मेरठ। भारत जैसे विकासशील देश में जहां एक आम नागरिक अपनी दिन-रात की गाढ़ी कमाई से ईमानदारी से टैक्स चुकाता है, वहीं कुछ सफेदपोश अपराधी 'सिस्टम' की खामियों का फायदा उठाकर देश के सरकारी खजाने (Exchequer) को सैकड़ों करोड़ों रुपये का चूना लगा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसा ही रोंगटे खड़े कर देने वाला आर्थिक अपराध का मामला सामने आया है, जिसने जांच एजेंसियों से लेकर न्यायपालिका तक को झकझोर कर रख दिया है।READ ALSO:-सोशल मीडिया के मजाक से खड़ा हुआ भारत का पहला 'Gen-Z डिजिटल रेवोल्यूशन': जानिए क्या है 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) और इसकी अभूतपूर्व सफलता की कहानी
\r\n\r\n\r\n\r\n
केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (CGST) खुफिया महानिदेशालय (DGGI), क्षेत्रीय इकाई मेरठ द्वारा पकड़े गए 294.38 करोड़ रुपये के महाघोटाले में अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। मेरठ के अपर सत्र न्यायाधीश (न्यायालय संख्या 02) मोहम्मद असलम सिद्दीकी की अदालत ने इस पूरे सिंडिकेट के 'मास्टरमाइंड' मोहम्मद आकिब (निवासी लक्ष्मी नगर, पूर्वी दिल्ली) की प्रथम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। यह फैसला केवल एक जमानत का खारिज होना नहीं है, बल्कि देश भर के उन टैक्स चोरों के लिए एक सख्त संदेश है जो डमी कंपनियों (Shell Companies) के जरिए अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहे हैं।
\r\n\r\n\r\n\r\n
294 करोड़ की टैक्स चोरी: कैसे बुना गया 37 फर्जी कंपनियों का मकड़जाल?
\r\n\r\nयह कोई आम चोरी या गबन का मामला नहीं है, बल्कि यह चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CA), शातिर दिमाग वाले ऑपरेटरों और हवाला कारोबारियों द्वारा रची गई एक बेहद हाई-टेक और सुनियोजित साजिश (Organized Conspiracy) है। अभियोजन पक्ष (DGGI) की ओर से अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरे खेल का मुख्य सूत्रधार पूर्वी दिल्ली का रहने वाला मोहम्मद आकिब था।
\r\n\r\n\r\n\r\n
आकिब ने अपने अन्य सह-अभियुक्तों— सम्यक जैन, अभिषेक जैन, अंकुर जैन और सोनू कुमार झा के साथ मिलकर कागजों पर एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी थी। इन लोगों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में गरीब, अनपढ़ और अनजान लोगों (जिन्हें डमी प्रोपराइटर कहा जाता है) के पैन कार्ड, आधार कार्ड और दस्तावेजों का इस्तेमाल करके 37 फर्जी या शेल फर्मों (Shell Firms) का एक विशाल नेटवर्क तैयार किया।
\r\n\r\nFollow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join › \r\n\r\n
ये कंपनियां असल में कहीं मौजूद ही नहीं थीं। इनका न कोई ऑफिस था, न कोई गोदाम और न ही कोई कर्मचारी। ये सिर्फ सरकारी फाइलों और लैपटॉप की एक्सेल शीट्स में सांस ले रही थीं।
\r\n\r\n\r\n\r\n
फर्जी ITC और अवैध रिफंड का खतरनाक खेल (The Modus Operandi)
\r\n\r\nइस सिंडिकेट ने सरकारी खजाने को दो तरफा चोट पहुंचाई। इनका 'काम करने का तरीका' (Modus Operandi) इतना शातिर था कि शुरुआती जांच में अच्छे-अच्छे अधिकारी भी चकरा जाएं। अदालत में दी गई जानकारी के अनुसार इस 294.38 करोड़ के घोटाले को दो हिस्सों में अंजाम दिया गया:
\r\n\r\n| \r\n घोटाले का प्रकार \r\n | \r\n \r\n फर्जीवाड़ा का तरीका \r\n | \r\n \r\n धोखाधड़ी की राशि \r\n | \r\n
|---|---|---|
| \r\n फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (Fake ITC) \r\n | \r\n \r\n बिना माल (Goods) या सेवाओं (Services) की वास्तविक आपूर्ति किए, केवल कागजों पर करोड़ों रुपये के फर्जी बिल (Fake Invoices) जारी किए गए। इन बिलों के आधार पर सरकार से टैक्स क्रेडिट क्लेम कर लिया गया। \r\n | \r\n \r\n ₹276,16,17,036 (276.16 करोड़) \r\n | \r\n
| \r\n अवैध GST रिफंड क्लेम \r\n | \r\n \r\n निर्यात (Exports) को बढ़ावा देने के लिए सरकार टैक्स रिफंड देती है। आरोपियों ने 3 फर्जी कंपनियों के जरिए विदेशों में माल भेजने की झूठी घोषणाएं (Fake Export Declarations) कीं और सरकार से नकद रिफंड हासिल कर लिया। \r\n | \r\n \r\n ₹18,22,35,154 (18.22 करोड़) \r\n | \r\n
| \r\n कुल धोखाधड़ी (Total Fraud) \r\n | \r\n \r\n देश की अर्थव्यवस्था और सरकारी खजाने को पहुंचाया गया कुल नुकसान। \r\n | \r\n \r\n ₹294,38,52,190 (लगभग 294.38 करोड़) \r\n | \r\n
'म्यूल अकाउंट्स' (Mule Accounts) और हवाला कनेक्शन
\r\n\r\nडीजीजीआई की जांच में यह बात सामने आई कि रिफंड का दावा करने वाली एक प्रमुख डमी फर्म (M/s NK IT Solutions) को सरकार से 9.43 करोड़ रुपये का अवैध रिफंड मिला था। इसमें से 4.77 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि मास्टरमाइंड मोहम्मद आकिब के निर्देश पर सीधे उसकी अपनी फर्म (M/s A to Z Solutions) के बैंक खाते में ट्रांसफर की गई।
\r\n\r\n\r\n\r\n
जांच एजेंसियों की नजरों से बचने के लिए आकिब ने 'लेयरिंग' (Layering) तकनीक का इस्तेमाल किया। इस करोड़ों रुपये की राशि को तुरंत कई अलग-अलग अनजान खातों (जिन्हें म्यूल अकाउंट्स कहा जाता है) में घुमाया गया और अंततः स्थानीय 'हवाला चैनलों' (Hawala Channels) के माध्यम से नकद (Cash) के रूप में निकाल लिया गया, ताकि पैसे की असल उत्पत्ति (Money Trail) को छिपाया जा सके।
\r\n\r\n\r\n\r\n
DGGI का एक्शन और 12 फरवरी 2026 की वह 'सर्जिकल स्ट्राइक'
\r\n\r\nइस बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ तब हुआ जब DGGI, क्षेत्रीय इकाई मेरठ के अधिकारियों को इस डेटा एनालिटिक्स में कुछ भारी विसंगतियां नजर आईं। महीनों की खुफिया ट्रैकिंग के बाद, 12 फरवरी 2026 को DGGI की टीमों ने एक साथ मोहम्मद आकिब के लक्ष्मी नगर, दिल्ली स्थित आवासीय परिसर और फर्जी लेनदेन के लिए बनाई गई कई डमी आपूर्तिकर्ता फर्मों के घोषित पतों पर अचानक छापेमारी (Raid) की।
\r\n\r\n\r\n\r\n
इस तलाशी अभियान में जो कुछ मिला, उसने जांच अधिकारियों के होश उड़ा दिए। यह एक पूरी की पूरी 'फैक्ट्री' थी जहां से फर्जी बिलों का उत्पादन हो रहा था। अदालत के आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि पंचनामे की जब्ती सूची में निम्नलिखित आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई:
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n डिजिटल साक्ष्य: कई उच्च क्षमता वाले लैपटॉप, हार्ड ड्राइव और स्मार्टफोन्स जिनमें फर्जी कंपनियों का सारा लेखा-जोखा था।\r\n \r\n
- \r\n वित्तीय दस्तावेज: दर्जनों डेबिट/क्रेडिट कार्ड, म्यूल खातों (mule accounts) की बैंक पासबुक और चेकबुक।\r\n \r\n
- \r\n पहचान पत्र का जखीरा: डमी लोगों के 3 आधार कार्ड, 3 पैन कार्ड।\r\n \r\n
- \r\n पासवर्ड की डिक्शनरी: ऐसी कई 'एक्सेल शीट' (Excel Sheets) मिलीं जिनमें 37 कंपनियों के नेट बैंकिंग आईडी, उनके गुप्त पासवर्ड, एटीएम कार्ड नंबर और पिन कोड सहेज कर रखे गए थे।\r\n \r\n
- \r\n पीला 'क्लासमेट' रजिस्टर: जांच का सबसे अहम सुराग एक पीला क्लासमेट रजिस्टर साबित हुआ, जिसमें हवाला के जरिए हुए नकद लेनदेन की एंट्री (कच्चा चिट्ठा) दर्ज थी। इसके अलावा 'मेसर्स स्पार्कलाइन इवेंट्स' से जुड़े 18 खुले कागजात भी जब्त किए गए।\r\n \r\n
\r\n\r\n
व्हाट्सएप चैट से खुला राज: 'मलेशिया' के नाम से सेव था आकिब का नंबर
\r\n\r\nगिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों ने जब सह-अभियुक्तों से पूछताछ की और उनके डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच (Forensic Cloning) कराई, तो मामले की परतें पूरी तरह खुल गईं।
\r\n\r\n\r\n\r\n
सह-अभियुक्त अभिषेक जैन ने अपने बयान में कबूल किया कि ये 37 फर्जी फर्में उसी ने सोनू कुमार झा, मोहम्मद आकिब और मोहम्मद मुदस्सिर शमशी के साथ मिलकर बनाई थीं। सबसे बड़ा खुलासा सह-अभियुक्त सम्यक जैन के मोबाइल फोन से हुआ।
\r\n\r\n\r\n\r\n
सम्यक जैन के फोन में मास्टरमाइंड मोहम्मद आकिब का मोबाइल नंबर (60178029785) "मलेशिया" (Malaysia) और "अक्की" (Akki) के कूट नाम (Code name) से सेव था। जब इन दोनों के बीच की व्हाट्सएप चैट्स (WhatsApp Chats) को डिकोड किया गया, तो उसमें स्पष्ट रूप से पाया गया कि आकिब ही वह व्यक्ति था जो डमी प्रोपराइटरों के नाम पर GST रजिस्ट्रेशन लेने, नए बैंक खाते खोलने, फर्जी फर्मों को संचालित करने, फर्जी बिल (Invoices) जारी करने और अंत में फर्जी रिफंड का दावा करने के सीधे निर्देश (Instructions) दे रहा था। जब भी हवाला या डमी खातों के माध्यम से करोड़ों का भुगतान होता था, तो सम्यक जैन व्हाट्सएप पर आकिब को सूचित करता था और आकिब उसकी पुष्टि (Confirmation) करता था।
\r\n\r\n\r\n\r\n
कोर्ट रूम का हाई-वोल्टेज ड्रामा: बचाव पक्ष और अभियोजन की दलीलें
\r\n\r\n22 अप्रैल 2026 को मेरठ के अपर सत्र न्यायाधीश मोहम्मद असलम सिद्दीकी (एच.जे.एस.) की अदालत में जमानत पर हुई जिरह बेहद रोमांचक और दलीलों से भरपूर रही।
\r\n\r\n\r\n\r\n
आरोपी आकिब के वकील की दलीलें (Defense Arguments):
\r\n\r\nबचाव पक्ष के विद्वान अधिवक्ता ने अदालत में अपने मुवक्किल को पूरी तरह निर्दोष बताने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया कि:
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n आकिब एक सम्मानित परिवार का व्यक्ति है, अपने घर का इकलौता कमाने वाला है और उसका कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है।\r\n \r\n
- \r\n उसे 24.03.2026 को समन देकर बुलाया गया था। उसने खुफिया अधिकारी सौरभ पंवार के सामने पूरा सहयोग किया, लेकिन डीजीजीआई अधिकारियों ने बिना कारण उसे झूठे मामले में फंसा दिया।\r\n \r\n
- \r\n आरोप लगाया गया कि आकिब का बयान (Confession) जबरन, धमकाकर दर्ज किया गया और उसकी वीडियोग्राफी कराई गई। कानून के मुताबिक अधिकारियों के सामने दिया गया ऐसा बयान स्वीकार्य (Admissible) नहीं है।\r\n \r\n
- \r\n खाते में आए 4.8 करोड़ रुपये को जायज ठहराते हुए कहा गया कि यह पैसा सीए समीर जैन और अभिषेक जैन ने 'भविष्य के व्यापारिक अवसरों' (Future Business) के वादे के तहत जमा किया था, जिसे बाद में लौटा दिया गया।\r\n \r\n
- \r\n वकील ने दावा किया कि यह राशि 5 करोड़ रुपये से कम है, इसलिए यह अपराध उस श्रेणी में नहीं आता जहां जमानत न दी जा सके।\r\n \r\n
\r\n\r\n
DGGI के विशेष लोक अभियोजक का कड़ा पलटवार (Prosecution Arguments):
\r\n\r\nविभाग की ओर से पैरवी कर रहे विशेष अभियोजन अधिकारी (Special Public Prosecutor) श्री लक्ष्य कुमार सिंह और उनकी सहयोगी अधिवक्ता श्रीमती वंदना सिंह ने इन सभी दलीलों की धज्जियां उड़ा दीं। उन्होंने अदालत को बताया:
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n यह मामला 4.8 करोड़ का नहीं, बल्कि पूरे 294.38 करोड़ रुपये की महा-धोखाधड़ी का है, जिसमें आकिब मुख्य साजिशकर्ता है।\r\n \r\n
- \r\n बरामद हुए रिकॉर्ड, बैंक विवरण, 37 डमी कंपनियों की एक्सेल शीट और व्हाट्सएप चैट चिल्ला-चिल्लाकर आकिब के मास्टरमाइंड होने की गवाही दे रहे हैं।\r\n \r\n
- \r\n सी.जी.एस.टी. अधिनियम, 2017 की धारा 70 के तहत दिया गया उसका बयान बिल्कुल स्वैच्छिक था। गिरफ्तारी से बचने के लिए दबाव का आरोप लगाना एक 'आफ्टर थॉट' (Afterthought) है। गिरफ्तारी की पूरी विधिक प्रक्रिया का पालन किया गया है और गवाहों के सामने जामा तलाशी ली गई थी।\r\n \r\n
- \r\n चूंकि जांच अभी जारी है और इसमें कई अन्य व्यक्तियों, डमी संस्थाओं और लाभार्थियों (Beneficiaries) को बेनकाब किया जाना बाकी है, इसलिए यदि आकिब को जमानत दी गई, तो वह अपने रसूख और पैसे के दम पर गवाहों को डरा-धमका सकता है और अहम डिजिटल व दस्तावेजी सबूतों को नष्ट कर सकता है। उसके देश छोड़कर भागने (Flight risk) की पूरी संभावना है।\r\n \r\n
\r\n\r\n
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला और न्यायपालिका की सख्त टिप्पणी
\r\n\r\nइस हाई-प्रोफाइल मामले में फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश मोहम्मद असलम सिद्दीकी ने आर्थिक अपराधों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) द्वारा पूर्व में दिए गए कई लैंडमार्क जजमेंट्स का विस्तार से उल्लेख किया, जो सफेदपोश अपराधियों (White-Collar Criminals) के खिलाफ न्यायपालिका के कड़े रुख को दर्शाते हैं:
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n राम नारायण पोपली बनाम सीबीआई (2003): न्यायालय ने इस ऐतिहासिक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि "आर्थिक अपराध जानबूझकर और ठंडे दिमाग से रची गई साजिश के साथ किए जाते हैं। ये अपराध सीधे तौर पर राष्ट्र के हित के खिलाफ होते हैं। सफेदपोश अपराधों से जनता का विश्वास हिल जाता है और राष्ट्रीय आर्थिक ढांचे को जो नुकसान पहुंचता है, वह एक तरह की 'आर्थिक आपदा' (Economic Disaster) है।" कई मामलों में आर्थिक अपराधों को हत्या या डकैती से भी ज्यादा संगीन माना गया है क्योंकि यह पूरे देश को प्रभावित करता है।\r\n \r\n
- \r\n निम्मगड्डा प्रसाद बनाम सी.बी.आई. और वाईएस जगन मोहन रेड्डी मामला (2013): जज ने दोहराया कि आर्थिक अपराधों में सार्वजनिक धन का भारी नुकसान होता है। जमानत देते समय अदालत का प्राथमिक कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी मुक़दमे का सामना करने के लिए मौजूद रहे और गवाहों या सबूतों से छेड़छाड़ की रत्ती भर भी आशंका न हो।\r\n \r\n
- \r\n गोविंद अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2020): अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग व्यापारियों को आतंकित करने के लिए नहीं होना चाहिए, लेकिन जहां "कर चोरी की भारी राशि" शामिल हो, "फर्जी चालान का प्रणेता" होने का आरोप हो और "सक्रिय संलिप्तता का ठोस सबूत" उपलब्ध हो, वहां गिरफ्तारी पूरी तरह से जायज और आवश्यक है।\r\n \r\n
\r\n\r\n
अदालत का अंतिम फैसला: क्यों खारिज हुई मास्टरमाइंड की जमानत?
\r\n\r\nदोनों पक्षों की लंबी और विस्तृत बहस सुनने, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों (व्हाट्सएप चैट्स, बैंक ट्रेल्स, पंचनामा) का बारीकी से अवलोकन करने और सर्वोच्च न्यायालय के विधिक सिद्धांतों की कसौटी पर कसने के बाद, अपर सत्र न्यायाधीश ने अपना अंतिम निर्णय सुनाया।
\r\n\r\n\r\n\r\n
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला कि:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"बचाव पक्ष का यह तर्क कि धोखाधड़ी की राशि 5 करोड़ रुपये से कम है, बिल्कुल आधारहीन है क्योंकि यह 276 करोड़ रुपये के इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) और करोड़ों रुपये के रिफंड की धोखाधड़ी से जुड़ा एक विशाल सिंडिकेट है। बचाव पक्ष अवैध गिरफ्तारी को साबित करने में भी पूरी तरह विफल रहा है, क्योंकि गिरफ्तारी मेमो पर स्वतंत्र गवाहों (प्रदीप कुमार और धीरेंद्र कुमार तिवारी) के हस्ताक्षर मौजूद हैं और आरोपी को उसके अधिकारों से विधिवत अवगत कराया गया था।"\r\n
\r\n\r\n
न्यायाधीश ने आगे कहा कि अभियुक्त मोहम्मद आकिब के खिलाफ प्रथम दृष्टया बेहद विश्वसनीय और अकाट्य सबूत मौजूद हैं। वह एक अत्यंत गंभीर आर्थिक अपराध (Serious Economic Offence) का मुख्य कर्ताधर्ता है। मामले की जांच अभी भी एक बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण चरण में है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
\r\n\r\n\r\n"यदि ऐसे रसूखदार और शातिर आर्थिक अपराधी को इस स्तर पर जमानत पर रिहा किया जाता है, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वह जांच को प्रभावित करेगा, गवाहों को धमकाएगा और न्याय की प्रक्रिया में भारी बाधा उत्पन्न करेगा। अपराध की गंभीरता और सबूतों से समझौता करने की क्षमता को देखते हुए, केवल विश्वसनीय जमानतदार (Sureties) पेश करने की पेशकश जमानत देने की पर्याप्त गारंटी नहीं हो सकती।"\r\n
\r\n\r\n
इन्हीं कठोर टिप्पणियों और तथ्यों के आधार पर, न्यायालय ने सी.जी.एस.टी. अधिनियम, 2017 की धारा 132(1)(b), 132(1)(c), 132(1)(f), 132(1)(l) और 132(1)(i) के तहत दर्ज इस मामले में मोहम्मद आकिब का प्रथम जमानत प्रार्थना पत्र अंततः खारिज (निरस्त) कर दिया।
\r\n\r\n\r\n\r\n
टैक्स चोरों के लिए खतरे की घंटी
\r\n\r\nमेरठ न्यायालय का यह 12 पन्नों का आदेश केवल एक आरोपी को जेल की सलाखों के पीछे रखने तक सीमित नहीं है। यह भारत भर में फैले उन तमाम चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, फर्जी ऑपरेटरों और जीएसटी चोरों के लिए एक खुली चेतावनी है जो कागजी कंपनियों का जाल बुनकर रातों-रात करोड़पति बनने का ख्वाब देखते हैं।
\r\n\r\n\r\n\r\n
DGGI मेरठ की यह सफल सर्जिकल स्ट्राइक और अदालत का कड़ा रुख यह साबित करता है कि अब देश की व्यवस्था डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल सर्विलांस के मामले में अपराधियों से दो कदम आगे चल रही है। आने वाले दिनों में इस मामले में कई और बड़े सफेदपोश चेहरों के बेनकाब होने और उनकी गिरफ्तारियां होने की प्रबल संभावना है, क्योंकि 294 करोड़ रुपये के इस खेल में पर्दे के पीछे छिपे कई 'खिलाड़ियों' तक जांच की आंच पहुंचना अभी बाकी है।
\r\n\r\nअस्वीकरण: यह समाचार रिपोर्ट उपलब्ध प्रेस विज्ञप्तियों, विशेष अभियोजन अधिकारी और आरोपी के वकील द्वारा प्रस्तुत तर्कों, तथा वैध न्यायालय आदेशों पर आधारित है।
\r\n\r\n
Sabse pehle comment karne wale banein.