खबरीलाल डेस्क
देहरादून / चमोली / नरेंद्रनगर:
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देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास है और आज का दिन सनातन धर्म के करोड़ों अनुयायियों के लिए एक विशेष उत्सव लेकर आया है। माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी वसंत पंचमी (Vasant Panchami) के पावन पर्व पर, जिसे ऋतुराज वसंत का आगमन और मां सरस्वती की आराधना का दिन माना जाता है, हिमालय की गोद में स्थित मोक्षधाम 'श्री बदरीनाथ धाम' (Badrinath Dham) के कपाट खुलने की शुभ तिथि की आधिकारिक घोषणा कर दी गई है।READ ALSO:-23 जनवरी की शाम अंतरिक्ष में मचेगी हलचल: चांद, शनि और नेपच्यून का होगा 'महासंगम', जानें कब और कैसे देखें यह जादुई नजारा
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आज शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 को राजपुरोहितों, धर्माचार्यों और मंदिर समिति के पदाधिकारियों ने पंचांग गणना और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का गहन अध्ययन करने के बाद यह शुभ समाचार विश्व भर के भक्तों को सुनाया।
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घोषणा का सार:

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साल 2026 में भगवान बदरी विशाल के कपाट 23 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे।
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इस घोषणा के साथ ही उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा (Char Dham Yatra) की तैयारियों का औपचारिक बिगुल बज गया है। छह महीने के शीतकालीन अवकाश और भारी बर्फबारी के बाद, जब भगवान नर-नारायण अपनी योग निद्रा से जागेंगे और नर (मनुष्य) द्वारा पूजे जाएंगे, तो उस अलौकिक पल का साक्षी बनने के लिए देश-विदेश से लाखों भक्त चमोली जिले की ओर प्रस्थान करेंगे।
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इस विस्तृत विशेष रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कपाट खुलने की पूरी प्रक्रिया, इस साल के शुभ मुहूर्त का महत्व, बदरीनाथ धाम का पौराणिक इतिहास, भगवान रुद्रनाथ की यात्रा और चारधाम से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी जो एक यात्री के रूप में आपके लिए जानना अनिवार्य है।
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वसंत पंचमी पर घोषणा की परंपरा और 23 अप्रैल का शुभ मुहूर्त

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सनातन धर्म की परंपराओं में किसी भी बड़े कार्य के शुभारंभ के लिए मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि तय करने की एक सदियों पुरानी राजसी परंपरा है।
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कैसे तय होती है तिथि?

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हर साल वसंत पंचमी के दिन टिहरी नरेश (जो बदरीनाथ धाम के संरक्षक माने जाते हैं और जिन्हें 'बोलंदा बदरी' या बोलते हुए बदरीनाथ की उपाधि प्राप्त है) के राजदरबार, नरेंद्रनगर में राजपुरोहित पंचांग गणना करते हैं। इस वर्ष भी टिहरी राजदरबार और बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) के सदस्यों की उपस्थिति में ग्रहों की चाल देखी गई।
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    कपाट खुलने की तिथि: 23 अप्रैल, 2026 (गुरुवार)
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    शुभ मुहूर्त: प्रातः 6:15 बजे (ब्रह्म मुहूर्त के बाद और सूर्योदय के समय)।
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    नक्षत्र और योग: ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 23 अप्रैल का दिन अक्षय तृतीया के आसपास का समय है, जो स्वयं में अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन सूर्य अपनी उच्च राशि में होते हैं, जो भगवान विष्णु की उपासना के लिए श्रेष्ठ समय है।
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गाडू घड़ा (तेकल कलश) यात्रा

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तिथि घोषणा के साथ ही 'गाडू घड़ा' (तेल कलश) यात्रा की तारीख भी तय हो गई है। यह एक पवित्र कलश होता है जिसमें तिलों का तेल भरा जाता है। इस तेल को पिरोने की प्रक्रिया राजमहल में होती है और फिर इसे एक भव्य शोभायात्रा के रूप में बदरीनाथ धाम ले जाया जाता है। कपाट खुलने पर सबसे पहले इसी तेल से भगवान बदरीनाथ का अभिषेक किया जाता है, क्योंकि 6 महीने तक कपाट बंद रहने के कारण विग्रह शुष्क हो जाता है।
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पिछले साल (2025) से तुलना

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उल्लेखनीय है कि साल 2025 में बदरीनाथ धाम के कपाट 4 मई को खोले गए थे और नवंबर माह में शीतकाल के लिए बंद किए गए थे। इस बार यात्रा लगभग 11 दिन पहले, यानी 23 अप्रैल से शुरू हो रही है। यह श्रद्धालुओं के लिए खुशखबरी है क्योंकि उन्हें दर्शन के लिए अप्रैल के अंत का सुहावना मौसम मिलेगा और यात्रा की अवधि भी थोड़ी लंबी हो जाएगी।
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पंच केदार में शामिल भगवान रुद्रनाथ के कपाट 18 मई को खुलेंगे

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बदरीनाथ धाम के अलावा, आज वसंत पंचमी के दिन 'पंच केदार' (Panch Kedar) में शामिल चौथे केदार, भगवान रुद्रनाथ (Rudranath) जी के कपाट खुलने की तिथि भी घोषित की गई है।
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गोपीनाथ मंदिर (Gopinath Mandir), गोपेश्वर, जो भगवान रुद्रनाथ का शीतकालीन गद्दी स्थल है, वहां आज ब्राह्मणों, पुजारियों और हक-हकूकधारियों की मौजूदगी में पंचांग गणना की गई।
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    रुद्रनाथ कपाट खुलने की तिथि: 18 मई, 2026
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    विशेषता: भगवान रुद्रनाथ पंच केदारों में एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान शिव के 'मुख' (Face) की पूजा होती है। बाकी केदारों में, जैसे केदारनाथ में पृष्ठ भाग (पीठ), तुंगनाथ में भुजाएं, मध्यमहेश्वर में नाभि और कल्पेश्वर में जटाओं की पूजा होती है।
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    दुर्गम यात्रा: रुद्रनाथ की यात्रा को पंच केदारों में सबसे कठिन माना जाता है। यह मंदिर समुद्र तल से 2286 मीटर की ऊंचाई पर घने जंगलों और बुग्यालों (High altitude meadows) के बीच स्थित है। यहां पहुंचने के लिए लगभग 20-22 किलोमीटर का कठिन पैदल ट्रैक करना पड़ता है।
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बदरीनाथ धाम: पौराणिक इतिहास और 'स्वयं व्यक्त' विग्रह का रहस्य

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बदरीनाथ धाम को शास्त्रों में 'भू-बैकुंठ' कहा गया है, जिसका अर्थ है- धरती पर स्थित बैकुंठ धाम। यह मंदिर अलकनंदा नदी के तट पर, 'नर' और 'नारायण' नामक दो पर्वतों के बीच नीलकंठ शिखर की छाया में स्थित है।
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बदरीनाथ नाम की कथा: जब माता लक्ष्मी बनीं 'बदरी' का वृक्ष

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पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु ने यहां घोर तपस्या करने का निर्णय लिया। वे खुली जगह में तपस्या में लीन हो गए। तभी वहां मौसम खराब हो गया और भारी बर्फबारी शुरू हो गई, साथ ही तेज धूप भी निकलने लगी। भगवान को मौसम की मार से बचाने के लिए माता लक्ष्मी ने वहां एक 'बदरी' (बेर - wild berry) के वृक्ष का रूप धारण कर लिया और भगवान विष्णु के ऊपर छाया बनकर खड़ी हो गईं।
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जब भगवान विष्णु की तपस्या पूर्ण हुई, तो उन्होंने देखा कि माता लक्ष्मी बर्फ से ढकी हुई हैं। उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा कि आज से इस स्थान पर मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी और चूंकि तुमने बदरी वृक्ष बनकर मेरी रक्षा की, इसलिए यह स्थान 'बदरीनाथ' के नाम से जाना जाएगा।
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3.3 फीट की शालिग्राम मूर्ति और आदि शंकराचार्य

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मंदिर के गर्भगृह में भगवान बदरी नारायण की 3.3 फीट ऊंची (1 मीटर) काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है। यह मूर्ति शालिग्राम पत्थर से बनी है।
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    स्वयं व्यक्त क्षेत्र: हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्णु की हजारों मूर्तियां हैं, लेकिन उनमें से 8 मूर्तियां ऐसी हैं जो किसी शिल्पकार ने छेनी-हथौड़े से नहीं बनाईं, बल्कि वे स्वयं प्रकट हुई हैं। बदरीनाथ की मूर्ति इन्हीं आठ 'स्वयं व्यक्त क्षेत्रों' (Swayam Vyakta Kshetras) में से एक है। अन्य सात में श्रीरंगम, तिरुपति और मुक्तिनाथ शामिल हैं।
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    नारद कुंड से पुनर्स्थापना: इतिहासकार और मान्यताएं बताती हैं कि बौद्ध काल के दौरान आक्रमणों के भय से या कालांतर में यह मूर्ति नारद कुंड (अलकनंदा नदी का एक हिस्सा) में विलीन हो गई थी। 7वीं शताब्दी में जब आदि गुरु शंकराचार्य इस क्षेत्र में आए, तो उन्होंने दिव्य दृष्टि से इस मूर्ति को नारद कुंड से निकाला और पहले गरुड़ गुफा के पास और बाद में वर्तमान मंदिर में स्थापित किया।
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    चतुर्भुज रूप: इस मूर्ति में भगवान विष्णु पद्मासन (ध्यान मुद्रा) में बैठे हैं। उनके एक हाथ में शंख, दूसरे में चक्र है, और दो हाथ योग मुद्रा में हैं। यह भगवान का शांत और तपस्वी रूप है।
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राष्ट्रीय एकता का प्रतीक: केरल के पुजारी (रावल) की अनूठी परंपरा

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बदरीनाथ धाम भारत की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अखंडता का एक जीवित प्रमाण है। सोचिए, मंदिर हिमालय की चोटियों पर उत्तर भारत (उत्तराखंड) में है, लेकिन इसके मुख्य पुजारी सुदूर दक्षिण भारत (केरल) से आते हैं।
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    रावल (Rawal) पद: बदरीनाथ के मुख्य पुजारी को 'रावल' कहा जाता है। आदि शंकराचार्य ने देश को चार कोनों में जोड़ने के लिए यह व्यवस्था बनाई थी।
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    योग्यता: परंपरा के अनुसार, रावल अनिवार्य रूप से केरल राज्य के नम्बूदरी (Nambudiri) सम्प्रदाय के ब्राह्मण होने चाहिए। यह वही समुदाय है जिससे आदि शंकराचार्य स्वयं आते थे।
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    नियम और मर्यादा: रावल को अत्यंत कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। वे स्त्रियों का स्पर्श तो दूर, उनकी परछाई से भी बचते हैं। मंदिर के कपाट खुलने से लेकर बंद होने तक, वे ही भगवान की विशेष पूजा, श्रृंगार और भोग का अधिकार रखते हैं। उन्हें बदरीनाथ में भगवान का प्रतिनिधि माना जाता है।
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चारधाम यात्रा का क्रम और महत्व

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उत्तराखंड की चारधाम यात्रा (Char Dham Yatra) मोक्ष दायिनी मानी जाती है। शास्त्रों में इस यात्रा का एक निश्चित आध्यात्मिक क्रम बताया गया है, जो 'परिक्रमा' की तरह पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ता है।
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    यमुनोत्री (Yamunotri): यात्रा की शुरुआत सूर्य पुत्री यमुना जी के दर्शन से होती है। यह पापों के नाश और शुद्धि का प्रतीक है।
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    गंगोत्री (Gangotri): इसके बाद श्रद्धालु मोक्ष दायिनी भागीरथी (गंगा) के उद्गम स्थल जाते हैं।
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    केदारनाथ (Kedarnath): फिर भगवान शिव के बारहवें ज्योतिर्लिंग, केदारनाथ की कठिन चढ़ाई की जाती है। बिना शिव की अनुमति के विष्णु धाम नहीं जाया जाता।
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    बदरीनाथ (Badrinath): अंत में भगवान विष्णु के धाम बदरीनाथ पहुंचकर यात्रा पूर्ण मानी जाती है। कहावत है- "जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी" (यानी जो व्यक्ति बदरीनाथ के दर्शन कर लेता है, उसे दोबारा माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता, उसे मोक्ष मिल जाता है)।
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नोट: यमुनोत्री और गंगोत्री के कपाट आमतौर पर अक्षय तृतीया के दिन (इस वर्ष 20-21 अप्रैल के आसपास) सबसे पहले खुलते हैं। इसके कुछ दिनों बाद केदारनाथ और अंत में 23 अप्रैल को बदरीनाथ के कपाट खोले जाएंगे।
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छह माह देवता और छह माह मनुष्य करते हैं पूजा

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बदरीनाथ और अन्य धामों के कपाट साल में केवल 6 महीने (ग्रीष्मकाल) के लिए ही क्यों खुलते हैं? इसके पीछे भौगोलिक और पौराणिक दोनों कारण हैं।
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भौगोलिक कारण

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सर्दियों में (नवंबर से अप्रैल तक) यह पूरा हिमालयी क्षेत्र भारी बर्फबारी की चपेट में रहता है। तापमान शून्य से 10-20 डिग्री नीचे चला जाता है। बदरीनाथ जाने वाले रास्ते बर्फ से ब्लॉक हो जाते हैं और वहां जीवन यापन असंभव हो जाता है। इसलिए कपाट बंद कर दिए जाते हैं और भगवान की चल-विग्रह मूर्ति को नीचे जोशीमठ के नृसिंह मंदिर में लाया जाता है।
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पौराणिक मान्यता: नारद जी की भक्ति

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मान्यता है कि एक वर्ष इंसानों का एक दिन देवताओं का होता है। इसलिए 6 महीने (जो देवताओं का दिन है) कपाट खुले रहते हैं और मनुष्य पूजा करते हैं। शेष 6 महीने (जो देवताओं की रात है), कपाट बंद होने के बाद देवर्षि नारद और अन्य देवतागण भगवान बदरीनाथ की पूजा करते हैं।
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कपाट बंद करते समय मुख्य पुजारी गर्भगृह में एक 'अखंड ज्योति' (घी का दीपक) जलाकर आते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि 6 महीने बाद, भारी बर्फबारी और ऑक्सीजन की कमी के बावजूद, जब कपाट 23 अप्रैल को खुलेंगे, तो वह ज्योति जलती हुई मिलती है। इस अखंड ज्योति के दर्शन को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
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यात्रा के लिए आवश्यक तैयारी: कैसे पहुंचें और कहां ठहरें?

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23 अप्रैल की तारीख घोषित होते ही श्रद्धालुओं को अपनी यात्रा की योजना बनाना शुरू कर देना चाहिए। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं:
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पंजीकरण (Registration) अनिवार्य

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उत्तराखंड सरकार ने पिछले कुछ वर्षों से चारधाम यात्रा के लिए बायोमेट्रिक/ऑनलाइन पंजीकरण अनिवार्य कर दिया है। 2026 में भी आपको यात्रा शुरू करने से पहले उत्तराखंड पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट या ऐप पर अपना पंजीकरण कराना होगा।
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कैसे पहुंचें?

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    हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा देहरादून (जौलीग्रांट) है। वहां से आप टैक्सी या बस ले सकते हैं। इसके अलावा, देहरादून के सहस्त्रधारा से बदरीनाथ के लिए सीधी हेलीकॉप्टर सेवा भी उपलब्ध है।
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  • \r\n
  • \r\n
    रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश और हरिद्वार हैं। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक की रेल लाइन परियोजना (जो निर्माणाधीन थी) 2026 तक काफी हद तक प्रगति पर है, लेकिन मुख्य यात्रा अभी भी सड़क मार्ग से ही होती है।
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    सड़क मार्ग: ऋषिकेश से बदरीनाथ की दूरी लगभग 300 किमी है। ऑल वेदर रोड (All Weather Road) परियोजना के कारण अब सड़क काफी चौड़ी और सुरक्षित हो गई है। आप अपनी कार, टैक्सी या रोडवेज बसों से आसानी से पहुंच सकते हैं।
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रुकने की व्यवस्था

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बदरीनाथ में गढ़वाल मंडल विकास निगम (GMVN) के गेस्ट हाउस, धर्मशालाएं और निजी होटल उपलब्ध हैं। चूंकि 23 अप्रैल को कपाट खुलने के समय भारी भीड़ होगी, इसलिए बुकिंग पहले से करना समझदारी होगी।
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आस्था के महाकुंभ का निमंत्रण

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23 जनवरी, वसंत पंचमी का यह पावन दिन हम सभी के लिए एक आध्यात्मिक निमंत्रण लेकर आया है। 23 अप्रैल 2026 की सुबह जब बदरीनाथ के सिंह द्वार खुलेंगे, घंटियों की गूंज हिमालय से टकराएगी और 'जय बदरी विशाल' के जयकारे लगेंगे, तो वह केवल एक मंदिर का खुलना नहीं होगा, बल्कि वह क्षण होगा जब नश्वर मनुष्य का मिलन शाश्वत परमात्मा से होगा।
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यदि आप भी इस वर्ष बदरीनाथ धाम जाने का संकल्प ले रहे हैं, तो 23 अप्रैल की तारीख अपने कैलेंडर में सुरक्षित कर लें। अपने स्वास्थ्य की जांच कराएं, गर्म कपड़े तैयार रखें और मन में श्रद्धा का भाव लेकर देवभूमि की ओर कदम बढ़ाएं।
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याद रखें: हिमालय केवल घूमने की जगह नहीं, यह महसूस करने की जगह है। अपनी यात्रा को पवित्र रखें, पर्यावरण का ध्यान रखें और प्लास्टिक मुक्त यात्रा का संकल्प लें।
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|| जय बदरी विशाल ||
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त्वरित तथ्य (Quick Facts Summary)

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विवरण
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जानकारी
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मंदिर का नाम
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श्री बदरीनाथ धाम (चमोली, उत्तराखंड)
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कपाट खुलने की तिथि
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23 अप्रैल, 2026 (गुरुवार)
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कपाट खुलने का समय
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सुबह 6:15 बजे
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घोषणा का दिन
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वसंत पंचमी (23 जनवरी 2026)
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प्रधान देवता
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भगवान विष्णु (बदरी नारायण)
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मूर्ति का प्रकार
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शालिग्राम शिला (स्वयं व्यक्त)
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मुख्य पुजारी
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रावल (केरल के नम्बूदरी ब्राह्मण)
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रुद्रनाथ कपाट खुलने की तिथि
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18 मई, 2026
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शीतकालीन आवास
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नृसिंह मंदिर, जोशीमठ
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निकटतम हवाई अड्डा
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जौलीग्रांट, देहरादून
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