खबरीलाल विशेष ग्राउंड रिपोर्ट | मेरठ: देश में ऑनलाइन गेमिंग (Online Gaming) का बाजार जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से इस सेक्टर में आर्थिक अपराधों और टैक्स चोरी के नए-नए तरीके ईजाद किए जा रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में माल और सेवा कर खुफिया महानिदेशालय (DGGI) और सीजीएसटी (CGST) की संयुक्त टीम ने एक ऐसे ही खौफनाक और विशालकाय आर्थिक अपराध का पर्दाफाश किया है, जिसने जांच एजेंसियों के भी होश उड़ा दिए हैं। ऑनलाइन मनी गेमिंग के नाम पर एक ऐसा सुनियोजित सिंडिकेट चलाया जा रहा था, जिसने भारत सरकार के खजाने को लगभग 460 करोड़ रुपये की भारी-भरकम चपत लगाई है।READ ALSO:-बिजनौर में हाई-वोल्टेज ड्रामा: इंदिरा पार्क में अलग-अलग समुदाय के युवक-युवती को देख भड़के हिंदूवादी संगठन, भारी हंगामे के बाद पुलिस तैनात
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इस पूरे हाई-प्रोफाइल रैकेट में पेमेंट गेटवे की भूमिका सबसे अहम पाई गई है। डीजीजीआई (DGGI) मेरठ ने इस 460 करोड़ के जीएसटी घोटाले में कड़ी कार्रवाई करते हुए प्रसिद्ध पेमेंट गेटवे 'सबपैसा' (Sabpaisa) का संचालन करने वाली कंपनी मेसर्स एसआरएस लाइव टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) श्री कुमार मनीष को गिरफ्तार कर लिया है। इस रिपोर्ट में हम आपको इस महाघोटाले की हर वो बारीक कड़ी समझाएंगे, कि कैसे कागजों पर फर्जी कंपनियां बनाकर हजारों करोड़ का लेन-देन किया गया और कैसे जांच एजेंसियों ने इस सफेदपोश अपराध का भंडाफोड़ किया।
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1. 47 फर्जी कंपनियों का मायाजाल और 16,449 करोड़ का 'ब्लैक ट्रांजैक्शन'
\r\n\r\nआर्थिक अपराधों की दुनिया में 'डमी कंपनियों' (Dummy Companies) का खेल बहुत पुराना है, लेकिन इस मामले में इसका जो पैमाना था, वह अकल्पनीय है। डीजीजीआई मेरठ की गहन और लंबी जांच में यह तथ्य सामने आया कि मास्टरमाइंड्स ने सिर्फ और सिर्फ जीएसटी चोरी और काले धन को सफेद करने के उद्देश्य से 47 ऐसी कंपनियां और फर्में बनाईं, जिनका असल दुनिया में कोई वजूद ही नहीं था। ये फर्में केवल फाइलों और रजिस्टरों में सांस ले रही थीं।
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जब इन 47 डमी कंपनियों के बैंक खातों और ट्रांजैक्शन हिस्ट्री (Transaction History) को खंगाला गया, तो जांच अधिकारियों की आंखें फटी रह गईं। इन अस्तित्वहीन कंपनियों के जरिए ऑनलाइन मनी गेमिंग के नाम पर कुल 16,44,96,47,476/- (सोलह हजार चार सौ चवालीस करोड़ रुपये से भी अधिक) की विशाल धनराशि का लेन-देन किया गया। यह पैसा देश के अलग-अलग हिस्सों से गेमिंग ऐप्स पर दांव लगाने वाले आम लोगों का था, जिसे एक बेहद सुरक्षित और गुप्त नेटवर्क के जरिए इन डमी खातों में रूट (Route) किया जा रहा था।
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2. टैक्स चोरी का गणित: 28% के बजाय दिया गया मात्र 18% का फर्जीवाड़ा
\r\n\r\nइस पूरे घोटाले का केंद्र बिंदु भारत सरकार का वह कानून था, जिसे हाल ही में ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर के लिए लागू किया गया था। जीएसटी परिषद (GST Council) के सख्त नियमों के अनुसार, किसी भी प्रकार की ऑनलाइन मनी गेमिंग (जहां पैसों का दांव लगता हो) पर लगाए गए 'पूर्ण अंकित मूल्य' (Full Face Value) यानी पूरी दांव राशि पर सीधे 28% की दर से जीएसटी (GST) देय होता है।
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लेकिन इस सिंडिकेट ने कानून की आंखों में धूल झोंकने का एक नायाब और अवैध तरीका निकाला। इन 47 कंपनियों ने जानबूझकर वैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन किया। उन्होंने दांव की पूरी राशि (फेस वैल्यू) पर 28% टैक्स देने के बजाय, अपने हिसाब से मनमाने ढंग से तय किए गए एक मामूली कमीशन पर मात्र 18% की दर से जीएसटी का भुगतान किया।
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आंकड़ों में समझें तो, हजारों करोड़ के लेन-देन पर इन 47 डमी कंपनियों ने कुल मिलाकर केवल 2,77,20,700/- (लगभग 2.77 करोड़ रुपये) का ही टैक्स सरकार को चुकाया। जब डीजीजीआई (DGGI) के अधिकारियों ने 28% के वास्तविक कानून के हिसाब से इस 16 हजार करोड़ के टर्नओवर की गणना की, तो सामने आया कि इस गिरोह ने देश के राजस्व को लगभग 460 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान पहुंचाया है। यह एक सोची-समझी डकैती थी, जिसे डिजिटल माध्यम से अंजाम दिया जा रहा था।
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3. 'सबपैसा' (Sabpaisa) और मास्टरमाइंड CEO कुमार मनीष की काली करतूतें
\r\n\r\nकोई भी ऑनलाइन गेमिंग कंपनी बिना किसी 'पेमेंट गेटवे' (Payment Gateway) के एक रुपया भी ग्रहण नहीं कर सकती। यहीं पर एंट्री होती है मेसर्स एसआरएस लाइव टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड (M/s SRS Live Technologies Pvt. Ltd.) की, जो बाजार में 'सबपैसा' (Sabpaisa) के ब्रांड नाम से अपना पेमेंट गेटवे चलाती है।
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अधिकारियों की जांच में यह अचूक खुलासा हुआ कि एसआरएस लाइव टेक्नोलॉजीज ने एक ईमानदार पेमेंट मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बजाय, इस पूरे अवैध लेनदेन को सुविधाजनक बनाने के लिए अपने प्लेटफॉर्म का जमकर दुरुपयोग किया। इन 47 कंपनियों का वास्तविक और एकमात्र काम 'ऑनलाइन मनी गेमिंग' का था, लेकिन 'सबपैसा' ने भारी कमीशन और लालच के चलते धोखाधड़ी करते हुए इन्हें अपने सिस्टम में 'ई-कॉमर्स ऑपरेटर' (E-Commerce Operator) के रूप में पंजीकृत कर लिया। ऐसा करके न केवल जीएसटी कानूनों का मखौल उड़ाया गया, बल्कि एक वैध व्यवसाय का मुखौटा पहनकर अवैध सट्टेबाजी के पैसे को बैंकिंग सिस्टम में डाला गया।
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4. RBI के नियमों की उड़ी धज्जियां: संपर्क सत्यापन और 'एस्क्रो अकाउंट' का खेल
\r\n\r\nभारत के केंद्रीय बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), ने पेमेंट एग्रीगेटर्स (Payment Aggregators) के लिए बेहद सख्त दिशा-निर्देश तय किए हैं ताकि मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग जैसे खतरों को रोका जा सके। जब भी कोई नया मर्चेंट (व्यापारी) किसी पेमेंट गेटवे से जुड़ता है, तो उसका सख्त 'संपर्क बिंदु सत्यापन' (Contact Point Verification - CPV) और रिस्क प्रोफाइलिंग करनी होती है।
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इन 47 डमी कंपनियों के लेन-देन के तरीके को देखकर ही इन्हें 'उच्च जोखिम' (High Risk) वाली श्रेणी में चिह्नित किया जा चुका था। इसके बावजूद, 'सबपैसा' के ऑपरेशन्स पर एकाधिकार रखने वाले सीईओ श्री कुमार मनीष ने अपने पद और अधिकारों का घोर दुरुपयोग करते हुए इन फर्जी कंपनियों को संपर्क बिंदु सत्यापन (CPV) से पूरी तरह छूट दे दी।
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आरबीआई का एक और सख्त नियम यह है कि ऐसे प्लेटफॉर्म्स को ग्राहकों के पैसे के सुरक्षित निपटान (सेटलमेंट) के लिए हमेशा 'एस्क्रो बैंक खातों' (Escrow Bank Accounts) का उपयोग करना चाहिए, जिन पर बैंकों और रेगुलेटर्स की सीधी नजर होती है। लेकिन सीईओ कुमार मनीष ने जानबूझकर सबपैसा के गैर-एस्क्रो (Non-Escrow) बैंक खातों के माध्यम से इन डमी कंपनियों के करोड़ों रुपये के फंड के निपटान की सुविधा प्रदान की। इससे काले धन को बिना किसी रोक-टोक के निकाला और घुमाया जा सका।
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5. ई-कॉमर्स और सॉफ्टवेयर सेवाओं का पहनाया गया मुखौटा
\r\n\r\nइस गिरोह की कार्यप्रणाली इतनी शातिर थी कि इन्होंने कागजी कार्रवाई में कोई लूपहोल नहीं छोड़ा। बैंकिंग सिस्टम और आरबीआई (RBI) के अनुपालन ऑडिट (Compliance Audit) को चकमा देने के लिए, गेटवे कंपनी (सबपैसा) और उन 47 डमी कंपनियों के बीच फर्जी एग्रीमेंट (समझौते) तैयार किए गए थे।
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इन दस्तावेजों में साफ तौर पर लिखा गया था कि ये 47 कंपनियां 'ई-कॉमर्स सेवाएं', 'सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट', या 'तकनीकी आईटी सेवाएं' प्रदान करती हैं। बाहर से देखने पर यह एक साफ-सुथरा कॉर्पोरेट बिजनेस मॉडल लग रहा था। लेकिन मेरठ डीजीजीआई की तकनीकी और जमीनी जांच में हकीकत बेनकाब हो गई। इनमें से एक भी कंपनी कोई सॉफ्टवेयर या उत्पाद नहीं बेच रही थी। ये सभी पूरी तरह से डार्क वेब और ऑनलाइन मनी गेमिंग के दलदल में लिप्त थीं। गेमिंग से आने वाली सारी अवैध कमाई को पेमेंट गेटवे के माध्यम से धोकर (मनी लॉन्ड्रिंग) सीधे डमी बैंक खातों में भेज दिया जाता था।
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6. गेमिंग फंड्स का खुद लाभार्थी था CEO, मनी ट्रेल ने खोली पोल
\r\n\r\nजांच की सुई जब पैसों के रास्ते (Money Trail) पर आगे बढ़ी, तो सबसे बड़ा और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। डीजीजीआई (DGGI) ने पाया कि 'सबपैसा' के सीईओ श्री कुमार मनीष सिर्फ इस अवैध व्यापार को तकनीकी सुविधा ही नहीं दे रहे थे, बल्कि वह इस 16 हजार करोड़ के ऑनलाइन गेमिंग फंड के बड़े लाभार्थियों में से एक थे।
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जांच एजेंसियों ने उन बैंक खातों को ट्रेस किया जिन्हें सीधे तौर पर कुमार मनीष द्वारा संचालित या नियंत्रित किया जाता था। पता चला कि डमी कंपनियों से होने वाली अवैध कमाई का एक बड़ा हिस्सा 'कट' या 'प्रॉफिट शेयर' के रूप में इन खातों में भी पहुंच रहा था। सीईओ होने के नाते, मर्चेंट को ऑनबोर्ड करने (सिस्टम से जोड़ने), उनका जोखिम वर्गीकरण करने और फंड सेटलमेंट की पूरी जिम्मेदारी मनीष के हाथों में थी। सिस्टम में लाल झंडियां (Red Flags) लहरा रही थीं कि यह पैसा गेमिंग और सट्टेबाजी का है, जोखिम बहुत अधिक है, लेकिन अपने निजी स्वार्थ और मुनाफे के लिए मनीष ने उन सभी चेतावनियों को दरकिनार करते हुए फंड को लगातार रूट करने की इजाजत दी।
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7. मेरठ DGGI की दबिश और आगे की रणनीति
\r\n\r\nइन सभी अकाट्य सबूतों, फर्जी एग्रीमेंट्स की प्रतियों, बैंक स्टेटमेंट और मनी ट्रेल को पुख्ता करने के बाद, डीजीजीआई (DGGI) मेरठ ने अंतिम प्रहार किया। जांच एजेंसी ने भारी पुलिस बल के साथ दबिश देकर मेसर्स एसआरएस लाइव टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ श्री कुमार मनीष को गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी सीजीएसटी अधिनियम, 2017 (CGST Act, 2017) के कड़े प्रावधानों के तहत की गई है, जिसमें कर चोरी और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप शामिल हैं।
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सूत्रों का कहना है कि यह 460 करोड़ रुपये का घोटाला तो महज हिमखंड का सिरा (Tip of the Iceberg) है। डीजीजीआई मेरठ की टीमें अब उन 47 डमी कंपनियों के पीछे छिपे असली चेहरों यानी 'लाभकारी मालिकों' (Beneficial Owners) की तलाश में रात-दिन एक कर रही हैं। वे लोग कौन हैं जो पर्दे के पीछे से इस 16 हजार करोड़ के गेमिंग साम्राज्य को चला रहे थे? पैसा देश के बाहर (हवाला के जरिए) तो नहीं भेजा गया? इन सभी सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं।
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ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर के लिए कड़ा संदेश
\r\n\r\nडीजीजीआई मेरठ (DGGI Meerut) की यह ऐतिहासिक और बड़ी कार्रवाई भारत सरकार की उस स्पष्ट नीति का हिस्सा है, जिसके तहत ऑनलाइन गेमिंग और ई-कॉमर्स सेक्टर में किसी भी प्रकार की टैक्स चोरी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह मामला अन्य पेमेंट गेटवे कंपनियों और फिनटेक स्टार्टअप्स के लिए भी एक बहुत बड़ी चेतावनी है कि यदि वे लालच में आकर केवाईसी (KYC) नियमों की अनदेखी करेंगे या फर्जी कंपनियों को पनाह देंगे, तो कानून के लंबे हाथ उन तक जरूर पहुंचेंगे।
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इस महाघोटाले से जुड़ी जांच अभी भी अपने चरम पर है और आने वाले हफ्तों में दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ और 'सफेदपोश' चेहरों के बेनकाब होने की प्रबल संभावना है। इस मामले की पल-पल की सटीक और एक्सक्लूसिव अपडेट्स के लिए आप लगातार खबरीलाल (Khabreelal) न्यूज़ पोर्टल के साथ बने रहें। हम प्रशासन की हर कार्रवाई और अंदरखाने की हर खबर आप तक सबसे पहले पहुंचाते रहेंगे।
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