देश के छह प्रमुख राज्यों—उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान—की पानी और बिजली की भारी जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से बनाई जा रही महत्वाकांक्षी 'किशाऊ बांध परियोजना' (Kishau Dam Project) अब एक बड़े जनविरोध के भंवर में फंसती नजर आ रही है।
टोंस नदी पर प्रस्तावित इस राष्ट्रीय परियोजना को लेकर हाल ही में लाभार्थी राज्यों के बीच हुए समझौते के बाद काम में तेजी आई है, लेकिन इसी तेजी ने स्थानीय जनजातीय समुदायों के सब्र का बांध तोड़ दिया है।
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के सीमांत इलाकों में रहने वाले जौनसार-बावर और हाटी समुदाय के लोगों ने अपने वजूद, जमीन और संस्कृति को बचाने के लिए आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।
कुवाणु में चक्का जाम, दिल्ली तक आंदोलन की चेतावनी परियोजना के संभावित प्रभावों से आक्रोशित उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 12 से अधिक प्रभावित गांवों के निवासियों ने गुरुवार को उत्तराखंड के कुवाणु में जोरदार प्रदर्शन किया।
Follow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join ›इस दौरान ग्रामीणों ने चक्का जाम कर दिया, जिससे दिनभर दोनों राज्यों और पर्वतीय अंचलों को जोड़ने वाला मुख्य संपर्क मार्ग पूरी तरह ठप रहा। प्रदर्शनकारियों ने शासन और प्रशासन को सीधी और साफ चेतावनी दी है कि यदि बांध की साइट को उनकी बस्तियों से दूर शिफ्ट नहीं किया गया, तो यह स्थानीय आंदोलन जल्द ही देहरादून और शिमला की सीमाओं को पार कर दिल्ली के जंतर-मंतर और सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंचेगा।
आंदोलन को धार देने के लिए दोनों राज्यों के प्रभावित लोग मिलकर एक 'संयुक्त संघर्ष समिति' का गठन कर रहे हैं। इस समिति के बैनर तले अगले कुछ ही दिनों में हिमाचल प्रदेश के सिलाई क्षेत्र में भी एक बड़ा आंदोलन प्रस्तावित है।
30 किलोमीटर लंबी झील में समा जाएगी सदियों पुरानी संस्कृति किशाऊ बांध संघर्ष समिति के अध्यक्ष सूर्य प्रताप चौहान ने आंदोलन का नेतृत्व करते हुए स्पष्ट किया कि टोंस नदी महज एक जलस्रोत नहीं है, बल्कि इसके दोनों तटों पर सदियों पुरानी जनजातीय विरासत बसती है। नदी के एक छोर पर उत्तराखंड का प्रसिद्ध जौनसार जनजातीय क्षेत्र है, तो दूसरे छोर पर हिमाचल का ऐतिहासिक हाटी जनजातीय इलाका स्थित है।
चौहान के मुताबिक, 236 मीटर ऊंचे इस बांध के निर्माण से पीछे की ओर लगभग 30 किलोमीटर लंबा एक विशाल जलाशय बनेगा। यह कृत्रिम झील दोनों ही तरफ मौजूद उपजाऊ कृषि भूमि, आबाद गांवों और सदियों पुरानी अनूठी सांस्कृतिक पहचान को हमेशा के लिए जलमग्न कर देगी। कुवाणु इलाके की एक बहुत बड़ी और उपजाऊ जमीन इस डूब क्षेत्र की चपेट में आ जाएगी।
संघर्ष समिति ने यह स्पष्ट किया है कि वे देश के विकास, ग्रामीण उत्थान या राष्ट्रीय महत्व की इस परियोजना के पूरी तरह खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उनकी एकमात्र मांग यह है कि बांध के निर्माण स्थल (साइट) को ऐसी जगह शिफ्ट किया जाए, जिससे इन प्राचीन जनजातीय बस्तियों का दर्दनाक विस्थापन न हो।
खतरे में 'एशिया की जिंजर वैली' और करोड़ों की आर्थिकी स्थानीय लोगों की यह लड़ाई सिर्फ अपने घरों और विस्थापन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की करोड़ों रुपये की मजबूत कृषि अर्थव्यवस्था के वजूद को बचाने की भी है। टोंस नदी के पार हिमाचल प्रदेश का सिरमौर जिला स्थित है।
इस क्षेत्र को यहां होने वाले उच्च गुणवत्ता और बेहतरीन किस्म के अदरक उत्पादन के कारण 'एशिया की जिंजर वैली' (Asia's Ginger Valley) के नाम से जाना जाता है। हिमाचल प्रदेश से इस जन आंदोलन का नेतृत्व करने पहुंचे सुरेंद्र चौहान ने सरकार को आगाह किया कि यह बांध केवल ईंट-पत्थर के घरों को ही नहीं डुबोएगा, बल्कि स्थानीय किसानों की आर्थिकी की रीढ़ को भी हमेशा के लिए तोड़ देगा।
उन्होंने कहा कि जिस उपजाऊ मिट्टी ने सिरमौर के अदरक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक खास पहचान और प्रसिद्धि दिलाई है, वह विकास के नाम पर पानी के नीचे दफन हो जाएगी। अपनी आजीविका, जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए दोनों राज्यों के सीमांत लोग एकजुट हो चुके हैं और उन्होंने अंतिम सांस तक इस विनाशकारी विस्थापन से लड़ने का संकल्प लिया है।
1930 से प्रस्तावित है यह ऐतिहासिक बांध परियोजना टोंस नदी पर किशाऊ बांध बनाने का विचार कोई नया नहीं है। इस परियोजना की नींव 1930 के दशक में ही पड़ गई थी, जब ब्रिटिश इंजीनियरों ने इस क्षेत्र में जल-भंडारण की संभावनाओं को लेकर पहला सर्वे किया था। देश की आजादी के बाद 1960 के दशक में इसका एक औपचारिक और विस्तृत खाका तैयार किया गया।
इसके रणनीतिक और बहुउद्देश्यीय महत्व को देखते हुए वर्ष 2008 में भारत सरकार ने इसे 'राष्ट्रीय परियोजना' (National Project) घोषित कर दिया था। इस 236 मीटर ऊंचे बांध और इसकी 30 किलोमीटर लंबी झील के माध्यम से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को न केवल साल भर भरपूर पानी मिलना है, बल्कि इससे 660 मेगावाट स्वच्छ बिजली का उत्पादन भी होना है। हालांकि, अब सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती विकास की इस रूपरेखा और स्थानीय जनजातीय समुदायों के अस्तित्व के बीच संतुलन स्थापित करने की है।
Sabse pehle comment karne wale banein.