मेरठ: सनातन धर्म में गुप्त नवरात्रि का अत्यंत विशेष और गूढ़ महत्व माना गया है। यह समय केवल बाह्य आडंबरों का नहीं, बल्कि आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करने और आत्म-मंथन का होता है। इसी पावन और आध्यात्मिक अवसर पर मेरठ शहर में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी बह रही है। शनिवार, 18 जुलाई 2026 को जागृति विहार एक्सटेंशन स्थित वेदांत आश्रम के विशाल और पवित्र प्रांगण में वेदांत सत्संग समिति, मेरठ के तत्वावधान में आयोजित 'देवी भागवत कथा सप्ताह' के तृतीय दिवस का अत्यंत भव्य आयोजन संपन्न हुआ।READ ALSO:-मेरठ की बेटियों ने अंतरिक्ष विज्ञान में गाड़े झंडे: ISRO के प्रतिष्ठित 'मिशन शक्तिसैट' में लावण्या और रिया बनीं नेशनल फाइनलिस्ट
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शाम 5 बजे से 7 बजे तक चले इस ज्ञान सत्र में कथा व्यास पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद सरस्वती जी ने श्रीमद् देवी भागवत पुराण के अत्यंत गूढ़ रहस्यों पर अपना तात्विक और सारगर्भित प्रवचन दिया। उनके मुखारविंद से निकले वचनों ने वहां उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया और उन्हें धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया।
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तप और यज्ञ का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप

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पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद सरस्वती जी ने कथा का शुभारंभ करते हुए तप और यज्ञ की भ्रांतियों को दूर किया। उन्होंने समाज में व्याप्त उन धारणाओं का खंडन किया जो शरीर को कष्ट देने को ही तप मानती हैं।
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    तप की वास्तविक परिभाषा: स्वामी जी ने अत्यंत सरल शब्दों में समझाया कि "तप वास्तव में वह है जो किसी भी व्यक्ति के जीवन का उत्थान करे, न कि उसका पतन।" जो साधना मनुष्य को शारीरिक, मानसिक और वैचारिक रूप से ऊपर उठाती है, उसे श्रेष्ठ बनाती है, वही सच्चा तप है।
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    यज्ञ केवल कर्मकांड नहीं, विज्ञान है: यज्ञ को लेकर आधुनिक समाज के संशयों को दूर करते हुए उन्होंने कहा कि यज्ञ कोई अंधविश्वास या सामान्य कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह एक पूर्णतया वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यज्ञ की अग्नि और उसमें दी जाने वाली आहुतियों से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा वातावरण के जीवाणुओं को नष्ट करती है, प्रकृति का संतुलन बनाती है और मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध कर उसे परमात्मा से जोड़ती है।
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त्रिपदा गायत्री और मां भगवती का विराट स्वरूप

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कथा के सबसे मार्मिक और ज्ञानवर्धक प्रसंगों में से एक था मां भगवती के स्वरूप का वर्णन। स्वामी जी ने बताया कि श्रीमद् देवी भागवत पुराण का मंगलाचरण 'त्रिपदा गायत्री' छंद में किया गया है, जो इसकी महानता और अलौकिकता को दर्शाता है।
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    त्रितापों का शमन: मां भगवती स्वयं गायत्री स्वरूपा हैं। इस संसार में मनुष्य तीन प्रकार के तापों (कष्टों) से पीड़ित रहता है— दैहिक (शारीरिक रोग), दैविक (प्राकृतिक या ग्रहों के प्रकोप), और भौतिक (सांसारिक और आर्थिक कष्ट)। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि सच्चे मन और पूर्ण समर्पण के साथ मां भगवती की उपासना करने से इन तीनों तापों का समूल नाश हो जाता है और भक्त को परम शांति की प्राप्ति होती है।
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    पराशक्ति का दर्शन: मां भगवती कोई साधारण स्वरूप नहीं हैं। वे आदि विद्या, ब्रह्मविद्या, चैतन्य स्वरूपा एवं इस संपूर्ण ब्रह्मांड की पराशक्ति (सर्वोच्च ऊर्जा) हैं। इस सृष्टि का सृजन, पालन और संहार उन्हीं की इच्छा मात्र से होता है।
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सत्संग का महत्व: सात्विक, राजसिक और तामसिक चर्चाएं

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जीवन में संगति और चर्चा के महत्व को समझाते हुए स्वामी अनंतानंद सरस्वती जी ने कहा कि एक विवेकी और ज्ञानी मनुष्य कभी भी अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ की बातों में नष्ट नहीं करता। ज्ञानी जन अपना समय शास्त्रों के अध्ययन, मनन और आत्म-चिंतन में व्यतीत करते हैं।
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उन्होंने चर्चाओं को तीन श्रेणियों में विभाजित करते हुए समझाया:

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    सात्विक चर्चा: वेदांत, उपनिषद, ईश्वर के स्वरूप और आत्मा-परमात्मा की चर्चा सात्विक होती है। यह मनुष्य को शांति और मोक्ष की ओर ले जाती है।
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    राजसिक चर्चा: मीमांसा और केवल सकाम कर्मकांड (फल की इच्छा से किए गए कार्य) की चर्चा राजसिक श्रेणी में आती है। यह सांसारिक सुख तो देती है, लेकिन जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं करती।
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    तामसिक चर्चा: निंदा, चुगली, ईर्ष्या और सांसारिक प्रपंचों से जुड़ी अन्य सभी चर्चाएं तामसिक होती हैं, जो मनुष्य को पतन के गहरे गर्त में धकेल देती हैं।
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उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र देते हुए कहा, "इस संसार में अनेकों साधन उपलब्ध हैं, लेकिन जो साधन मनुष्य को मोक्ष (जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति) की प्राप्ति कराएं, वास्तव में वही सर्वश्रेष्ठ साधन हैं।"
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नैमिषारण्य तीर्थ, शुकदेव जन्म और हयग्रीव अवतार की अद्भुत कथाएं

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कथा के क्रम को आगे बढ़ाते हुए व्यासपीठ से स्वामी जी ने पुराणों के कई अत्यंत दुर्लभ और श्रवण-सुखद प्रसंगों का सजीव वर्णन किया:
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    नैमिष तीर्थ का प्रादुर्भाव: कथा में बताया गया कि किस प्रकार शौनक आदि अट्ठासी हजार ऋषियों ने नैमिष तीर्थ (नैमिषारण्य) में सूत जी से देवी जी की महिमा के विषय में प्रश्न किए। स्वामी जी ने नैमिष तीर्थ के प्रकट होने की वह अद्भुत कथा सुनाई, जिसने वहां बैठे सभी भक्तों को उस तपोभूमि का मानसिक दर्शन करा दिया।
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    महर्षि व्यास की पुत्र कामना और शुकदेव जी का अवतरण: महर्षि वेदव्यास जी के मन में एक ऐसे पुत्र की प्राप्ति की कामना उत्पन्न हुई जो जन्म से ही ज्ञानी और वीतराग हो। उनकी इस कठोर तपस्या के परिणामस्वरूप ही परम ज्ञानी और परमहंस शुकदेव जी का इस धरातल पर अवतरण हुआ। यह कथा वैराग्य और भक्ति का अनूठा संगम है।
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    भगवान का हयग्रीव अवतार: इसके पश्चात स्वामी जी ने भगवान के उस अत्यंत दुर्लभ 'हयग्रीव अवतार' (जिसमें भगवान का मुख घोड़े का और धड़ मनुष्य का था) की कथा का विस्तार से वर्णन किया। वेदों की रक्षा और असुरों के संहार के लिए भगवान ने यह रूप धारण किया था। इस प्रसंग को सुनकर पूरा पांडाल देवी और भगवान के जयकारों से गूंज उठा।
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व्यास पूजन एवं गणमान्य जनों की उपस्थिति

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इस ज्ञान-महायज्ञ के तृतीय दिवस का शुभारंभ अत्यंत भक्तिभाव के साथ किया गया। कथा प्रारंभ होने से पूर्व, यजमान श्रीमती अलका गुप्ता द्वारा पूर्ण विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ व्यासपीठ और स्वामी जी का 'व्यास पूजन' संपन्न किया गया।
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इस भव्य और आध्यात्मिक आयोजन को सफल बनाने में वेदांत सत्संग समिति, मेरठ के सभी सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कथा श्रवण करने के लिए पूरे मेरठ शहर से बड़ी संख्या में मातृशक्ति, युवा और बुजुर्ग श्रद्धालु पहुंचे। कार्यक्रम में मुख्य रूप से विपिन कुमार, संतर पाल जी, अनुराधा माहेश्वरी, और कर्णप्रिया विश्नोई सहित शहर के कई प्रतिष्ठित एवं गणमान्य जन उपस्थित रहे।
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वेदांत सत्संग समिति के मीडिया प्रभारी प्रियांक सिंघल ने बताया कि यह संगीतमय देवी भागवत कथा पूरे सप्ताह चलेगी और प्रतिदिन सायं 5 बजे से 7 बजे तक भक्तजन इसी प्रकार वेदांत आश्रम में उपस्थित होकर मां भगवती की महिमा का अमृतपान कर सकेंगे। उन्होंने समस्त शहरवासियों से इस पुनीत अवसर पर पधार कर धर्म लाभ उठाने की अपील की है।
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