मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर की धड़कन माने जाने वाले सेंट्रल मार्केट (Central Market) में इन दिनों सन्नाटा और बेचैनी का माहौल है। कारण है सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा दिया गया ध्वस्तीकरण (Demolition) का आदेश, जिसने यहां के सैकड़ों व्यापारियों की रातों की नींद उड़ा दी है। अपनी रोजी-रोटी और पुश्तैनी दुकानों को बचाने के लिए व्यापारी हर संभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें कोई ठोस राहत मिलती नजर नहीं आ रही है।READ ALSO:-GST का 'पाताल लोक': 37 फर्जी कंपनियां, 2,156 करोड़ के झूठे बिल और अंडमान का 'रिमोट कंट्रोल'; दिल्ली का वो 'अदृश्य' मास्टरमाइंड जिसने हिला दिया सरकारी खजाना
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इसी क्रम में, शनिवार को 'व्यापार बचाओ संघर्ष समिति' (Vyapar Bachao Sangharsh Samiti) के बैनर तले एक विशाल आम पंचायत का आयोजन किया गया। इस पंचायत में शहर भर से बड़ी संख्या में व्यापारी और विभिन्न व्यापार संघों के अध्यक्षों ने हिस्सा लिया। व्यापारियों का कहना है कि उन्होंने तमाम जनप्रतिनिधियों के सामने अपनी समस्या रखी है, लेकिन कोई समाधान न निकलने पर अब वे प्रदर्शन और आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर हैं।
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क्या है पूरा मामला? 700 दुकानों पर संकट

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यह पूरा विवाद मेरठ के सेंट्रल मार्केट में हुए कथित अवैध निर्माण से जुड़ा है। बीती 27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा आदेश जारी करते हुए सेंट्रल मार्केट के लगभग 700 दुकानदारों को नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा था कि 6 हफ्तों के भीतर अवैध निर्माण पर कार्रवाई की जाए।
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इस आदेश के बाद से ही बाजार में अफरा-तफरी का माहौल है। कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए कुछ व्यापारियों ने स्वेच्छा से अपनी दुकानों के आगे का हिस्सा तोड़कर अतिक्रमण हटाया भी था, लेकिन ज्यादातर व्यापारी अब भी असमंजस और डर के साये में जी रहे हैं। 700 दुकानें टूटने का मतलब है हजारों परिवारों की रोजी-रोटी पर सीधा संकट।
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व्यापारियों की गुहार: 'सरकार करे हस्तक्षेप'

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आम पंचायत में व्यापारियों ने एक सुर में सरकार से मदद की अपील की। व्यापारी नेता विजय आनंद अग्रवाल ने कहा, "हम सभी माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरा सम्मान करते हैं। लेकिन इस आदेश से यहां लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया है। यह सिर्फ दुकानों का सवाल नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन-यापन का सवाल है।"
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उन्होंने आगे कहा, "हम सरकार से अपील करते हैं कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे। नियमों में आवश्यक बदलाव करके या कोई बीच का रास्ता निकालकर हमारे जीवन भर की कमाई को बचाने का प्रयास किया जाए।" व्यापारियों का कहना है कि वे कोई भी जुर्माना भरने या नियमों का पालन करने को तैयार हैं, लेकिन उनकी दुकानें न तोड़ी जाएं।
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संयुक्त व्यापार संघ की दो टूक: 'पहले अफसरों पर हो कार्रवाई'

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पंचायत में पहुंचे संयुक्त व्यापार संघ (Sanyukt Vyapar Sangh) के अध्यक्ष नवीन गुप्ता ने व्यापारियों के प्रति अपना पूरा समर्थन जताया। उन्होंने एक अहम मुद्दा उठाते हुए कहा कि कार्रवाई सिर्फ व्यापारियों पर ही क्यों हो रही है?
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नवीन गुप्ता ने कहा, "आज हमारे व्यापारी परिवार पर यह बड़ा संकट आया है और हम पूरी तरह उनके साथ हैं। हम सरकार और माननीय न्यायालय से यह मांग करते हैं कि हमारे प्रतिष्ठानों पर बुलडोजर चलाने से पहले उन अधिकारियों (Officials) पर कार्रवाई होनी चाहिए, जिनकी नाक के नीचे यह कथित अवैध निर्माण हुआ। जब यह निर्माण हो रहा था, तब प्रशासन और संबंधित विभाग के अधिकारी कहां थे? उन्हें भी जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।"
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यह मांग व्यापारियों के बीच काफी जोर पकड़ रही है। उनका मानना है कि अगर निर्माण अवैध था, तो उसे बनते समय ही क्यों नहीं रोका गया? अब सालों बाद जब दुकानें जम चुकी हैं, तो उन्हें तोड़ना अन्यायपूर्ण है।
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प्रदर्शन और आंदोलन की राह पर व्यापारी

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समाधान न मिलता देख व्यापारी अब आंदोलन की राह पर हैं। कभी वे सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करते हैं, तो कभी 'रोजी-रोटी बचाओ' के बैनर और पोस्टर लगाकर अपना विरोध जताते हैं। सेंट्रल मार्केट की दीवारों और दुकानों पर ऐसे पोस्टर आम हो गए हैं।
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व्यापार बचाओ संघर्ष समिति का कहना है कि अगर जल्द ही उनकी सुनवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन को और तेज करेंगे। वे कानूनी लड़ाई लड़ने के साथ-साथ सड़क पर भी संघर्ष करने को तैयार हैं।
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प्रशासन का रुख और आगे की राह

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सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद जिला प्रशासन और नगर निगम के सामने भी बड़ी चुनौती है। एक तरफ कोर्ट का आदेश है जिसका पालन करना अनिवार्य है, तो दूसरी तरफ हजारों व्यापारियों का विरोध और उनकी रोजी-रोटी का सवाल है। प्रशासन फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।
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जानकारों का मानना है कि इस मामले में कोई बीच का रास्ता निकालना ही सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है। हो सकता है कि प्रशासन सुप्रीम कोर्ट में स्थिति रिपोर्ट दाखिल कर कुछ और समय की मांग करे या फिर नियमों के तहत कंपाउंडिंग (Compounding) जैसी किसी योजना पर विचार किया जाए। लेकिन फिलहाल, 6 हफ्ते की समयसीमा तेजी से बीत रही है और सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।
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मेरठ का सेंट्रल मार्केट सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि शहर की आर्थिक गतिविधियों का केंद्र है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश निश्चित रूप से कानून के राज को स्थापित करने के लिए है, लेकिन इसके मानवीय पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 700 दुकानों का टूटना एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक त्रासदी हो सकती है। ऐसे में, सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका को मिलकर एक ऐसा समाधान निकालना होगा जो कानून के दायरे में भी हो और मानवीय दृष्टिकोण से भी सही हो।
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मेरठ के सेंट्रल मार्केट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ध्वस्तीकरण के आदेश के बाद से करीब 700 दुकानदारों में हड़कंप मचा हुआ है। कोर्ट ने 6 हफ्तों के भीतर अवैध निर्माण हटाने का आदेश दिया है। इसके विरोध में 'व्यापार बचाओ संघर्ष समिति' ने एक आम पंचायत की, जिसमें व्यापारियों ने सरकार से हस्तक्षेप कर उनकी रोजी-रोटी बचाने की गुहार लगाई। संयुक्त व्यापार संघ ने मांग की है कि व्यापारियों से पहले उन अधिकारियों पर कार्रवाई हो जिन्होंने यह निर्माण होने दिया। समाधान न मिलने पर व्यापारी प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं।
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