मेरठ: भारतीय समाज में पुलिस की वर्दी को सुरक्षा, न्याय और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। आम नागरिक संकट की घड़ी में खाकी की तरफ एक उम्मीद भरी नजर से देखता है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से एक ऐसा सनसनीखेज, रोंगटे खड़े कर देने वाला और अमानवीय मामला सामने आया है, जिसने न केवल पुलिस विभाग की साख पर गहरा बट्टा लगाया है, बल्कि यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो न्याय की गुहार किससे लगाई जाए?READ ALSO:-यूपी में कुदरत का डबल अटैक: बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से कांपा प्रदेश, 39 जिलों में अलर्ट; लखनऊ में करानी पड़ी फ्लाइट की इमरजेंसी लैंडिंग
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मामला मेरठ के कंकरखेड़ा थाना क्षेत्र का है, जहां न्याय की रक्षा करने की शपथ लेने वाला नोएडा क्राइम ब्रांच का एक रसूखदार इंस्पेक्टर अपने ही घर में एक 'खूंखार दरिंदे' में तब्दील हो गया। आरोपी इंस्पेक्टर सुनील दत्त पर उसकी ही पत्नी ने जो आरोप लगाए हैं, वे इतने संगीन और वीभत्स हैं कि उन्हें सुनकर किसी भी इंसान की रूह कांप जाए। अंधविश्वास का नाटक, धोखे से तलाक, बार-बार दुष्कर्म, बर्बरता से मारपीट, गर्भवती पत्नी के पेट पर लात मारकर अजन्मे बच्चे की हत्या (गर्भपात) और सबसे घिनौना आरोप— एक थाने का मलाईदार चार्ज (थानेदारी) पाने के लिए अपनी ही पत्नी को अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर करना।
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यह घटना केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं है; यह सत्ता, रसूख और खाकी के नशे में चूर एक व्यक्ति की उस मानसिकता को दर्शाती है, जहां रिश्ते और इंसानियत के कोई मायने नहीं रह जाते। आइए, इस पूरे रूह कंपा देने वाले घटनाक्रम के एक-एक पहलू का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
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इस दर्दनाक दास्तान की शुरुआत आज से करीब 17 साल पहले हुई थी। पुलिस को दी गई तहरीर और दर्ज एफआईआर (FIR) के अनुसार, कंकरखेड़ा क्षेत्र की रहने वाली इस पीड़ित महिला की शादी वर्ष 2007 में सुनील दत्त नाम के शख्स से पूरे हिंदू रीति-रिवाजों और सामाजिक मान्यताओं के अनुसार हुई थी।
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शादी के समय दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था। सुनील दत्त उत्तर प्रदेश पुलिस महकमे में एक होनहार पुलिसकर्मी के तौर पर अपनी पहचान बना रहा था। वर्तमान में वह इंस्पेक्टर के पद पर पदोन्नत हो चुका है और नोएडा क्राइम ब्रांच जैसी महत्वपूर्ण और शक्तिशाली विंग में तैनात है।
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तीन बच्चों का भरा-पूरा परिवार और खोखला दिखावा

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शादी के शुरुआती कुछ साल सामान्य रहे। इस दौरान दंपति के तीन बच्चे भी हुए, जो वर्तमान में आरोपी पति के ही पास रह रहे हैं। बाहरी दुनिया और समाज की नजरों में यह एक सुखी, संपन्न और प्रतिष्ठित पुलिस अधिकारी का परिवार था। लोग इस परिवार की मिसालें देते थे। लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर का सच इसके बिल्कुल विपरीत था। पीड़ित पत्नी वर्षों तक समाज की लाज और बच्चों के भविष्य की खातिर इस खोखले दिखावे को बर्दाश्त करती रही और तिल-तिल कर घुटती रही।
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अंधविश्वास का मायाजाल और 'धोखे का तलाक'

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पढ़े-लिखे समाज में अंधविश्वास को एक अभिशाप माना जाता है, लेकिन जब कानून का एक बड़ा जानकार और अपराधों की गुत्थी सुलझाने वाला क्राइम ब्रांच का इंस्पेक्टर खुद इसके जाल में फंस जाए, तो स्थिति बेहद खतरनाक हो जाती है।
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तरक्की में बाधा बताकर पत्नी का ब्रेनवॉश

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पीड़िता का आरोप है कि उसका पति सुनील दत्त भारी अंधविश्वास (Superstition) में जकड़ा हुआ था। जैसे-जैसे उसकी पुलिस विभाग में तरक्की हो रही थी, उसकी महत्वाकांक्षाएं भी अंधी होती जा रही थीं। किसी तांत्रिक या अंधविश्वासी धारणा के चक्कर में पड़कर सुनील ने यह मान लिया कि उसकी पत्नी और उसकी शादी ही उसकी आगे की बड़ी तरक्की में सबसे बड़ी 'बाधा' और 'अशुभ' है। उसने अपनी पत्नी का मानसिक उत्पीड़न शुरू कर दिया।
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तलाक का षड्यंत्र

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सुनील दत्त ने अपनी पत्नी को यह कहकर डराना शुरू किया कि उन दोनों की शादी में भयंकर 'ग्रह दोष' है, जिसके कारण परिवार पर बड़ा संकट आ सकता है। उसने एक खौफनाक साजिश रची और अपनी पत्नी को यह झूठा विश्वास दिलाया कि अगर वे दोनों कानूनी रूप से अदालत में तलाक ले लें, तो यह 'ग्रह दोष' कट जाएगा।
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एक भारतीय पत्नी, जो अपने पति की लंबी उम्र और तरक्की के लिए करवा चौथ जैसे व्रत रखती है, वह इस मनोवैज्ञानिक झांसे में आ गई। इंस्पेक्टर पति ने उसे भरोसा दिलाया कि यह तलाक सिर्फ एक 'कागजी खानापूर्ति' होगा और दोष खत्म होने के बाद कुछ ही महीनों में वे दोनों दोबारा पूरे विधि-विधान से शादी कर लेंगे। पति के इसी विश्वासघात और भावनात्मक ब्लैकमेल का शिकार होकर महिला ने अदालत में तलाक की अर्जी पर हस्ताक्षर कर दिए। यहीं से उसके जीवन के सबसे काले अध्याय की शुरुआत हुई।
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तलाक की कानूनी प्रक्रिया शुरू होते ही आरोपी इंस्पेक्टर ने अपना असली और खौफनाक रंग दिखाना शुरू कर दिया। तलाक के कागजातों पर हस्ताक्षर कराने से पहले उसने अपनी पत्नी से वादा किया था कि वह उसे मेरठ के रोहटा रोड स्थित एक पॉश और सुरक्षित कॉलोनी में एक अलग मकान लेकर देगा।
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वायदाखिलाफी और बंधक जीवन

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तलाक की अर्जी दाखिल होने के बाद सुनील दत्त अपने वादे से मुकर गया। उसने पत्नी को रोहटा रोड भेजने के बजाय कंकरखेड़ा स्थित अपने ही आवास में बंधक जैसी स्थिति में साथ रखना शुरू कर दिया। अब वह कानूनी रूप से पति नहीं था, लेकिन वह अपनी शारीरिक जरूरतों और कुंठाओं को शांत करने के लिए महिला का इस्तेमाल कर रहा था।
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कानून के रक्षक द्वारा दुष्कर्म

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महिला का स्पष्ट आरोप है कि कानूनी रूप से अलग होने की प्रक्रिया के बीच, आरोपी सुनील दत्त ने उसके साथ कई बार जबरन शारीरिक संबंध (Rape) बनाए। जब भी महिला अपनी मर्जी के खिलाफ हो रहे इस कृत्य का विरोध करती, तो उसके साथ जानवरों की तरह मारपीट की जाती। गंदी गालियां दी जातीं और वर्दी का रौब दिखाकर उसकी आवाज को दबा दिया जाता। खाकी वर्दी पहनकर समाज को दुष्कर्म से बचाने का दावा करने वाला शख्स खुद अपनी ही पूर्व पत्नी का लगातार शारीरिक शोषण कर रहा था।
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लगातार हो रहे इस जबरन शारीरिक शोषण के परिणामस्वरूप पीड़िता एक बार फिर गर्भवती (Pregnant) हो गई। एक महिला के लिए मां बनना दुनिया का सबसे सुखद अहसास होता है। पीड़िता ने सोचा कि शायद इस बच्चे के आने की खबर सुनकर उसके पति का पत्थर दिल पिघल जाए और वह उसे वापस पत्नी का दर्जा दे दे।
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लेकिन, जब उसने कांपते होठों से यह खुशखबरी अपने इंस्पेक्टर पति को बताई, तो वह खुशी से झूमने के बजाय आगबबूला हो गया। इसके बाद जो हुआ, वह इंसानियत के नाम पर एक काला धब्बा है।
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महिला द्वारा दी गई तहरीर के अनुसार, गर्भवती होने की बात सुनते ही आरोपी ने उसके साथ बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। उसने उसे बुरी तरह पीटा और सबसे अमानवीय कृत्य करते हुए अपनी ही गर्भवती पत्नी के पेट पर भारी बूटों से जोरदार लातें मारीं। इस वहशियाना हमले के कारण महिला को गंभीर अंदरूनी चोटें आईं, अत्यधिक रक्तस्राव हुआ और उसका गर्भपात (Miscarriage/Abortion) हो गया। उस अजन्मे बच्चे की कोई गलती नहीं थी, लेकिन एक महत्वाकांक्षी और क्रूर पिता ने दुनिया में आने से पहले ही उसे मौत के घाट उतार दिया।
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अगर आपको लगता है कि दरिंदगी यहीं खत्म हो गई, तो आप गलत हैं। इस पूरी खौफनाक कहानी का सबसे स्याह, शर्मनाक और पुलिस विभाग की जड़ें हिला देने वाला आरोप इसके बाद सामने आया। यह आरोप उत्तर प्रदेश पुलिस के भीतर पनप रहे 'ट्रांसफर-पोस्टिंग' के उस गंदे नेक्सस की ओर इशारा करता है, जिस पर अमूमन पर्दा पड़ा रहता है।
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पीड़िता के मुताबिक, आरोपी इंस्पेक्टर सुनील दत्त की महत्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी थीं। नोएडा क्राइम ब्रांच में रहने के बावजूद, वह किसी बड़े और रसूखदार थाने का स्वतंत्र इंचार्ज (थानेदार) बनना चाहता था। पुलिस महकमे में एक मलाईदार थाने की कुर्सी हासिल करने के लिए लोग क्या-क्या हथकंडे अपनाते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है, लेकिन सुनील दत्त ने जो किया, वह कल्पना से परे है।
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महिला का सीधा और स्पष्ट आरोप है कि इस 'मनचाही पोस्टिंग' को हासिल करने के लिए सुनील दत्त ने अपनी ही पत्नी की आबरू का सौदा करने की कोशिश की। उसने पीड़िता पर यह घिनौना दबाव बनाना शुरू किया कि वह उसकी पोस्टिंग करवाने के लिए बड़े पुलिस अधिकारियों (वरिष्ठ आईपीएस या पीपीएस अफसरों) के साथ शारीरिक संबंध बनाए (Compromise करे)।
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आरोपी पति अपनी पत्नी को समझाता था कि पुलिस विभाग में बड़ी कुर्सियां ऐसे ही मिलती हैं और उसे उसकी तरक्की के लिए यह 'कुर्बानी' देनी होगी। जब एक स्वाभिमानी भारतीय नारी ने अपने पति की इस नीच, ओछी और घिनौनी मांग को सिरे से ठुकरा दिया और इसका कड़ा विरोध किया, तो इंस्पेक्टर ने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से भयंकर प्रताड़ना देना शुरू कर दिया। उसे मारा-पीटा गया, भूखा रखा गया और घर में किसी कैदी की तरह रखा जाने लगा।
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न्याय के लिए एक निहत्थी औरत का लंबा संघर्ष

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एक पुलिस अधिकारी, वह भी क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर की पत्नी होने के नाते पीड़िता भली-भांति जानती थी कि उसके पति के खिलाफ आवाज उठाना पहाड़ से टकराने जैसा है। आरोपी इंस्पेक्टर अपने रसूख, पुलिस महकमे में अपनी ऊंची पैठ, सहकर्मियों के समर्थन और वर्दी की धौंस दिखाकर लगातार उसे डराता-धमकाता रहा।
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दर-दर की ठोकरें

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पीड़िता कई महीनों तक न्याय के लिए दर-दर भटकती रही। उसने कई बार पुलिस अधिकारियों के चक्कर काटे, लेकिन शुरुआत में 'खाकी ने खाकी का ही बचाव किया'। थानों में उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया और मामले को 'पति-पत्नी का आपसी विवाद' बताकर रफा-दफा करने की कोशिश की गई। यह हमारे सिस्टम की एक कड़वी सच्चाई है कि जब रक्षक ही आरोपी हो, तो शिकायत दर्ज कराना लोहे के चने चबाने के बराबर होता है।
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अंततः सत्य की जीत: कंकरखेड़ा थाने में FIR दर्ज

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हालांकि, पीड़िता ने हार नहीं मानी। वह अपने आत्मसम्मान और उस अजन्मे बच्चे के न्याय के लिए लड़ती रही। लगातार उच्चाधिकारियों को प्रार्थना पत्र देने, महिला आयोग (Women Commission) का दरवाजा खटखटाने और मीडिया के संभावित दबाव के बाद, अंततः मेरठ पुलिस के आला अधिकारियों की नींद टूटी।
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वरिष्ठ अधिकारियों के कड़े हस्तक्षेप और स्पष्ट निर्देशों के बाद, कंकरखेड़ा पुलिस स्टेशन में आरोपी इंस्पेक्टर सुनील दत्त के खिलाफ एक विस्तृत और नामजद मुकदमा (FIR) दर्ज कर लिया गया है। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पूर्व आईपीसी की विभिन्न गंभीर धाराओं (जिनमें दुष्कर्म, जबरन गर्भपात, घरेलू हिंसा, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना शामिल हैं) के तहत मामला दर्ज किया है।
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पुलिस अधिकारियों का आधिकारिक बयान और आगे की कानूनी प्रक्रिया

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इस हाई-प्रोफाइल और बेहद संवेदनशील मामले की एफआईआर दर्ज होने के बाद मेरठ से लेकर नोएडा कमिश्नरेट तक के पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। चूंकि आरोपी खुद एक जांच एजेंसी (क्राइम ब्रांच) का हिस्सा है, इसलिए मामले की संवेदनशीलता कई गुना बढ़ जाती है।
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मेरठ पुलिस के आला अधिकारियों का सख्त रुख: मेरठ पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने मीडिया से बात करते हुए इस पूरे प्रकरण पर अपना रुख स्पष्ट किया है।
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    गहन और निष्पक्ष जांच: पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वह आम आदमी हो या पुलिस का कोई बड़ा अधिकारी। कंकरखेड़ा पुलिस ने मामले की गहन, त्वरित और निष्पक्ष जांच शुरू कर दी है। एक विशेष टीम इस मामले की तफ्तीश कर रही है।
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    मजिस्ट्रेट के सामने बयान (164 के बयान): कानूनी प्रक्रिया के तहत सबसे पहले पीड़िता के बयान दंड प्रक्रिया संहिता (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 164 के तहत सीधे मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए जा रहे हैं। ये बयान अदालत में सबसे पुख्ता सबूत माने जाते हैं।
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    वैज्ञानिक और चिकित्सीय साक्ष्य: पुलिस उस अस्पताल और डॉक्टरों से भी संपर्क कर रही है, जहां महिला का गर्भपात हुआ था या उसका इलाज चला था। मेडिकल रिपोर्ट इस केस में एक अहम 'टर्निंग पॉइंट' साबित होगी। इसके अलावा, पति-पत्नी के बीच हुई बातचीत, कॉल रिकॉर्डिंग, व्हाट्सएप मैसेज (Electronic Evidence) को भी जांच का अहम हिस्सा बनाया जा रहा है, ताकि दबाव डालने की बात को साबित किया जा सके।
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    कठोरतम कार्रवाई की चेतावनी: अधिकारियों का दोटूक कहना है कि पुलिस विभाग में ऐसे दागी और आपराधिक मानसिकता वाले पुलिसकर्मियों के लिए कोई जगह नहीं है। अगर जांच में इंस्पेक्टर सुनील दत्त पर लगे ये संगीन आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ न केवल सख्त कानूनी कार्रवाई (गिरफ्तारी और जेल) की जाएगी, बल्कि विभागीय स्तर पर भी उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) करने और अंततः नौकरी से बर्खास्तगी (Dismissal) तक की कठोर कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
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समाज, शासन और व्यवस्था के लिए उठते ज्वलंत सवाल

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कंकरखेड़ा का यह मामला केवल एक पति-पत्नी के बीच का अपराध नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज, हमारी पुलिस व्यवस्था और शासन-प्रशासन के सामने कई ज्वलंत और परेशान करने वाले सवाल खड़े करता है:
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    क्या रक्षकों से सुरक्षित हैं महिलाएं? जब समाज की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाला एक राजपत्रित स्तर का पुलिस अधिकारी ही अपने घर की महिला के लिए 'यमराज' बन जाए, तो आम जनता और खासकर महिलाएं पुलिस से सुरक्षा की क्या उम्मीद रखेंगी? "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" और "मिशन शक्ति" जैसे अभियानों के बीच ऐसी घटनाएं पूरी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाती हैं।
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    थानेदारी का भ्रष्ट तंत्र: पत्नी पर वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाने का दबाव डालने का आरोप सबसे ज्यादा खतरनाक है। यह पुलिस विभाग के भीतर पनप रहे ट्रांसफर-पोस्टिंग के संभावित गंदे, भ्रष्ट और चारित्रिक पतन वाले नेक्सस की ओर एक डरावना इशारा करता है। इस बात की एक उच्च स्तरीय न्यायिक या सीबीआई (CBI) जांच होनी चाहिए कि आखिर वे कौन से 'अधिकारी' हैं, जिनका जिक्र आरोपी इंस्पेक्टर अपनी पत्नी के सामने कर रहा था? क्या पुलिस विभाग में मलाईदार पोस्टिंग इसी कीमत पर मिलती है?
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    अंधविश्वास की गहरी जड़ें: एक आधुनिक समाज में, एक पढ़े-लिखे और अपराधों की वैज्ञानिक जांच करने वाले क्राइम ब्रांच के अधिकारी का इस कदर अंधविश्वास में डूबकर अपना हंसता-खेलता परिवार उजाड़ लेना, समाज की मानसिक स्थिति पर गहरी चिंता पैदा करता है।
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    सिस्टम का दोहरा रवैया: पीड़िता को एफआईआर दर्ज कराने के लिए इतना लंबा संघर्ष क्यों करना पड़ा? क्या आरोपी पुलिसवाला था, सिर्फ इसलिए सिस्टम उसे इतने लंबे समय तक बचाता रहा? पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी (PCA) जैसे संस्थानों को ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेना चाहिए?
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एक लंबी कानूनी लड़ाई और न्याय की आस

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मेरठ के कंकरखेड़ा से उठी यह चिंगारी अब पूरे प्रदेश के पुलिस महकमे में आग लगा चुकी है। फिलहाल, गेंद अब मेरठ पुलिस और कानून व्यवस्था के पाले में है। पीड़िता एक निहत्थी लेकिन मजबूत इरादों वाली महिला है, जिसे अब केवल अदालत और न्याय व्यवस्था से ही उम्मीद है।
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पूरे जिले और प्रदेश की नजर इस हाई प्रोफाइल केस पर टिकी है। आम जनता यह देखना चाहती है कि क्या एक रसूखदार क्राइम ब्रांच इंस्पेक्टर को उसके किए की सख्त से सख्त सजा मिलेगी, या पुलिस विभाग का 'भाईचारा' (Brotherhood of Khaki) एक बार फिर अपने एक दागी अफसर के काले कारनामों पर पर्दा डालने में कामयाब हो जाएगा?
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यह मामला सिर्फ सुनील दत्त को सजा दिलाने का नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए खुद को पाक-साफ साबित करने का एक बड़ा मौका है। अगर इस मामले में निष्पक्ष और कड़ी कार्रवाई होती है, तो जनता का पुलिस पर विश्वास मजबूत होगा, अन्यथा खाकी पर लगा यह दाग कभी नहीं धुल पाएगा। 
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