फर्जी नामों को हटाने और नए वोटरों को जोड़ने की एक विशाल प्रक्रिया है। लेकिन जिस तरह से इस प्रक्रिया को लागू किया जा रहा है, उसने इसे विवादों में ला दिया है।

  • पहले और दूसरे फेज के परिणाम: SIR के पहले और दूसरे फेज में अब तक 10 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेश कवर किए जा चुके हैं। इस प्रक्रिया के बाद जिन राज्यों में चुनाव हुए, वहां के परिणाम भी काफी दिलचस्प रहे। बिहार, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी और असम विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जीत दर्ज की। वहीं, केरल में कांग्रेस गठबंधन और तमिलनाडु में TVK ने जीत हासिल की। असम में भी विशेष पुनरीक्षण (SR) के बाद भाजपा सरकार की सत्ता में वापसी हुई।

  • तीसरा फेज और 36.73 करोड़ वोटरों का भविष्य: चुनाव आयोग ने 14 मई को देश के 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के तीसरे फेज की घोषणा कर दी थी। इस लिस्ट में दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और उत्तराखंड जैसे राजनीतिक रूप से अति-संवेदनशील राज्य शामिल हैं। यह पूरी प्रक्रिया 30 मई से शुरू हो चुकी है और 23 दिसंबर तक चलेगी।

  • इस तीसरे फेज के तहत देश भर के 36.73 करोड़ वोटरों का सघन वेरिफिकेशन किया जा रहा है।

यह तीसरा फेज इसलिए भी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और राजनीतिक विवादों का केंद्र बन गया है क्योंकि जिन राज्यों में अभी SIR चल रहा है, उनमें से पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में अगले ही साल (2027) विधानसभा चुनाव होने हैं। शेष 13 राज्यों में 2028 और 2029 में चुनाव प्रस्तावित हैं।

ऐसे में CJP और अन्य विपक्षी दलों का यह डर लाजिमी है कि यदि SIR की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और चुनाव आयोग के भीतर ही शीर्ष अधिकारियों (चुनाव आयुक्तों) की आपत्तियों को दरकिनार किया जाता रहा, तो आगामी चुनावों की निष्पक्षता पूरी तरह से सवालों के घेरे में आ जाएगी। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार CJP के 48 घंटे के अल्टीमेटम का कोई जवाब देंगे, या देश को एक बार फिर चुनाव आयोग मुख्यालय के बाहर बड़े जन-आंदोलन और राजनीतिक टकराव का गवाह बनना पड़ेगा।

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