मेरठ/बुलंदशहर/हापुड़ (वेस्ट यूपी डेस्क): पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western UP) में सस्ता और सुलभ न्याय पाने की दशकों पुरानी मांग ने बुधवार को एक उग्र आंदोलन का रूप ले लिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच स्थापना की मांग को लेकर 'हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति' के आह्वान पर पश्चिमी यूपी के 22 जिलों में ऐतिहासिक बंद का व्यापक असर देखने को मिला। वकीलों के इस आंदोलन को व्यापारियों, डॉक्टरों और सामाजिक संगठनों का अभूतपूर्व समर्थन मिला। मेरठ, बुलंदशहर, बिजनौर और हापुड़ समेत तमाम जिलों में सुबह से ही बाजार बंद रहे और अधिवक्ता सड़कों पर डटे रहे।READ ALSO:-IPL 2026 Auction: मेरठ के 'सितारों' की चमक पड़ी फीकी; करोड़ों में बिकने वाले मावी और त्यागी लाखों में सिमटे, अनुभवी कर्ण शर्मा को नहीं मिला खरीदार
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मेरठ: आंदोलन का केंद्र, ओपीडी और स्कूल सब बंद क्रांतिधरा मेरठ में बंद का असर सबसे ज्यादा दिखाई दिया। बुधवार सुबह होते ही शहर में अघोषित कर्फ्यू जैसा नजारा था।
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    बाजारों में सन्नाटा: शहर के प्रमुख व्यापारिक केंद्र जैसे खैरनगर, सुमित बुढ़ाना गेट, और जिमखाना मैदान सुबह 11 बजे तक पूरी तरह बंद रहे। व्यापारियों ने स्वेच्छा से शटर गिराकर वकीलों की मांग का समर्थन किया।
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    बेंच नहीं तो वोट नहीं: वकीलों की टोलियां शहर भर में घूमती रहीं और उन्होंने साफ शब्दों में राजनीतिक दलों को चेतावनी दी कि अगर पश्चिमी यूपी को बेंच नहीं मिली, तो इस बार वोट भी नहीं मिलेगा।
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    आवश्यक सेवाएं प्रभावित: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के समर्थन के बाद डॉक्टरों ने ओपीडी सेवाएं बंद रखीं, जिससे अस्पतालों में सन्नाटा पसरा रहा। हालांकि, मरीजों की परेशानी को देखते हुए इमरजेंसी सेवाएं बहाल रखी गईं। इसके अलावा, एहतियात के तौर पर शहर के स्कूल और कॉलेजों को भी बंद रखा गया।
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बुलंदशहर: व्यापारी सुरक्षा फोरम ने संभाला मोर्चा बुलंदशहर में भी बंद का व्यापक असर देखने को मिला। यहाँ 'व्यापारी सुरक्षा फोरम' समेत विभिन्न सामाजिक संगठनों ने वकीलों के कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।
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    प्रमुख बाजार बंद: शहर की लाइफलाइन कहे जाने वाले अंसारी रोड, चौक बाजार, काला आम और रामघाट रोड जैसे इलाकों में दुकानें सुबह से ही नहीं खुलीं। आम दिनों में जहाँ पैर रखने की जगह नहीं होती थी, वहाँ आज सड़कें वीरान नजर आईं।
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    सड़कों पर प्रदर्शन: व्यापारियों और वकीलों ने अंसारी रोड पर एकत्र होकर जोरदार नारेबाजी की और सरकार से जल्द से जल्द बेंच स्थापना की घोषणा करने की मांग की।
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बिजनौर: रजिस्ट्री ऑफिस पर ताला, कलेक्ट्रेट तक मार्च बिजनौर में अधिवक्ताओं का प्रदर्शन बेहद आक्रामक रहा। यहाँ वकीलों ने सरकारी कामकाज को पूरी तरह ठप कर दिया।
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    तालाबंदी: रेवेन्यू बार एसोसिएशन के वकीलों ने उग्र प्रदर्शन करते हुए रजिस्ट्री कार्यालय (Sub-Registrar Office) पर ताला डाल दिया, जिससे ज़मीन-जायदाद की रजिस्ट्री का काम पूरी तरह रुक गया।
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    विशाल जुलूस: जिला बार एसोसिएशन के सैकड़ों वकील न्यायालय परिसर में एकत्र हुए और वहां से कलेक्ट्रेट तक पैदल मार्च निकाला। जोरदार नारेबाजी करते हुए उन्होंने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। वकीलों का कहना था कि वादकारियों को न्याय के लिए 700 किलोमीटर दूर प्रयागराज जाना पड़ता है, जो अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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हापुड़: चक्का जाम से थमे पहिए, पुलिस से नोकझोंक हापुड़ जिले में वकीलों के गुस्से का असर यातायात व्यवस्था पर पड़ा। बार एसोसिएशन के आह्वान पर अधिवक्ताओं ने तहसील चौराहे को जाम कर दिया।
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    यातायात प्रभावित: वकीलों द्वारा लगाए गए जाम के कारण तहसील चौराहे से गुजरने वाले सभी मार्गों पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। घंटों तक यातायात बुरी तरह प्रभावित रहा।
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    प्रशासन की कोशिशें नाकाम: जाम की सूचना मिलते ही भारी पुलिस बल मौके पर पहुंचा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने वकीलों से जाम खोलने की अपील की और बातचीत का प्रयास किया, लेकिन अधिवक्ता अपनी मांगों पर अड़े रहे। बाद में पुलिस ने रूट डायवर्जन कर यातायात को वैकल्पिक मार्गों से निकाला।
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क्या है मांग और क्यों है गुस्सा? पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों की आबादी और मुकदमों की संख्या को देखते हुए यहाँ लाहौर हाई कोर्ट (पाकिस्तान) और दिल्ली हाई कोर्ट नजदीक पड़ते हैं, जबकि अपने ही राज्य का इलाहाबाद हाई कोर्ट करीब 600-700 किलोमीटर दूर है। वादियों को तारीख पर जाने के लिए भारी आर्थिक और शारीरिक परेशानी उठानी पड़ती है। संघर्ष समिति का कहना है कि जसंवत सिंह आयोग की सिफारिशों के बावजूद सरकारें इस मुद्दे को टालती आ रही हैं। लेकिन आज 1200 से अधिक संगठनों के समर्थन ने यह साबित कर दिया है कि अब यह लड़ाई केवल वकीलों की नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी की 8 करोड़ जनता की है।
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बुधवार का यह बंद सरकार के लिए एक बड़ा संकेत है। जिस तरह से डॉक्टर, व्यापारी और छात्र इस आंदोलन से जुड़े हैं, उससे साफ है कि आने वाले समय में यह मुद्दा पश्चिमी यूपी की राजनीति में भूचाल ला सकता है।
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नोट: आंदोलन के चलते कई जगहों पर आम जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन अधिकतर लोगों ने इसे 'जरूरी मांग' बताते हुए सहयोग किया।
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