मुजफ्फरनगर (Crime Desk): उत्तर प्रदेश में अवैध खनन (Illegal Mining) को रोकने के लिए सरकार ने भले ही पूरी व्यवस्था को डिजिटल और ऑनलाइन कर दिया हो, लेकिन खनन माफिया अब साइबर सेंधमारी के जरिए सरकारी सिस्टम को ही चकमा दे रहे हैं। मुजफ्फरनगर जिले में एक ऐसा ही बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां साइबर अपराधियों या खनन माफियाओं ने सीधे खनन विभाग के सरकारी पोर्टल में ही सेंध लगा दी।
आरोपियों ने पोर्टल की एक तकनीकी खामी का फायदा उठाते हुए एक फर्जी भंडारण लाइसेंस (Storage License) आईडी तैयार की और इसके जरिए 76 वाहनों के लिए 'ई-फॉर्म-सी' (e-form-C - परिवहन पास) जारी कर दिए। इन फॉर्म्स में करीब 1900 घनमीटर सैंड स्टोन/क्वार्टजाइट बैलास्ट (गिट्टी) के परिवहन की अनुमति दर्ज की गई थी। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि मुजफ्फरनगर जिले के विभागीय रिकॉर्ड में इस नाम के किसी भी लाइसेंस या भंडारण को कभी कोई मंजूरी ही नहीं दी गई थी।
कैसे हुआ इस बड़े डिजिटल फर्जीवाड़े का खुलासा?
इस पूरे 'डिजिटल खेल' का भंडाफोड़ 21 सितंबर 2026 की शाम को हुआ। खनन विभाग द्वारा अवैध परिवहन पर नजर रखने के लिए बनाए गए वीटीएस-डीजीएम (VTS-DGM) एप पर अचानक मुजफ्फरनगर से बड़ी संख्या में ई-फॉर्म-सी जारी होते हुए दिखाई दिए।
जब मुजफ्फरनगर के स्थानीय अधिकारियों ने इन जनरेट हो रहे ई-फॉर्म-सी की जांच की, तो उनके होश उड़ गए। विभागीय रिकॉर्ड में यह स्पष्ट हुआ कि जिस आईडी से ये पास जारी किए जा रहे हैं, जिले में ऐसा कोई भी वैध भंडारण लाइसेंस स्वीकृत ही नहीं है। मामले की गंभीरता और सरकारी राजस्व को लगने वाले भारी चूने की आशंका को देखते हुए मुजफ्फरनगर के अधिकारियों ने तत्काल इसकी सूचना लखनऊ स्थित 'भूतत्व एवं खनिकर्म निदेशालय' (Directorate of Geology and Mining) को दी।
Follow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join ›शाना अहमद के नाम से बनी थी फर्जी लाइसेंस आईडी
विभागीय और पुलिस जांच में इस फर्जीवाड़े से जुड़े कई अहम सुराग सामने आए हैं:
फर्जी आईडी नंबर: पोर्टल पर लाइसेंस आईडी '31142603990001' से लगातार ई-फॉर्म-सी जारी किए जा रहे थे।
फर्जी नाम और पता: इस आईडी पर लाइसेंसधारी का नाम शाना अहमद (पुत्र अनवर) दर्ज किया गया था। पते के रूप में अहमदगढ़, मुजफ्फरनगर लिखा गया था।
भंडारण स्थल: पोर्टल पर खतौली तहसील के अहमदगढ़ गांव की जमीन को भंडारण (Storage) स्थल के रूप में दर्शाया गया था।
पास की संख्या और मात्रा: जांच में सामने आया कि इसी फर्जी आईडी का इस्तेमाल करके 76 ट्रकों/डंपरों के लिए पास जारी किए गए थे, जिनमें 1900 घनमीटर गिट्टी (सैंड स्टोन/क्वार्टजाइट बैलास्ट) का परिवहन किया जाना था।
अधिकारियों ने जब अपने भौतिक और डिजिटल रिकॉर्ड को खंगाला, तो अहमदगढ़ में ऐसे किसी भी भंडारण की कोई स्वीकृति (Approval) नहीं पाई गई। इसके तुरंत बाद उच्चाधिकारियों के निर्देश पर इस फर्जी लाइसेंस आईडी को पोर्टल से ब्लॉक (Block) कर दिया गया ताकि आगे कोई पास जारी न हो सके।
OTP सिस्टम हुआ फेल, सिर्फ पासवर्ड से खुला पोर्टल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सरकारी पोर्टल की साइबर सुरक्षा (Cyber Security) पर उठ रहा है। आखिर किसी बाहरी व्यक्ति ने खनन अधिकारी के स्तर से होने वाले काम को कैसे अंजाम दे दिया?
सिविल लाइन थाने में दर्ज कराई गई शिकायत के मुताबिक, खनन विभाग के पोर्टल पर लॉगिन करने की एक सुरक्षित त्रि-स्तरीय प्रक्रिया (Three-tier process) है। पहले पोर्टल पर यूजर आईडी और पासवर्ड डाला जाता है, जिसके बाद पंजीकृत मोबाइल नंबर पर एक 'वन टाइम पासवर्ड' (OTP) आता है। ओटीपी डालने के बाद ही पोर्टल एक्सेस होता है।
लेकिन, पिछले कुछ समय से पोर्टल में एक गंभीर तकनीकी समस्या (Technical Glitch) चल रही थी। इस खामी के कारण पोर्टल पर लॉगिन के लिए ओटीपी जनरेट ही नहीं हो रहा था। सिस्टम केवल यूजर आईडी और पासवर्ड डालने भर से ही खुल जा रहा था। विभाग को पूरा शक है कि इसी तकनीकी खामी का फायदा किसी ऐसे व्यक्ति ने उठाया है, जिसके पास खनन अधिकारी की यूजर आईडी और पासवर्ड पहले से मौजूद था। उसी ने लॉगिन करके यह फर्जी लाइसेंस आईडी जनरेट की और धड़ल्ले से ई-फॉर्म-सी जारी कर दिए।
40 घंटे की वैधता, 20 घंटे के भीतर कैंसिल किए गए सभी फॉर्म
इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए मुजफ्फरनगर के खनन अधिकारी आशुतोष कुमार ने स्थिति को नियंत्रण में लिया। सोमवार शाम उन्होंने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि, "मुजफ्फरनगर में वर्तमान में गिट्टी का कोई वैध भंडारण कार्य संचालित नहीं हो रहा है। इसलिए इस आईडी से जारी किए गए सभी पास पूरी तरह से अवैध थे।"
उन्होंने आगे बताया कि विभाग द्वारा जारी किया गया ई-फॉर्म-सी आमतौर पर 40 घंटे तक परिवहन के लिए वैध (Valid) रहता है। लेकिन, जैसे ही 21 सितंबर की शाम को इस फर्जीवाड़े की जानकारी विभाग को लगी, लगभग 20 घंटे के भीतर ही त्वरित कार्रवाई करते हुए उन सभी 76 संबंधित फॉर्म्स को पोर्टल से कैंसिल (Cancel) कर दिया गया, ताकि माफिया इस गिट्टी का परिवहन न कर सकें।
जांच का दिलचस्प मोड़: लाइसेंस के नंबर पर महिला ने उठाया फोन
फर्जीवाड़े की कड़ियां जोड़ने के लिए जब विभागीय अधिकारियों ने पोर्टल पर उस फर्जी लाइसेंस के साथ दर्ज किए गए मोबाइल नंबर पर संपर्क किया, तो मामला और उलझ गया। उस नंबर पर कॉल एक महिला ने रिसीव की। जब अधिकारियों ने उससे पूछताछ की, तो महिला ने बताया कि यह मोबाइल नंबर उसके पति 'जुनैद' के नाम पर रजिस्टर्ड है। हालांकि, महिला ने खनन विभाग के किसी भी लाइसेंस, शाना अहमद नाम के व्यक्ति या गिट्टी के व्यापार के बारे में किसी भी तरह की जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया। पुलिस अब यह जांच कर रही है कि क्या जुनैद का इस मामले से कोई सीधा संबंध है या साइबर अपराधियों ने किसी फर्जी सिम कार्ड का इस्तेमाल किया है।
IT Act और BNS की धाराओं में मुकदमा दर्ज
सरकारी सिस्टम को हैक करने और राजस्व को नुकसान पहुंचाने की इस गंभीर साजिश के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। खनन अधिकारी आशुतोष कुमार की ओर से दी गई लिखित तहरीर के आधार पर मुजफ्फरनगर के सिविल लाइन थाने में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4) (धोखाधड़ी) और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट की धारा 66C (पहचान की चोरी) व 66D (कंप्यूटर रिसोर्स का उपयोग कर धोखाधड़ी) के तहत FIR दर्ज की है।
पुलिस और साइबर सेल (Cyber Cell) अब मिलकर इस बात की तफ्तीश कर रही है कि पोर्टल पर किस आईपी एड्रेस (IP Address) से लॉगिन किया गया था, और खनन अधिकारी का पासवर्ड आखिर लीक कैसे हुआ। इस मामले ने उत्तर प्रदेश में खनन माफियाओं के बदलते 'डिजिटल स्वरूप' और सरकारी पोर्टल्स की साइबर सुरक्षा की कमजोरियों को पूरी तरह से उजागर कर दिया है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह समाचार मुजफ्फरनगर खनन विभाग द्वारा दी गई जानकारी, पुलिस में दर्ज एफआईआर (FIR) और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक बयानों पर आधारित है। मामले की पुलिस जांच और साइबर सेल की तकनीकी रिपोर्ट आने के बाद ही इस डिजिटल फर्जीवाड़े के वास्तविक दोषियों की पहचान और अन्य विवरण स्पष्ट हो सकेंगे।
Sabse pehle comment karne wale banein.