पश्चिमी उत्तर प्रदेश की क्रांतिधरा मेरठ में किसानों का गुस्सा एक बार फिर सातवें आसमान पर है। शहर के अति-सुरक्षित माने जाने वाले गन्ना भवन (Sugarcane Bhavan) में पिछले पांच दिनों से चल रहा भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) का शांतिपूर्ण धरना शुक्रवार को अचानक एक भयावह मंजर में तब्दील हो गया।READ ALSO:-दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर फिर लगा 'ब्रेक': 5वें फेज के लिए अब अप्रैल 2026 तक का इंतजार, गंगा एक्सप्रेसवे का सफर अभी दूर
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सोमवार से अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे किसानों के सब्र का बांध शुक्रवार दोपहर तब टूट गया, जब अधिकारियों की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई। आक्रोशित किसान अपने कपड़े उतारकर अर्धनग्न अवस्था में गन्ना भवन की बहुमंजिला इमारत की छत पर चढ़ गए और वहां से कूदकर आत्मदाह (Mass Suicide) करने का प्रयास किया। इस घटना ने पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया। पुलिस की गाड़ियों के सायरन गूंजने लगे और मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
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शुक्रवार का घटनाक्रम: छत पर मौत से रूबरू होते किसान
\r\n\r\nशुक्रवार का दिन मेरठ प्रशासन के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। भाकियू टिकैत गुट के कार्यकर्ता सोमवार से ही गन्ना भवन परिसर में डेरा डाले हुए थे। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि लगातार पांच दिन बीत जाने के बाद भी विभाग का कोई सक्षम अधिकारी उनसे ठोस बात करने को तैयार नहीं था।
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दोपहर होते-होते किसानों का धैर्य जवाब दे गया। प्रदर्शनकारी किसानों का एक समूह अचानक अर्धनग्न हो गया और सुरक्षाकर्मियों को चकमा देते हुए भवन की छत पर जा चढ़ा। छत के किनारे खड़े होकर उन्होंने नीचे कूदने की धमकी दी। यह दृश्य देख नीचे मौजूद पुलिसकर्मियों और अन्य किसानों की सांसें अटक गईं।
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पुलिस और नेताओं की मशक्कत
\r\n\r\nमौके पर मौजूद पुलिस बल ने तुरंत स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन किसान किसी की सुनने को तैयार नहीं थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भाकियू (टिकैत) के जिला अध्यक्ष अनुराग चौधरी ने मोर्चा संभाला। उन्होंने पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर छत पर चढ़े किसानों से संवाद स्थापित किया। काफी देर तक चली मान-मनौव्वल और आश्वासन के बाद, आक्रोशित किसान नीचे उतरने को राजी हुए। अगर समय रहते उन्हें नहीं रोका जाता, तो मेरठ में एक बड़ा हादसा हो सकता था।
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क्यों उग्र हुए किसान? क्या हैं उनकी मांगें?
\r\n\r\nयह पूरा बवाल केवल एक दिन के गुस्से का नतीजा नहीं है, बल्कि यह गन्ना विभाग की नीतियों के खिलाफ लंबे समय से सुलग रहे असंतोष का परिणाम है। किसानों ने अपनी प्रमुख मांगें स्पष्ट कर दी हैं, जिन पर वे कोई समझौता करने के मूड में नहीं हैं।
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1. भाड़ा वृद्धि वापस ली जाए
\r\n\r\nकिसानों की सबसे प्रमुख मांग गन्ना ढुलाई भाड़े (Freight Charges) को लेकर है। किसानों का कहना है कि इस सत्र में भाड़ा बढ़ा दिया गया है, जो उनकी जेब पर सीधा डाका है। उनकी मांग है कि बढ़ाया गया भाड़ा वापस लिया जाए और पिछले साल (गत वर्ष) वाली दरों को ही लागू किया जाए। डीजल और खाद की महंगाई से पहले ही जूझ रहे किसान पर अतिरिक्त भाड़े का बोझ अन्यायपूर्ण है।
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2. पेराई सत्र के नियम
\r\n\r\nकिसानों ने दूसरी बड़ी आपत्ति पेराई सत्र के नियमों (Crushing Rules) को लेकर जताई है। उनका कहना है कि विभाग ने इस बार नए और जटिल नियम थोप दिए हैं, जिससे गन्ना आपूर्ति में बाधा आ रही है। किसानों की मांग है कि जिन नियमों और शर्तों के साथ पिछले सत्र में मिलों ने पेराई की थी, उसी प्रक्रिया को इस बार भी अपनाया जाए। नए प्रयोगों से किसान परेशान हो रहे हैं।
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नारेबाजी और आक्रोश: "अधिकारी हठधर्मिता छोड़ें"
\r\n\r\nजिस समय किसान छत पर चढ़कर आत्मदाह की चेतावनी दे रहे थे, उसी समय नीचे परिसर में मौजूद सैकड़ों किसानों ने "उप गन्ना आयुक्त हाय-हाय" के गगनभेदी नारे लगाए। किसानों ने विभाग के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली।
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आंदोलनकारियों का कहना है कि गन्ना विभाग के अधिकारी "हठधर्मिता" (Stubbornness) पर उतर आए हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अन्नदाता ठंड में खुले आसमान के नीचे बैठा है या अपनी जान देने पर उतारू है।
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जिला अध्यक्ष का बयान: "धमकियों से नहीं डरेंगे"
\r\n\r\nभाकियू के जिला अध्यक्ष अनुराग चौधरी ने मीडिया से बात करते हुए अधिकारियों के रवैये की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा:
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\r\n\r\n\r\n"हमारे किसान पिछले पांच दिनों से बेहद शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख रहे थे। लेकिन अधिकारियों का रवैया न केवल नकारात्मक है, बल्कि अपमानजनक भी है। अधिकारी समाधान निकालने के बजाय किसानों को सदस्यता खत्म करने और झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल भेजने की धमकियां दे रहे हैं। जब संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं, तब ही किसान ऐसे कदम उठाने पर मजबूर होता है।"\r\n
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96 वर्षीय बुजुर्ग का दर्द: "हक के लिए दे देंगे प्राणों की आहुति"
\r\n\r\nधरना स्थल पर मौजूद एक चेहरा ऐसा भी था, जिसकी झुर्रियों में भारतीय कृषि का संघर्ष साफ दिखाई दे रहा था। 96 वर्षीय बुजुर्ग किसान मेजर चिंदोड़ी ने कांपती आवाज़ लेकिन बुलंद हौसले के साथ अपनी व्यथा सुनाई।
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मेजर चिंदोड़ी ने कहा:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"हम यहां शौक के लिए नहीं बैठे हैं। हम अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। एक किसान साल भर खून-पसीने से धरती सींचता है और गन्ना पैदा करता है। बदले में उसे क्या मिलता है? न तो उसकी मेहनत का सही दाम मिलता है और जो थोड़ा-बहुत तय होता है, वह भी समय पर नहीं मिलता। ऊपर से ऐसे नियम बना दिए जाते हैं जो हमें गुलाम महसूस कराते हैं। अगर सरकार और अधिकारी नहीं सुनेंगे, तो हम अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटेंगे।"\r\n
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प्रशासन की भूमिका पर सवाल
\r\n\r\nशुक्रवार की घटना ने स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
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- \r\n संवादहीनता: जब सोमवार से धरना चल रहा था, तो पांच दिनों तक किसी जिम्मेदार अधिकारी ने मौके पर जाकर समस्या का समाधान क्यों नहीं किया?\r\n \r\n
- \r\n सुरक्षा चूक: किसान अर्धनग्न होकर इतनी आसानी से सरकारी भवन की छत पर कैसे पहुंच गए? वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं थे?\r\n \r\n
- \r\n धमकी का आरोप: क्या वाकई अधिकारी किसानों को जेल भेजने की धमकी दे रहे हैं? यदि यह सच है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन है।\r\n \r\n
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भविष्य की रणनीति: आंदोलन और होगा उग्र
\r\n\r\nशुक्रवार की घटना महज एक चेतावनी थी। भाकियू नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर उनकी मांगों—पुराना भाड़ा बहाल करने और पुराने पेराई नियमों को लागू करने—को तत्काल नहीं माना गया, तो आंदोलन का स्वरूप और भी उग्र होगा।
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- \r\n चक्का जाम की चेतावनी: किसानों ने संकेत दिए हैं कि वे आने वाले दिनों में मेरठ की सड़कों और मिलों के गेट पर तालाबंदी कर सकते हैं।\r\n \r\n
- \r\n महापंचायत: अगर गतिरोध नहीं टूटा, तो भाकियू बड़ा फैसला लेते हुए महापंचायत बुला सकती है, जिसमें आसपास के जिलों के किसान भी शामिल होंगे।\r\n \r\n
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फिलहाल, गन्ना भवन एक छावनी में तब्दील हो चुका है। किसान अपनी जगह से हटने को तैयार नहीं हैं और अधिकारी अपनी जिद पर अड़े हैं। यह टकराव आने वाले दिनों में पश्चिमी यूपी की राजनीति और गन्ना सत्र को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
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मेरठ का यह घटनाक्रम बताता है कि सिस्टम और किसान के बीच की खाई कितनी गहरी हो चुकी है। जिन किसानों को खेतों में होना चाहिए था, वे अपनी जान देने के लिए सरकारी दफ्तरों की छतों पर चढ़ रहे हैं। अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस "हाई वोल्टेज ड्रामा" को गंभीरता से लेता है या फिर किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार करता है।
Sabse pehle comment karne wale banein.