नई दिल्ली: NEET परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ी और पेपर लीक मामले को लेकर देश भर में हुए चौतरफा विरोध प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट से प्रदर्शनकारी छात्रों के लिए राहत भरी खबर आई है। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को आश्वस्त किया है कि विरोध प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या कानूनी कार्रवाई (FIR) नहीं की जाएगी।READ ALSO:-बिजनौर में गंगा का रौद्र रूप: बहसूमा-ठाकुरद्वारा स्टेट हाईवे पर तेज बहाव से भारी कटान, सड़क पर बना 10 फीट चौड़ा नाला; दहशत में खादर के ग्रामीण
\r\n\r\n\r\n\r\nसोमवार को सुनवाई के दौरान सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि सरकार अपने वादे पर पूरी तरह कायम है और छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन पर दर्ज मामलों को वापस लेने के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी। हालांकि, सरकार ने यह भी साफ कर दिया कि प्रदर्शन की आड़ में गंभीर अपराधों और हिंसा को अंजाम देने वाले 2,700 से अधिक लोगों पर दर्ज FIR वापस नहीं होंगी।
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\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: "अत्यधिक बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मी भी नहीं बचेंगे"
\r\n\r\nचीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस और प्रदर्शनकारी दोनों को ही अपनी जवाबदेही तय करनी होगी।
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\r\n\r\n\r\nCJI सूर्यकांत की टिप्पणी: "यदि किसी पुलिस अधिकारी ने प्रदर्शनकारियों पर आवश्यकता से अधिक बल का प्रयोग किया है, तो उसे बेवजह बचाया नहीं जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि छात्रों के आंदोलन की आड़ में कोई कुख्यात अपराधी कानून के शिकंजे से छूट न जाए।"\r\n
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सुप्रीम कोर्ट की जांच का मुख्य फोकस: SIT गठन पर विचार
\r\n\r\nमामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट अब दो मुख्य पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर रहा है:
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- \r\n पूर्व जज की अगुआई में SIT: पैलेट गन के इस्तेमाल से घायल हुए लोगों और पुलिस बर्बरता के आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष जांच टीम (SIT) का गठन किया जा सकता है।\r\n \r\n
- \r\n उपद्रवियों की पहचान: कोर्ट यह तय करेगा कि संसद मार्च के दौरान पुलिस बल पर हमला वास्तविक छात्रों ने किया था या भीड़ में शामिल शरारती तत्वों (असामाजिक तत्वों) ने माहौल बिगाड़ा था।\r\n \r\n
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digital Evidence सुरक्षित रखने के कड़े निर्देश
\r\n\r\nइससे पहले 28 जुलाई की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया था कि प्रदर्शनकारियों पर कोई भी कठोर दंडात्मक कदम न उठाया जाए।
\r\n\r\n\r\n\r\nकोर्ट ने महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल की सरकारों को नोटिस जारी करते हुए निम्नलिखित डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित (Preserve) रखने का आदेश दिया था:
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- \r\n CCTV फुटेज और ड्रोन रिकॉर्डिंग।\r\n \r\n
- \r\n पुलिसकर्मियों के बॉडी-कैमरा (Body-Cam) फुटेज।\r\n \r\n
- \r\n वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड और PCR लॉग।\r\n \r\n
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अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि 18 वर्ष से कम उम्र के ऐसे सभी नाबालिगों को तुरंत रिहा किया जाए, जिनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
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20 जुलाई का 'संसद मार्च' और 36 दिनों का आंदोलन
\r\n\r\nNEET पेपर लीक विवाद को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले दिल्ली के जंतर-मंतर पर 36 दिनों तक लंबा आंदोलन चला।
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- \r\n 20 जुलाई की घटना: CJP के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन की ओर रुख किया, जहां सुरक्षाकर्मियों और भीड़ के बीच तीखी झड़पें हुईं। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े।\r\n \r\n
- \r\n 3 मांगों पर सहमति: प्रदर्शनकारियों ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, पीड़ित परिवारों को मुआवजे और प्रदर्शनकारियों पर कानूनी कार्रवाई न करने की मांग रखी थी।\r\n \r\n
- \r\n 25 जुलाई को आंदोलन समाप्त: 25 जुलाई को सरकार द्वारा मांगें स्वीकार करने और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद 36 दिनों से चल रहा यह आंदोलन समाप्त घोषित किया गया।\r\n \r\n
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'फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी' (FRT) पर नया कानूनी मोड़
\r\n\r\nइस पूरे मामले में एक नया पहलू तब जुड़ा जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के केरल से राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
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- \r\n याचिका की मुख्य मांग: प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा इस्तेमाल की गई Facial Recognition Technology (FRT) और बायोमेट्रिक निगरानी को चुनौती दी गई है।\r\n \r\n
- \r\n तर्क: याचिकाकर्ता का कहना है कि शांतिपूर्ण बैठकों या सार्वजनिक सभाओं में आम नागरिकों की इस तरह बिना सहमति के बायोमेट्रिक निगरानी करना उनके मौलिक अधिकारों और निजता का सीधा उल्लंघन (Unconstitutional) है।\r\n \r\n
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CJP से जुड़ी याचिकाओं का इतिहास (सुप्रीम कोर्ट का रुख)
\r\n\r\nकॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और आंदोलन से जुड़ी याचिकाएं पहले भी तीन बार सुप्रीम कोर्ट के सामने आ चुकी हैं:
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| \r\n क्रम \r\n | \r\n \r\n तिथि \r\n | \r\n \r\n याचिकाकर्ता की मांग \r\n | \r\n \r\n सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी / फैसला \r\n | \r\n
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| \r\n 1. \r\n | \r\n \r\n 24 मई \r\n | \r\n \r\n CJP संस्थापकों की गतिविधियों की CBI जांच और अदालती बयानों के व्यवसायीकरण पर रोक। \r\n | \r\n \r\n CJI बेंच ने कहा- "इसे इतनी भावुकता से मत लें, अभी कोई गंभीर आपात स्थिति नहीं है।" \r\n | \r\n
| \r\n 2. \r\n | \r\n \r\n 22 जुलाई \r\n | \r\n \r\n समर्थकों पर लाठीचार्ज के वीडियो देखकर त्वरित सुनवाई की मांग। \r\n | \r\n \r\n CJI ने कहा- "हमें वीडियो देखने में रुचि नहीं है, हमारा और अपना समय बर्बाद मत कीजिए।" \r\n | \r\n
| \r\n 3. \r\n | \r\n \r\n 24 जुलाई \r\n | \r\n \r\n पुलिस हिंसा पर नियंत्रण और राज्यों को पक्षकार बनाने की अर्जी। \r\n | \r\n \r\n CJI ने सुनवाई के लिए लिस्टिंग का आश्वासन दिया और कहा कि कोर्ट ने कभी याचिका खारिज नहीं की थी। \r\n | \r\n
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आगे क्या? 18 अगस्त की तारीख पर टिकीं निगाहें
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर 18 अगस्त को अगली सुनवाई करेगा। 18 अगस्त को यह साफ हो जाएगा कि SIT का गठन किस ढांचे के तहत होगा और राज्यों द्वारा पेश किए गए डिजिटल सबूतों के आधार पर पुलिस व उपद्रवियों की भूमिका पर क्या नया कानूनी फैसला आता है। फिलहाल, केंद्र सरकार के रुख से निर्दोष छात्रों ने राहत की सांस ली है।


