घरेलू बजट और आम आदमी की रसोई पर एक बार फिर महंगाई की गहरी मार पड़ने वाली है। सुबह उठकर इस्तेमाल होने वाले टूथपेस्ट से लेकर, नहाने के साबुन, कपड़े धोने के सर्फ और चाय के साथ खाए जाने वाले बिस्किट तक—यानी सभी फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) जल्द ही महंगे होने जा रहे हैं। भारत में हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL), आईटीसी (ITC), नेस्ले (Nestle), डाबर (Dabur) और ब्रिटानिया (Britannia) जैसी दिग्गज कंपनियां इन रोजमर्रा के उत्पादों का निर्माण करती हैं।READ ALSO:-उत्तर प्रदेश में मानसून का कहर: काशी के 84 घाटों का संपर्क टूटा, मथुरा से वाराणसी तक नदियां उफान पर, 52 जिलों में अलर्ट; पढ़ें पूरब और पश्चिम का मौसम मिज़ाज
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बाजार के जानकारों और कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के अनुसार, पाम ऑयल, चीनी और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव ने कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव बना दिया है। इस दबाव से निपटने के लिए कंपनियों ने चालू तिमाही (जुलाई-सितंबर) में सीधे तौर पर रेट बढ़ाने के साथ-साथ एक नई रणनीति यानी 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkflation) का सहारा लेना शुरू कर दिया है। इससे पहले भी, अप्रैल-जून की पिछली तिमाही में इन कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में औसतन 2 से 5 प्रतिशत तक का इजाफा किया था।
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आइए विस्तार से समझते हैं कि देश की कौन सी प्रमुख कंपनी क्या रणनीति अपना रही है और आम उपभोक्ता की जेब पर इसका क्या असर होगा।
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\r\n\r\nक्या है 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkflation) का खेल?
\r\n\r\nअर्थशास्त्र की दुनिया में 'श्रिंकफ्लेशन' एक ऐसी छुपी हुई महंगाई है जो ग्राहक को सीधे तौर पर नजर नहीं आती। इसके तहत, कंपनियां सामान की कीमत (MRP) में कोई बदलाव नहीं करतीं, बल्कि उसी कीमत में पैकेट के अंदर मिलने वाले सामान की मात्रा या वजन (Weight/Quantity) को चुपचाप कम कर देती हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप 10 रुपये में 100 ग्राम बिस्किट खरीदते थे, तो श्रिंकफ्लेशन के लागू होने के बाद आपको 10 रुपये में केवल 85 या 90 ग्राम बिस्किट ही मिलेंगे। इस तरह ग्राहक को लगता है कि दाम नहीं बढ़े, लेकिन असल में वह कम सामान के लिए उतने ही पैसे चुका रहा होता है। वर्तमान में एफएमसीजी सेक्टर अपने मार्जिन को बचाने के लिए इसी फॉर्मूले का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है।
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\r\n\r\nब्रिटानिया (Britannia): ₹5 और ₹10 वाले बिस्किट पैकेट का घटेगा वजन
\r\n\r\nदेश की सबसे प्रमुख बेकरी और स्नैक कंपनी, ब्रिटानिया (Britannia) चालू तिमाही में महंगाई से निपटने के लिए मुख्य रूप से 'श्रिंकफ्लेशन' का ही सहारा ले रही है। कंपनी अपने उत्पादों में 1.5 से 2 प्रतिशत की अप्रत्यक्ष बढ़ोतरी करने जा रही है। इसका सीधा असर उन ग्राहकों पर पड़ेगा जो छोटे पैकेट खरीदते हैं, क्योंकि यह कटौती मुख्य रूप से ₹5 और ₹10 वाले बिस्किट पैक्स के वजन में देखने को मिलेगी।
\r\n\r\n\r\n\r\nकंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) और सीईओ रक्षित हरगवे ने बाजार के मौजूदा हालातों पर टिप्पणी करते हुए बताया कि चीनी और पाम ऑयल जैसे प्रमुख कच्चे माल की कीमतें अभी भी अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजार में काफी ऊंची बनी हुई हैं। उन्होंने कहा, "चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में हमारी ग्रोथ काफी हद तक श्रिंकफ्लेशन की रणनीति पर ही निर्भर थी और हमें चालू तिमाही में भी इस ट्रेंड को मजबूरी में जारी रखना पड़ेगा।" हालांकि, उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि बाजार में डिमांड (मांग) का माहौल अभी भी काफी मजबूत दिख रहा है, जो कंपनी के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
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हिंदुस्तान यूनिलीवर और गोदरेज: दाम बढ़ाने और 'वेट एंड वॉच' की नीति
\r\n\r\nहिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL): 2 से 5% तक बढ़ सकती है महंगाई देश की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनियों में से एक, हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) अपने अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरी में कीमतें बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। कंपनी के आंतरिक अनुमानों के अनुसार, जून तिमाही के मुकाबले मौजूदा सितंबर तिमाही में उत्पादों के दामों में 2 से 5 प्रतिशत तक की वृद्धि की जा सकती है। इससे साबुन, शैंपू और डिटर्जेंट जैसे उत्पादों के महंगे होने की प्रबल संभावना है।
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गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स (Godrej): क्रूड के स्थिर होने का इंतजार गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड ने हाल ही में बीती जून तिमाही में अपने उत्पादों के दाम औसतन 5 प्रतिशत बढ़ाए थे। इसलिए, कंपनी का कहना है कि वह चालू तिमाही में फिलहाल तुरंत किसी बड़े 'प्राइस हाइक' (Price Hike) से बच रही है और कमोडिटी मार्केट के पूरी तरह से स्थिर होने का इंतजार कर रही है। कंपनी के सीईओ सुधीर सीतापति ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि गोदरेज के कई इनपुट कॉस्ट सीधे तौर पर कच्चे तेल (Crude Oil) से जुड़े होते हैं। उन्होंने कहा, "ब्रेंट क्रूड फिलहाल 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। अगर क्रूड इसी रेंज में टिका रहता है तो हमें तत्काल किसी बड़े प्राइस हाइक की जरूरत नहीं पड़ेगी और हम वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए अपने रेवेन्यू टारगेट को आसानी से हासिल कर लेंगे।"
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डाबर, टाटा और नेस्ले: वैश्विक संकट और एल-नीनो का डर
\r\n\r\nडाबर इंडिया (Dabur India): डाबर इंडिया के ग्लोबल सीईओ मोहित मल्होत्रा ने महंगाई के इस दौर पर बेबाकी से अपनी राय रखी। उनका मानना है कि कच्चे माल की बढ़ती लागत का सिलसिला आने वाले दिनों में भी बरकरार रह सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कंपनियों के पास इस भारी लागत का बोझ अंततः कंज्यूमर्स (उपभोक्ताओं) पर डालने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। इससे एफएमसीजी उत्पादों के कुल वॉल्यूम (बिक्री की मात्रा) पर भी असर देखने को मिल सकता है।
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टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड: कंपनी के एमडी सुनील डी'सूजा के अनुसार, लागत का असर काफी डायनेमिक (लगातार बदलने वाला) होता है। कंपनी बाजार की स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है और अगर जरूरत पड़ी तो भविष्य में उत्पादों की कीमतों में बदलाव किया जाएगा।
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नेस्ले इंडिया (Nestle India): मैगी और कॉफी बनाने वाली प्रमुख कंपनी नेस्ले इंडिया ने अपने इन्वेस्टर प्रेजेंटेशन में एक बड़ी चेतावनी दी है। कंपनी का मानना है कि शॉर्ट-टर्म (अल्पावधि) में उपभोक्ताओं की ओवरऑल खपत थोड़ी सुस्त पड़ सकती है। नेस्ले ने वेस्ट एशिया (मध्य पूर्व) में चल रहे संघर्ष और मानसून पर 'अल नीनो' (El-Nino) के संभावित असर को फूड एंड बेवरेज सेक्टर के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है।
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महत्वपूर्ण आर्थिक शब्दावली: क्या है 'अल नीनो' और 'इनपुट कॉस्ट'?
\r\n\r\nबाजार की इस पूरी उथल-पुथल को समझने के लिए इन दो शब्दों को समझना बेहद जरूरी है:
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- \r\n अल नीनो (El-Nino): यह प्रशांत महासागर में समुद्र के पानी के सतह के असामान्य रूप से गर्म होने की एक बड़ी भौगोलिक और मौसमी घटना है। जब अल नीनो सक्रिय होता है, तो इसके कारण भारत में आने वाली मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इससे देश में सूखा पड़ने या सामान्य से कम बारिश होने का खतरा पैदा हो जाता है। बारिश कम होने से कृषि उत्पादन (जैसे गेहूं, चीनी, तिलहन) घटता है और सप्लाई कम होने से खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाती हैं।\r\n \r\n
- \r\n इनपुट कॉस्ट (Input Cost): किसी भी प्रोडक्ट को फैक्ट्री में तैयार करने या बनाने में लगने वाले कच्चे माल, ईंधन (पेट्रोल/डीजल), पैकेजिंग सामग्री, ट्रांसपोर्टेशन और मजदूरी के कुल खर्च को इनपुट कॉस्ट कहा जाता है। जब जियोपॉलिटिकल तनाव या अन्य कारणों से यह लागत बढ़ती है, तो कंपनियों को अपना प्रॉफिट मार्जिन बचाने के लिए अंतिम प्रोडक्ट का एमआरपी (MRP) बढ़ाना ही पड़ता है।\r\n \r\n
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आगे की राह: कैसे होगा बचाव?
\r\n\r\nकीमतों में लगातार हो रही इस बढ़ोतरी के बावजूद, एफएमसीजी सेक्टर को भरोसा है कि भारत के शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में उत्पादों की बुनियादी खपत बनी रहेगी। अपने प्रॉफिट को सुरक्षित रखने के लिए कंपनियां अब अपनी रणनीति में बदलाव कर रही हैं।
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आने वाले समय में कंपनियां अपने ऑपरेटिंग खर्चों (Operating Expenses) को घटाने, सप्लाई चेन में प्रोडक्टिविटी बढ़ाने और ज्यादा मार्जिन वाले 'प्रीमियम प्रोडक्ट्स' (Premium Products) की बिक्री बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही हैं। इन तमाम कोशिशों का एकमात्र लक्ष्य वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान बाजार की अस्थिरता के बीच अपने मुनाफे (मार्जिन) को बरकरार रखना है। हालांकि, इन सब के बीच यह तय है कि आम उपभोक्ता को निकट भविष्य में महंगाई से कोई बड़ी राहत मिलने की उम्मीद नहीं है।



Sabse pehle comment karne wale banein.