नई दिल्ली/वाशिंगटन (Global Economic Desk): इतिहास गवाह है कि जब भी मध्य पूर्व (Middle East) सुलगता है, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था झुलस जाती है। ईरान और इजराइल के बीच चल रहे अभूतपूर्व तनाव ने अब एक ऐसे वैश्विक ऊर्जा संकट (Global Energy Crisis) को जन्म दे दिया है, जिसके परिणाम कोविड-19 महामारी से भी ज्यादा भयावह हो सकते हैं।READ ALSO:-लाल बत्ती का 'नटवरलाल': खुद को SDM बताकर रचाई 26वीं शादी, 30 लाख ठगे; फर्जी IAS प्रीतम निषाद की तलाश में इटावा पहुंची गोरखपुर पुलिस
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वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवन रेखा माने जाने वाले 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) के लगभग बंद होने की कगार पर पहुंचने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोहराम मच गया है। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें रॉकेट की रफ्तार से भागते हुए 112 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर को पार कर गई हैं। दुनिया भर की सरकारें अब ईंधन बचाने के लिए आपातकालीन कदम उठा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने तो खुलेआम ऐसी रणनीतियों का प्रस्ताव दे दिया है, जो दुनिया को वापस 'लॉकडाउन' (Lockdown) के युग में धकेल सकती हैं।
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आइए, इस विस्तृत रिपोर्ट में समझते हैं कि यह 'ऑयल शॉक' (Oil Shock) कैसे आया, दुनिया भर में राशनिंग की क्या स्थिति है, IEA का 10-सूत्रीय 'एनर्जी लॉकडाउन' प्लान क्या है और 80% आयात पर निर्भर भारत के लिए आगे का रास्ता कितना कठिन है।
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'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का चोकपॉइंट: विश्व अर्थव्यवस्था की कटी हुई नस
\r\n\r\nइस पूरे संकट का केंद्र बिंदु ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है, जिसे 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) कहा जाता है।
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- \r\n भौगोलिक महत्व: यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट है। अपने सबसे संकरे बिंदु पर यह मात्र 21 मील (34 किलोमीटर) चौड़ा है।\r\n \r\n
- \r\n तेल का गणित: सामान्य दिनों में, दुनिया भर में खपत होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 20% से 25% हिस्सा (प्रतिदिन लगभग 21 मिलियन बैरल) इसी रास्ते से गुजरता है।\r\n \r\n
- \r\n वर्तमान स्थिति: ईरान और इजराइल की गोलाबारी और सैन्य तनाव के कारण बीमा कंपनियों ने इस रूट से गुजरने वाले जहाजों का प्रीमियम इतना बढ़ा दिया है कि शिपिंग कंपनियों ने इस मार्ग से किनारा कर लिया है। अमेरिका की चेतावनियों के बाद यह जलमार्ग लगभग 'बंद' (Blockade) जैसी स्थिति में आ गया है।\r\n \r\n
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नतीजतन, बाजार में तेल की भारी किल्लत (Supply Shock) पैदा हो गई है, जिसने कीमतों को 112 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है।
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महंगाई की सुनामी: 5 डॉलर का गैसोलीन और खाद्य सुरक्षा पर मंडराता संकट
\r\n\r\nकच्चे तेल की कीमतों में इस भारी उछाल का सीधा असर ट्रांसपोर्टेशन (Transportation Cost) पर पड़ा है, जो एक 'डोमिनो इफ़ेक्ट' (Domino Effect) की तरह पूरी अर्थव्यवस्था को लील रहा है।
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- \r\n अमेरिका में हाहाकार: सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में गैसोलीन की कीमतें 5 डॉलर प्रति गैलन के ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक स्तर को छू गई हैं। इससे वहां के आम नागरिकों का बजट पूरी तरह चरमरा गया है और मुद्रास्फीति (Inflation) बेकाबू हो रही है।\r\n \r\n
- \r\n खाद्य सुरक्षा (Food Security) खतरे में: डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के महंगा होने से माल ढुलाई की लागत आसमान छू रही है। खेतों से मंडियों और फैक्ट्रियों से सुपरमार्केट तक सामान पहुंचाने का खर्च दोगुना हो गया है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजों (गेहूं, चावल, सब्जियां, खाद्य तेल) पर पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने चेतावनी दी है कि यदि हालात यही रहे, तो गरीब देशों में भयंकर खाद्य संकट पैदा हो सकता है।\r\n \r\n
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दुनिया भर में 'ऑयल क्राइसिस' का असर: एयरलाइंस से लेकर पेट्रोल पंप तक
\r\n\r\nईंधन की कमी का असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग डरावने रूपों में दिखने लगा है:
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- \r\n हवाई यात्राओं पर ब्रेक (Airlines Cutting Flights): दुनिया भर की प्रमुख एयरलाइंस ईंधन बचाने और लागत कम करने के लिए अपनी उड़ानें रद्द कर रही हैं। अमेरिका की प्रमुख विमानन कंपनी यूनाइटेड एयरलाइंस (United Airlines) ने तो इसी हफ्ते अपनी 5 प्रतिशत उड़ानें आधिकारिक रूप से काट दी हैं। यूरोप और एशिया की अन्य एयरलाइंस भी 'फ्लाइट कंसोलिडेशन' (यात्रियों को कम उड़ानों में मर्ज करना) का सहारा ले रही हैं।\r\n \r\n
- \r\n विकसित देशों में ईंधन राशनिंग (Fuel Rationing): जापान और दक्षिण कोरिया जैसे तकनीकी रूप से उन्नत और समृद्ध देशों में भी सरकारें 'ईंधन राशनिंग' लागू करने पर मजबूर हो गई हैं। वहां पेट्रोल पंपों पर तेल भराने की सीमा तय की जा रही है।\r\n \r\n
- \r\n पड़ोसी देशों में त्राहिमाम: भारत के पड़ोसियों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) की कमी से जूझ रहे श्रीलंका, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल के लिए पंपों पर मीलों लंबी कतारें लग रही हैं। ब्लैक मार्केटिंग और दंगे जैसी स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं।\r\n \r\n
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IEA का 'एनर्जी लॉकडाउन' प्लान: क्या दुनिया फिर से घरों में कैद होगी?
\r\n\r\nइस अभूतपूर्व संकट से निपटने के लिए, पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने 'Sheltering from Oil Shocks' (तेल के झटकों से बचाव) नामक एक 10-सूत्रीय आपातकालीन योजना जारी की है।
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IEA का यह प्लान सप्लाई बढ़ाने पर नहीं, बल्कि 'मांग घटाने' (Demand Destruction) पर केंद्रित है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्लान हूबहू कोविड-19 महामारी के 'लॉकडाउन' प्रोटोकॉल जैसा ही है।
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IEA के 10-सूत्रीय प्लान के मुख्य बिंदु:
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- \r\n ऑड-ईवन (Odd-Even) फॉर्मूला: बड़े शहरों में वाहनों के लिए लाइसेंस प्लेट (नंबर प्लेट) आधारित दिनों का निर्धारण। यानी एक दिन सम (Even) नंबर की गाड़ियां चलेंगी, दूसरे दिन विषम (Odd) नंबर की।\r\n \r\n
- \r\n स्पीड लिमिट (Speed Limits): हाईवे और एक्सप्रेस-वे पर वाहनों की गति सीमा को घटाना। (विज्ञान के अनुसार, कम गति पर वाहन चलाने से ईंधन की भारी बचत होती है)।\r\n \r\n
- \r\n वर्क फ्रॉम होम (Work From Home - WFH): कंपनियों को सप्ताह में कम से कम 3 दिन कर्मचारियों को घर से काम करने का अनिवार्य आदेश देना, ताकि कम्यूटिंग (Commuting) में जलने वाला तेल बच सके।\r\n \r\n
- \r\n हवाई यात्राओं में भारी कटौती: बिजनेस ट्रिप (Business Trips) और गैर-जरूरी हवाई यात्राओं पर रोक। छोटी दूरी के लिए फ्लाइट की जगह हाई-स्पीड ट्रेन का उपयोग करना।\r\n \r\n
- \r\n कार-पूलिंग (Car-pooling): सिंगल-ऑक्यूपेंसी वाहनों (जिसमें सिर्फ ड्राइवर हो) पर भारी टैक्स लगाना और राइड-शेयरिंग को बढ़ावा देना।\r\n \r\n
- \r\n इलेक्ट्रिक चूल्हों का उपयोग: घरों में गैस (LPG/PNG) की खपत कम करने के लिए इलेक्ट्रिक स्टोव और इंडक्शन का इस्तेमाल बढ़ाना।\r\n \r\n
- \r\n सार्वजनिक परिवहन का विस्तार: मेट्रो, बसों और ट्रेनों के किराए को न्यूनतम करना और उनकी फ्रीक्वेंसी बढ़ाना।\r\n \r\n
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\r\n\r\n\r\nIEA की चेतावनी: "कोविड-19 के दौरान हमने देखा कि कैसे यात्राओं में कमी ने पर्यावरण और ऊर्जा की बचत की। ऊर्जा संकट से निपटने के लिए ये रणनीतियां कारगर साबित होंगी, हालांकि आम जनता को इसका असर एक लॉकडाउन जैसा ही महसूस होगा।"\r\n
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'डिजिटल परमिट' और स्वतंत्रता पर मंडराता खतरा (The Freedom Debate)
\r\n\r\nऊर्जा संकट के नाम पर अब कई पश्चिमी देशों की सरकारें ऐसे कदम उठा रही हैं, जो सीधे तौर पर नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Freedom) को चुनौती दे रहे हैं।
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- \r\n ऑस्ट्रेलिया का मॉडल: ऑस्ट्रेलिया जैसी सरकारें गैर-जरूरी यात्राओं (Non-essential Travel) पर सख्त रोक लगाने की बात कर रही हैं। यह भाषा बिल्कुल वैसी ही है, जैसी मार्च 2020 (कोविड काल) में इस्तेमाल की गई थी।\r\n \r\n
- \r\n डिजिटल कार्बन पास (Digital Carbon Pass): पर्यावरणविदों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचा, तो बात 'डिजिटल परमिट सिस्टम' (Digital Permit System) तक पहुंच सकती है। इस सिस्टम के तहत हर नागरिक का एक मासिक ऊर्जा/कार्बन कोटा तय किया जाएगा। यदि आप अपना कोटा पार कर लेते हैं, तो आप न तो अपनी गाड़ी में पेट्रोल भरा पाएंगे और न ही फ्लाइट की टिकट बुक कर पाएंगे।\r\n \r\n
- \r\n आलोचकों का तर्क: मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि 'ऊर्जा सुरक्षा' (Energy Security) की आड़ में सरकारें जनता की आजादी को छीनना चाहती हैं। यह सर्विलांस स्टेट (Surveillance State) की ओर एक खतरनाक कदम हो सकता है।\r\n \r\n
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🇮🇳 भारत के लिए चेतावनी: 80% तेल आयात और महंगाई का 'टाइम बम'
\r\n\r\nइस पूरे वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति बहुत नाजुक है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, लेकिन यह अपनी जरूरत का 80% से 85% कच्चा तेल आयात (Import) करता है। और इस आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व और होर्मुज जलडमरूमध्य से ही आता है।
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भारत पर क्या होगा असर?
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- \r\n महंगाई का विस्फोट: कच्चे तेल की कीमतें 112 डॉलर पार होने का मतलब है कि भारत का आयात बिल (Import Bill) कई अरब डॉलर बढ़ जाएगा। रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर जा सकता है।\r\n \r\n
- \r\n पेट्रोल-डीजल के दाम: यदि सरकार ने एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में भारी कटौती नहीं की, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 115 से 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती हैं।\r\n \r\n
- \r\n सब्सिडी का बोझ: एलपीजी और फर्टिलाइजर (Fertilizer) पर सरकार का सब्सिडी बिल आउट ऑफ कंट्रोल हो जाएगा, जिससे राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ेगा।\r\n \r\n
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भारत के लिए आगे का रास्ता (The Way Forward)
\r\n\r\nभारत को अब युद्धस्तर पर तैयारी करनी होगी:
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- \r\n वैकल्पिक स्रोत (Alternative Sources): रूस, लैटिन अमेरिका (वेनेजुएला) और अफ्रीकी देशों से लंबी अवधि के तेल अनुबंध (Long-term contracts) सुरक्षित करने होंगे।\r\n \r\n
- \r\n रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR): अपने Strategic Petroleum Reserves का सही इस्तेमाल करना होगा।\r\n \r\n
- \r\n ईवी और इथेनॉल (EV & Ethanol): इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के इंफ्रास्ट्रक्चर और पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) के लक्ष्य को युद्धस्तर पर लागू करना होगा।\r\n \r\n
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दुनिया एक अभूतपूर्व चौराहे पर खड़ी है। ईरान-इजराइल का यह युद्ध केवल बमों और मिसाइलों का नहीं है; यह एक ऐसा 'इकोनॉमिक वॉरफेयर' (Economic Warfare) है जो दुनिया की रफ्तार को रोक सकता है। अगर तेल की कीमतें जल्द शांत नहीं हुईं, तो हम सभी को 'वर्क फ्रॉम होम' और 'ईंधन राशनिंग' वाली उसी पुरानी 'न्यू नॉर्मल' (New Normal) दुनिया में लौटने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।