यह घटना किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसी लगती है, लेकिन यह पूरी तरह से सच है और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में घटित हुई है। जीवन और मृत्यु के बीच का फासला बहुत बारीक होता है, लेकिन जब कोई इंसान मौत के बाद, या यों कहें कि मौत के आधिकारिक ऐलान और अंतिम संस्कारों के बाद वापस लौट आए, तो इसे आप क्या कहेंगे? चमत्कार, पुलिस की लापरवाही, या फिर नियति का एक अजीबोगरीब खेल?READ ALSO:-अयोध्या राम मंदिर पर बड़े आतंकी हमले की साजिश नाकाम: ATS-NIA के जॉइंट ऑपरेशन में कर्नाटक से गिरफ्तार हुआ सहारनपुर का सुहैल
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गाजियाबाद के कौशांबी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले वैशाली इलाके में एक ऐसा ही रोंगटे खड़े कर देने वाला और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। एक कैंसर पीड़ित मां ने भारी मन और आंसुओं के साथ अपने 42 वर्षीय बेटे का अंतिम संस्कार किया। हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार 13 दिनों तक शोक मनाया गया, और 24 जून को पूरे विधि-विधान से उसकी 'तेरहवीं' (शांतिभोज) भी संपन्न हो गई। रिश्तेदार सांत्वना देकर अपने-अपने घर लौट गए। लेकिन, कहानी में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब 25 जून की अलसुबह करीब 5 बजे उसी घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया। दरवाजा खोलने पर सामने वही बेटा खड़ा था, जिसकी एक दिन पहले तेरहवीं की गई थी।
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इस घटना ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। लोगों के मन में केवल दो ही सवाल हैं: पहला, यह चमत्कार कैसे हुआ? और दूसरा, जिस इंसान की लाश को जलाया गया, वह आखिर कौन था? आइए, इस पूरी घटना की तह तक जाते हैं और जानते हैं कि 16 मई से लेकर 25 जून तक आखिर ऐसा क्या-क्या हुआ जिसने पूरे पुलिस प्रशासन और परिवार को एक बड़े भ्रम में डाल दिया।
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घटना की पूरी पृष्ठभूमि: कौन है गिरधर सिंह बिष्ट?

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यह पूरी कहानी गाजियाबाद के कौशांबी थाना क्षेत्र के वैशाली स्थित कल्पना अपार्टमेंट के इर्द-गिर्द घूमती है। इसी अपार्टमेंट में 42 वर्षीय गिरधर सिंह बिष्ट अपनी बुजुर्ग और बीमार मां के साथ रहते हैं।
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    पारिवारिक स्थिति: गिरधर के पिता का काफी समय पहले ही निधन हो चुका है। घर में वह और उनकी मां ही रहते हैं। उनकी मां एक गंभीर बीमारी (कैंसर) से पीड़ित हैं, जिसका इलाज चल रहा है।
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    मानसिक स्वास्थ्य: पड़ोसियों और परिजनों के अनुसार, गिरधर सिंह बिष्ट मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं। उनकी मानसिक स्थिति में उतार-चढ़ाव बना रहता है, जिसके कारण उनकी अब तक शादी भी नहीं हो पाई है। वह अक्सर अपने ख्यालों में खोए रहते हैं और कई बार ऐसी बातें करते हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता।
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एक बीमार मां और मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटे का जीवन वैसे ही चुनौतियों से भरा होता है, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही दर्दनाक और हैरान करने वाली परीक्षा तय कर रखी थी।
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विवाद, गिरफ्तारी और डासना जेल का सफर (16 मई की घटना)

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इस पूरी घटना की शुरुआत 16 मई को हुई। आम दिनों की तरह गिरधर घर से बाहर निकले थे। इसी दौरान स्थानीय बाजार में किसी बात को लेकर उनका इलाके के दुकानदारों के साथ विवाद हो गया। मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण गिरधर स्थिति को संभाल नहीं पाए और बात काफी बढ़ गई।
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हंगामा बढ़ता देख किसी ने पुलिस को सूचना दे दी। मौके पर पहुंची कौशांबी पुलिस ने विवाद को शांत कराया, लेकिन कानूनी प्रक्रिया के तहत गिरधर सिंह बिष्ट को शांति भंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया और वहां से उन्हें गाजियाबाद की डासना जेल भेज दिया गया।
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एक कैंसर पीड़ित मां के लिए यह बहुत बड़ा आघात था। उसका मानसिक रूप से कमजोर बेटा, जो शायद यह भी नहीं समझ पा रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है, उसे सलाखों के पीछे भेज दिया गया था।
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जमानत और उसके बाद का रहस्यमय लापता होना (21 मई)

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कानूनी प्रक्रिया के तहत, शांति भंग के मामलों में जल्द ही जमानत मिल जाती है। 21 मई को अदालत से गिरधर सिंह बिष्ट को जमानत दे दी गई। उसी दिन शाम के समय उन्हें डासना जेल से रिहा कर दिया गया।
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यहीं से पुलिस, जेल प्रशासन और परिवार के बीच संवादहीनता का एक बहुत बड़ा मामला सामने आता है।
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    अकेले रिहाई: परिजनों का कहना है कि उन्हें जेल से रिहाई की सटीक जानकारी नहीं मिल पाई थी, इसलिए परिवार का कोई भी सदस्य गिरधर को लेने के लिए डासना जेल के गेट पर नहीं पहुंच सका।
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    भटकना: मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण, गिरधर जेल से बाहर निकलने के बाद सीधे अपने घर वैशाली (कल्पना अपार्टमेंट) नहीं पहुंच पाए। वह रास्ता भटक गए और गाजियाबाद की सड़कों पर कहीं खो गए।
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जब रात तक गिरधर घर नहीं लौटे, तो उनकी बीमार मां की चिंताएं बढ़ने लगीं। उन्होंने रिश्तेदारों की मदद से काफी तलाश की, लेकिन गिरधर का कोई सुराग नहीं मिला। अंततः थक-हारकर परिजनों ने पुलिस स्टेशन में गिरधर की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी।
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13 जून का मनहूस दिन: गंग नहर में मिली लाश और गलत पहचान

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गुमशुदगी दर्ज होने के बाद कई दिन बीत गए। परिवार हर दिन इस उम्मीद में दरवाजा देखता कि शायद गिरधर लौट आए। लेकिन 13 जून को मसूरी थाना क्षेत्र की पुलिस को एक सूचना मिली। गंग नहर में एक अज्ञात शव उतराता हुआ मिला।
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शव पानी में रहने के कारण काफी हद तक खराब हो चुका था। चूंकि कौशांबी थाने में गिरधर की गुमशुदगी दर्ज थी और हुलिया थोड़ा बहुत मेल खा रहा था, इसलिए पुलिस ने शिनाख्त (पहचान) के लिए गिरधर के परिजनों को वहां बुलाया।
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पानी में सड़ी-गली लाश को देखना किसी भी परिवार के लिए बेहद दर्दनाक होता है। चेहरे की पहचान करना लगभग असंभव हो जाता है। शोक, तनाव और दबाव के बीच, परिजनों ने उस अज्ञात शव की पहचान अपने बेटे 'गिरधर सिंह बिष्ट' के रूप में कर दी।
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थाने में हंगामा और पुलिस पर आरोप: शव मिलने के बाद परिवार वालों का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने पुलिस और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि जब गिरधर की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी, तो जेल प्रशासन ने बिना परिजनों को सौंपे उसे अकेला क्यों छोड़ दिया?
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गुस्साए परिजन और स्थानीय लोग कौशांबी थाने पहुंच गए और जमकर हंगामा किया। उन्होंने हत्या की आशंका जताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की। माहौल को बिगड़ता देख इंदिरापुरम के एसीपी (ACP) अभिषेक श्रीवास्तव तुरंत मौके पर पहुंचे। उन्होंने आक्रोशित भीड़ और परिजनों को शांत किया और उन्हें आश्वासन दिया कि इस मामले की गहन और निष्पक्ष जांच की जाएगी। पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
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 गिरधर के घर लौटने के बाद आराम कर रहा है। वहीं, पुलिस उससे पूछताछ कर जानने की कोशिश कर रही है कि वह इतने दिनों तक कहां रहा ?

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पोस्टमार्टम, अंतिम संस्कार और तेरहवीं का आयोजन (24 जून)

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पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि मृतक की मौत का कारण 'डूबना' था। कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद, पुलिस ने शव परिजनों को सौंप दिया।
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विधवा और कैंसर पीड़ित मां ने भारी मन से उस शव को अपना बेटा मानकर उसका अंतिम संस्कार कर दिया। परिवार ने पूरे विधि-विधान से सभी रस्में निभाईं। 24 जून को तेरहवीं का कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें रिश्तेदार और मोहल्ले के लोग शामिल हुए। सभी ने गिरधर की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
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25 जून की सुबह: वो दस्तक जिसने सबको चौंका दिया

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तेरहवीं के अगले दिन यानी 25 जून (गुरुवार) की सुबह करीब 5 बजे, कल्पना अपार्टमेंट के फ्लैट के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। दरवाजा खोलने पर सामने जो दृश्य था, उसने परिवार वालों के पैरों तले जमीन खिसका दी। सामने कोई और नहीं, बल्कि गिरधर सिंह बिष्ट खड़ा था।
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मां ने जब अपने बेटे को सामने जीवित खड़ा देखा, तो वह दौड़कर गई और बेटे को गले लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी। एक तरफ बेटे के वापस लौटने की खुशी थी, तो दूसरी तरफ एक गहरा सदमा। मां ने रोते हुए पूछा, "बेटा, कहां थे? हम लोगों ने तो तुम्हारी तेरहवीं भी कर दी।"
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यह खबर पूरे इलाके में आग की तरह फैल गई। जो लोग कल तेरहवीं में शामिल हुए थे, वे आज गिरधर को जिंदा देखने के लिए दौड़े चले आए।
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पुलिस का घर पहुंचना और पूछताछ का दौर

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सूचना मिलते ही कौशांबी पुलिस और मसूरी पुलिस की टीम तुरंत गिरधर के घर पहुंची। उन्होंने गिरधर से पूछताछ करने की कोशिश की कि वह 21 मई (जेल से रिहाई) से लेकर 25 जून की सुबह तक आखिर कहां था? लेकिन, मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण वह कुछ भी स्पष्ट नहीं बता सका।
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थाना प्रभारी का बयान: मसूरी थाना प्रभारी हरेंद्र मलिक ने बताया कि युवक से पूछताछ की जा रही है, लेकिन उसकी मानसिक स्थिति सामान्य नहीं लग रही है। वह कभी खुद को इंटेलिजेंस अधिकारी बताता है, तो कभी किसी वीआईपी का नाम लेकर अपनी पहचान बताने लगता है। उसकी बातों से यह पता लगाना बहुत मुश्किल हो रहा है कि वह पिछले एक महीने से कहां था।
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सबसे बड़ा सवाल: जिसकी तेरहवीं की, वह कौन था?

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गिरधर के जिंदा लौट आने से परिवार में खुशी जरूर है, लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। गिरधर की मां भी अब इसी असमंजस में हैं। उन्होंने कहा, "बेटे के लौटने की खुशी है, लेकिन अब यह सवाल परेशान कर रहा है कि जिसका अंतिम संस्कार किया गया, वह कौन था। हमें भी पहचान को लेकर कुछ संदेह था। अब पुलिस को जांच कर बताना चाहिए कि वह शव किसका था।"
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अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस 'अज्ञात शव' की असली पहचान उजागर करना है। पुलिस को अब आसपास के जिलों में दर्ज गुमशुदगी की उन रिपोर्टों को खंगालना होगा जो 13 जून के आसपास दर्ज की गई थीं। इसके साथ ही कागजी कार्यवाही को भी सुधारना होगा, क्योंकि एक जीवित व्यक्ति को मृत मानकर अंतिम संस्कार किया जा चुका है।
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यह घटना पुलिस की जांच प्रक्रिया, जेल से कैदियों (विशेषकर मानसिक रूप से अस्वस्थ) की रिहाई के प्रोटोकॉल और शवों की शिनाख्त के तरीके पर गंभीर विमर्श की मांग करती है, ताकि भविष्य में इस तरह की बड़ी चूक से बचा जा सके।
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