मेरठ (साइबर क्राइम डेस्क): अगर आप भी अपने स्मार्टफोन (Smartphone) पर किसी अनजान लिंक या अनजान व्यक्ति द्वारा भेजी गई फाइल को बिना सोचे-समझे क्लिक कर देते हैं, तो यह खबर आपके लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है। साइबर अपराधियों (Cyber Criminals) ने अब ठगी का इतना हाई-टेक और मनोवैज्ञानिक तरीका खोज निकाला है, जो किसी भी पढ़े-लिखे और समझदार व्यक्ति को मिनटों में कंगाल कर सकता है।READ ALSO:-बिजनौर में खौफनाक सुबह! पूरी रात लापता बेटे को तलाशता रहा परिवार, घर के पास ही फंदे से झूलती मिली 28 वर्षीय नीरज की लाश, गांव में मातम
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ताजा मामला मेरठ (Meerut) का है, जहां एक प्रतिष्ठित पेपर मिल के प्रबंधक (Manager) को साइबर ठगों ने अपनी बिसात का मोहरा बनाया और कंपनी के बैंक खाते से भारी-भरकम 1.80 करोड़ रुपये की रकम पार कर दी। इस घटना ने व्यापारिक जगत और पुलिस प्रशासन दोनों की नींद उड़ा दी है। आइए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर इस 'डिजिटल डकैती' को कैसे अंजाम दिया गया।
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क्या है पूरा मामला? कौन हुआ ठगी का शिकार?

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मेरठ के मवाना रोड स्थित डिफेंस कॉलोनी के रहने वाले प्रज्ज्वल अग्रवाल एक बड़े व्यवसायी हैं। उनकी 'गंगोत्री पेपर मिल' (Gangotri Paper Mill) हरिद्वार जनपद के झबरेड़ा-नारसन क्षेत्र में संचालित होती है। इस बड़ी पेपर मिल के लाखों-करोड़ों के लेन-देन के लिए मुजफ्फरनगर की नई मंडी स्थित पंजाब नेशनल बैंक (PNB) शाखा में एक बैंक खाता है।
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इस महत्वपूर्ण बैंक खाते और मिल के आर्थिक मामलों का पूरा संचालन (Operations) कंपनी के प्रबंधक संदीप गोयल करते हैं। साइबर ठगों ने इसी मैनेजमेंट स्ट्रक्चर को बहुत करीब से स्टडी किया और सीधे प्रबंधक संदीप गोयल को अपना 'सॉफ्ट टारगेट' बनाया।
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17 जुलाई की वह मनहूस 'APK फाइल' और मोबाइल हैक का खेल

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साइबर अपराधियों का असली खेल 17 जुलाई को शुरू हुआ। पुलिस सूत्रों के अनुसार, 17 जुलाई को प्रबंधक संदीप गोयल के व्हाट्सएप नंबर पर एक अनजान नंबर से एक एपीके फाइल (APK File) भेजी गई।
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    क्या होती है APK फाइल? (Android Package Kit) यह एंड्रॉइड फोन में ऐप इंस्टॉल करने वाली फाइल होती है। प्ले स्टोर से अलग जब कोई ऐप सीधे फाइल के रूप में भेजा जाता है, तो उसे APK कहते हैं।
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    कैसे हुआ हैक? जैसे ही संदीप गोयल ने उस फाइल को अपने फोन में डाउनलोड करके खोला (Open किया), उनके मोबाइल का पूरा कंट्रोल (Screen Mirroring & Data Access) बैकग्राउंड में बैठे साइबर ठगों के हाथों में चला गया। अब संदीप गोयल के फोन के सारे कॉन्टैक्ट्स, चैट्स और पासवर्ड्स हैकर्स की मुट्ठी में थे।
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असली 'बॉस' की जगह लिया फर्जी 'बॉस' का अवतार

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हैकर्स इतने शातिर थे कि उन्होंने तुरंत पैसे नहीं निकाले। उन्होंने पहले संदीप गोयल के मोबाइल डेटा और चैट्स को पढ़ा। उन्हें पता चल गया कि कंपनी के निदेशक (Director) नीरज अग्रवाल अक्सर संदीप को व्हाट्सएप के माध्यम से ही बड़े भुगतानों (Payments) का निर्देश देते हैं।
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इसके बाद ठगों ने अपनी दूसरी चाल चली। उन्होंने एक नए नंबर से नीरज अग्रवाल के नाम, उनकी असली फोटो (DP) और प्रोफाइल का इस्तेमाल करके एक फर्जी व्हाट्सएप अकाउंट (Fake WhatsApp Account) तैयार कर लिया। चूंकि यह नंबर संदीप के हैक हुए फोन में भी 'नीरज सर' या बॉस के नाम से सेव हो गया, इसलिए संदीप को कोई शक नहीं हुआ।
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4 दिन तक चला 'डिजिटल लूट' का खेल, ट्रांसफर हुए 1.80 करोड़

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अब साइबर ठगों ने उस फर्जी अकाउंट से सीधे 'बॉस' (निदेशक) बनकर प्रबंधक संदीप गोयल को मैसेज करना शुरू किया। उन्होंने मैसेज में विभिन्न बैंक खातों के नंबर भेजे और तुरंत लाखों रुपयों का भुगतान (RTGS/NEFT) करने का कड़ा निर्देश दिया।
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चूंकि पहले भी निदेशक नीरज अग्रवाल इसी तरह व्हाट्सएप के जरिए पेमेंट करने के आदेश देते रहे थे, इसलिए प्रबंधक संदीप गोयल को रत्ती भर भी संदेह (Doubt) नहीं हुआ कि दूसरी तरफ उनका असली बॉस नहीं, बल्कि एक शातिर साइबर क्रिमिनल बैठा है।
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ठगों का यह खौफनाक खेल 17 जुलाई से लेकर 20 जुलाई तक लगातार चार दिनों तक चलता रहा। इन 4 दिनों के भीतर प्रबंधक ने 'बॉस का आदेश' मानकर चार अलग-अलग बड़े ट्रांजेक्शन के जरिए कंपनी के खाते से लगभग 1.80 करोड़ रुपये उन अनजान खातों में ट्रांसफर कर दिए।
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जब सोमवार को खुली पोल, तो उड़े असली निदेशक के होश

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ठगी का यह 'खेल' शायद और भी चलता रहता, लेकिन सोमवार का दिन इस राज़ के फाश होने का दिन था। सोमवार को जब कंपनी के निदेशक नीरज अग्रवाल और प्रज्ज्वल अग्रवाल रूटीन विजिट पर पेपर मिल पहुंचे, तो प्रबंधक संदीप गोयल ने हमेशा की तरह उन्हें किए गए सभी भुगतानों (Payments) का पूरा विवरण (Detail) दिया।
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जैसे ही निदेशकों ने 1.80 करोड़ रुपये के भुगतान की बात सुनी, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। वे सन्न रह गए! उन्होंने संदीप गोयल को स्पष्ट बताया कि उन्होंने पिछले चार दिनों में ऐसा कोई भी निर्देश या मैसेज भेजा ही नहीं है। इसके बाद जब संदीप का मोबाइल और व्हाट्सएप चेक किया गया, तब जाकर पता चला कि वे कितनी भयानक 'साइबर साजिश' का शिकार हो चुके हैं।
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पुलिस और साइबर सेल का एक्शन: खातों को किया जा रहा ट्रेस

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करोड़ों की ठगी का एहसास होते ही प्रबंधन में हड़कंप मच गया। बिना समय गंवाए उन्होंने राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल (National Cyber Crime Portal - 1930) पर शिकायत दर्ज कराई और मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अविनाश पांडेय के कार्यालय पहुंचकर पूरी आपबीती सुनाई।
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एसएसपी के सख्त निर्देश पर 'साइबर क्राइम थाना मेरठ' में प्रज्ज्वल अग्रवाल की तहरीर के आधार पर तत्काल मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
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एसपी क्राइम अवनीश कुमार ने इस गंभीर मामले पर जानकारी देते हुए बताया कि:
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"यह एक बेहद सुनियोजित साइबर अपराध (Organized Cyber Crime) है। हम मामले की गहराई से जांच कर रहे हैं। प्रबंधक ने जिन-जिन बैंक खातों में रकम ट्रांसफर की है, उन सभी बैंक खातों (Mule Accounts) को चिन्हित कर लिया गया है। संबंधित खाताधारकों और इस पूरे नेटवर्क से जुड़े लोगों की डिजिटल फुटप्रिंट्स (Digital Footprints) जुटाई जा रही है। हमारी प्राथमिकता यह पता लगाना है कि रकम आगे किन खातों में गई है और जल्द ही इस पूरे गिरोह का भंडाफोड़ किया जाएगा।"
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आम जनता और व्यापारियों के लिए जरूरी साइबर एडवाइजरी (Cyber Advisory)

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मेरठ की यह घटना एक बहुत बड़ा सबक है। साइबर एक्सपर्ट्स और पुलिस आम जनता से अपील करती है कि:
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    APK फाइल्स से रहें सावधान: व्हाट्सएप, टेलीग्राम या ईमेल पर आई किसी भी अनजान '.apk' फाइल को भूलकर भी डाउनलोड या इंस्टॉल न करें। ऐप्स हमेशा आधिकारिक 'Google Play Store' या 'Apple App Store' से ही लें।
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    वॉइस वेरिफिकेशन (Voice Verification): व्यापार में जब भी कोई बड़ा लेन-देन (Payment) हो, तो सिर्फ व्हाट्सएप मैसेज पर भरोसा न करें। बॉस या संबंधित व्यक्ति को फोन कॉल (Voice/Video Call) करके कन्फर्मेशन जरूर लें।
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    अनजान नंबर और DP का धोखा: साइबर ठग आपकी सोशल मीडिया से आपकी फोटो चुराकर फर्जी व्हाट्सएप बना लेते हैं। अगर कोई परिचित या बॉस अचानक किसी नए नंबर से मैसेज कर पैसे मांगे, तो तुरंत अलर्ट हो जाएं।
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डिजिटल युग में हमारी जरा सी चूक हमें जिंदगी भर का नुकसान दे सकती है। 1.80 करोड़ की इस भारी-भरकम ठगी ने मेरठ पुलिस के सामने भी एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अब देखना यह होगा कि साइबर सेल की टीमें इन शातिर हैकर्स तक कितनी जल्दी पहुंच पाती हैं और क्या यह करोड़ों की रकम वापस कंपनी को मिल पाएगी?
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