खबरीलाल डेस्क
नई दिल्ली (New Delhi). भारतीय कार बाजार में जब भी कोई ग्राहक गाड़ी खरीदने जाता है, तो उसका सबसे पहला सवाल यही होता है—"भैया, ये गाड़ी माइलेज कितना देती है?" (Kitna Deti Hai?). सेल्समैन बड़े गर्व से ब्रोशर (Brochure) में लिखा 25 kmpl का आंकड़ा दिखाता है, लेकिन जब गाड़ी सड़क पर आती है, तो हकीकत 15-16 kmpl पर सिमट जाती है। बरसों से चला आ रहा यह 'लैब टेस्ट' और 'असली सड़क' के बीच का अंतर अब खत्म होने वाला है।READ ALSO:-Uzma Khan Kanwar Yatra: मजहब की दीवारें तोड़ शिव भक्ति में रमीं उजमा खान; 4 साल के लिव-इन पार्टनर लोकेंद्र के लिए उठाई कांवड़, पुलिस के पहरे में गूंजा 'हर-हर महादेव'
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सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। अप्रैल 2027 से भारत में WLTP (Worldwide Harmonized Light Vehicles Test Procedure) एमिशन टेस्ट लागू होने जा रहा है। इसका सीधा मतलब है कि कार कंपनियां अब माइलेज और प्रदूषण के आंकड़ों के साथ खेल नहीं पाएंगी।
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क्या है WLTP और यह क्यों जरूरी है?

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अब तक भारत में गाड़ियों का माइलेज और प्रदूषण का स्तर MIDC (Modified Indian Driving Cycle) के आधार पर मापा जाता था। यह एक पुराना सिस्टम है जो मुख्य रूप से प्रयोगशाला (Lab) के नियंत्रित वातावरण में टेस्ट किया जाता है। इसमें ट्रैफिक, बार-बार ब्रेक लगाने, तेज रफ्तार और एसी (AC) के असर को पूरी तरह शामिल नहीं किया जाता था। यही वजह है कि कंपनी का दावा और ग्राहक का अनुभव अलग-अलग होता था।
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WLTP (वर्ल्डवाइड हार्मोनाइज्ड लाइट व्हीकल टेस्ट प्रोसीजर) एक वैश्विक मानक है, जिसे यूरोप और जापान जैसे देशों में पहले ही अपनाया जा चुका है। यह टेस्ट:
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    वास्तविक ड्राइविंग स्थिति (Real World Driving Conditions): यह लैब के बजाय सड़क की वास्तविक परिस्थितियों के ज्यादा करीब होता है।
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    सटीक आकलन: इसमें गाड़ी की स्पीड, गियर शिफ्टिंग, वजन और एसेसरीज का माइलेज पर पड़ने वाला असर ज्यादा सटीकता से मापा जाता है।
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अप्रैल 2027 से बदल जाएगा पूरा सिस्टम

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सरकार ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 (CMVR) में संशोधन किया है। नोटिफिकेशन के मुताबिक, 1 अप्रैल 2027 से बनने वाले नए वाहनों और मौजूदा मॉडलों के नए वर्जन को WLTP टेस्ट पास करना होगा। इसका उद्देश्य भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर को अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराबर लाना है।
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किन गाड़ियों पर लागू होगा नियम? यह नियम मुख्य रूप से दो कैटेगरी की गाड़ियों पर लागू होगा:
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    M1 कैटेगरी: इसमें वे सभी पैसेंजर कारें आती हैं जिनमें ड्राइवर के अलावा अधिकतम 8 सीटें होती हैं (जैसे- Alto, Swift, Creta, Scorpio आदि)।
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    M2 कैटेगरी: इसमें 9 या उससे ज्यादा सीटों वाले वाहन आते हैं, लेकिन जिनका कुल वजन 5 टन से कम है (जैसे- Force Traveller, वैन आदि)।
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    M2G कैटेगरी: इसमें ऑफ-रोड क्षमता वाले बड़े पैसेंजर वाहन शामिल हैं।
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प्रदूषण के आंकड़ों में नहीं होगी हेराफेरी

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नया नियम सिर्फ माइलेज (Fuel Efficiency) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका बड़ा असर प्रदूषण (Emission) की जांच पर भी पड़ेगा। WLTP टेस्ट के दौरान गाड़ी से निकलने वाले खतरनाक तत्वों की जांच ज्यादा गहराई से की जाएगी।
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    कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
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    हाइड्रोकार्बन (HC)
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    नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx)
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    पार्टिकुलेट मैटर (PM)
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अब तक कई बार यह देखा गया है कि गाड़ियां लैब में तो प्रदूषण मानकों को पूरा कर लेती हैं, लेकिन सड़क पर ज्यादा धुआं छोड़ती हैं। WLTP इस खामी को दूर करेगा। यह पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।
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CAFE नियमों पर क्या होगा असर?

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इस बदलाव का सीधा असर CAFE (Corporate Average Fuel Efficiency) नियमों पर भी पड़ेगा। CAFE नियम कार कंपनियों को मजबूर करते हैं कि वे अपनी सभी बिकी हुई गाड़ियों का औसत माइलेज एक तय सीमा से ऊपर रखें।
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अभी तक CAFE नियम MIDC (पुराने टेस्ट) पर आधारित थे। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) ने सुझाव दिया है कि 31 मार्च 2027 से जब CAFE-III (तीसरा चरण) लागू हो, तो उसे WLTP के साथ जोड़ दिया जाए। इससे कंपनियों पर दबाव बनेगा कि वे ऐसी इंजन तकनीक विकसित करें जो सिर्फ टेस्ट में ही नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी कम ईंधन खाए।
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ग्राहकों को क्या फायदा होगा?

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आम जनता के लिए यह खबर राहत देने वाली है। हालांकि, हो सकता है कि कागज पर दिखने वाला माइलेज कम हो जाए (जैसे 25 kmpl का दावा घटकर 18-19 kmpl हो जाए), लेकिन वह आंकड़ा 'सच्चा' होगा।
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    पारदर्शिता (Transparency): आपको गाड़ी खरीदते वक्त पता होगा कि शहर के ट्रैफिक में और हाईवे पर गाड़ी असल में कितना एवरेज देगी।
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    बेहतर तकनीक: कड़े नियमों के कारण कंपनियों को हाइब्रिड और बेहतर इंजन तकनीक लानी पड़ेगी।
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    तुलना करना आसान: ग्राहक अलग-अलग कारों की परफॉर्मेंस की सही तुलना कर पाएंगे।
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BS-VI वाहनों के लिए चुनौती

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नए नियम सिर्फ आने वाली नई कारों के लिए नहीं, बल्कि सभी BS-VI (Bharat Stage 6) वाहनों के लिए भी लागू होंगे। इसके लिए AIS-175 स्टैंडर्ड को अपनाया जाएगा। इसमें टाइप अप्रूवल, प्रोडक्शन की जांच और गाड़ी पुरानी होने पर उसके एमिशन लेवल की निगरानी (In-service conformity) शामिल होगी। इसका मतलब है कि अगर कोई गाड़ी 5 साल बाद भी तय सीमा से ज्यादा प्रदूषण करती पाई गई, तो कंपनी की जवाबदेही तय हो सकती है।
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भारत सरकार का WLTP की तरफ बढ़ना ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा सुधार है। अप्रैल 2027 अभी थोड़ा दूर लग सकता है, लेकिन कार कंपनियों के लिए अपनी इंजन तकनीक को अपग्रेड करने के लिए यह समय बहुत कम है। यह फैसला न केवल पर्यावरण के लिए हितकर है, बल्कि यह भारतीय उपभोक्ताओं को उनके पैसे की सही वैल्यू (Value for Money) दिलाने में भी मदद करेगा। अब 'माइलेज के मायाजाल' से मुक्ति मिलने का समय आ गया है।
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सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने घोषणा की है कि अप्रैल 2027 से भारत में कारों के लिए WLTP (वर्ल्डवाइड हार्मोनाइज्ड लाइट व्हीकल टेस्ट प्रोसीजर) लागू किया जाएगा। यह मौजूदा MIDC सिस्टम की जगह लेगा। नए टेस्ट में M1 और M2 कैटेगरी की गाड़ियों का माइलेज और प्रदूषण लैब की जगह वास्तविक ड्राइविंग परिस्थितियों के आधार पर मापा जाएगा। इससे ग्राहकों को गाड़ी की असली परफॉर्मेंस पता चलेगी और प्रदूषण के आंकड़ों में पारदर्शिता आएगी।
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