खबरीलाल डेस्क
गाजियाबाद/मेरठ: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में पुलिस और खुफिया एजेंसियों के हाथ एक ऐसी कामयाबी लगी है, जिसने पूरे देश की सुरक्षा व्यवस्था की नींद उड़ा दी है। दिल्ली से सटे गाजियाबाद के ट्रांस हिंडन इलाके (कौशांबी थाना क्षेत्र) में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के एक बेहद खतरनाक और हाईटेक स्लीपर सेल का पर्दाफाश हुआ है। पुलिस ने इस खौफनाक जासूसी नेटवर्क के 6 गुर्गों को गिरफ्तार किया है, जबकि 14 अन्य संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।READ ALSO:-टोल चोरों पर सरकार की 'डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक': बिना टोल दिए निकले तो आएगा ई-नोटिस, 72 घंटे में नहीं चुकाया तो दोगुना जुर्माना और VAHAN पोर्टल पर लगेगा बैन
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इस पूरे मॉड्यूल का मास्टरमाइंड पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ का रहने वाला सुहेल मलिक और संभल की रहने वाली महक निकली है। ये लोग कोई आम जासूस नहीं थे, बल्कि इन्होंने भारतीय सेना के सबसे संवेदनशील ठिकानों— अंबाला आर्मी बेस, दिल्ली कैंट और सोनीपत रेलवे स्टेशन— के आसपास चोरी-छिपे हाईटेक CCTV कैमरे लगा दिए थे और वहां की पल-पल की लाइव फीड सीधे पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं को भेज रहे थे।
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पूछताछ में जो सबसे खौफनाक खुलासा हुआ है, वह यह है कि ISI इन लाइव फीड्स और रेकी के वीडियो के जरिए भारत के बड़े शहरों में 'दिल्ली धमाके' जैसी किसी बहुत बड़ी आतंकी साजिश को अंजाम देने की फिराक में थी। 'ख़बरीलाल' की इस विस्तृत इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में जानिए कैसे काम कर रहा था यह हाईटेक जासूसी नेटवर्क, कैसे पुलिस ने इन्हें दबोचा और क्या थी इनकी असली साजिश।
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ऑपरेशन का श्रीगणेश - कैसे रडार पर आए ISI के ये मोहरे?

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देश की राजधानी दिल्ली से सटा गाजियाबाद हमेशा से ही खुफिया एजेंसियों के लिए एक संवेदनशील क्षेत्र रहा है। 14 मार्च 2026 को गाजियाबाद की कौशांबी थाना पुलिस को एक इनपुट मिला था कि ट्रांस हिंडन इलाके में कुछ लोग संदिग्ध गतिविधियों में शामिल हैं और उनके तार सीमा पार से जुड़े हो सकते हैं।
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पुलिस ने सर्विलांस और ह्यूमन इंटेलिजेंस (मुहबिरों) का जाल बिछाया। इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस में पुलिस को कुछ ऐसे IP एड्रेस और वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) का पता चला, जिनका डेटा ट्रैफिक लगातार पाकिस्तान के कुछ खास सर्वरों की तरफ जा रहा था। जब इन सिग्नलों को ट्रेस किया गया, तो पुलिस की टीम भोवापुर और कौशांबी के आसपास के इलाकों तक पहुंची।
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एक सघन और गुप्त ऑपरेशन के तहत, पुलिस ने एक साथ कई ठिकानों पर दबिश दी और 6 लोगों को धर दबोचा। पकड़े गए लोगों की पहचान ने सबको चौंका दिया:
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    सुहेल मलिक (निवासी: मेरठ) - मास्टरमाइंड
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    साने करम उर्फ महक (निवासी: संभल) - फाइनेंसर और महिला हैंडलर
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    प्रवीण (निवासी: भोवापुर, गाजियाबाद)
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    राज वाल्मीकि 5. शिव वाल्मीकि
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    रितिक गंगवार (CCTV और तकनीकी विशेषज्ञ)
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इनकी गिरफ्तारी के बाद जब इनके मोबाइल फोन खंगाले गए, तो पुलिस अधिकारियों के भी होश उड़ गए। मोबाइलों में भारतीय सेना के ठिकानों के हाई-डेफिनिशन वीडियो, पाकिस्तानी हैंडलर्स के साथ एन्क्रिप्टेड चैट और विदेशी फंडिग के सबूत मौजूद थे।
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मास्टरमाइंड सुहेल (मेरठ) और लेडी डॉन महक (संभल) की क्राइम कुंडली

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इस पूरे नेटवर्क की सबसे मजबूत कड़ी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो जिले— मेरठ और संभल— निकले।
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मेरठ का सुहेल मलिक: सीमा पार का सीधा संपर्क मेरठ का रहने वाला सुहेल मलिक इस पूरे मॉड्यूल का सरगना था। पुलिस सूत्रों के अनुसार, सुहेल सीधे तौर पर पाकिस्तान में बैठे ISI के हैंडलर्स के संपर्क में था। वह कोई सड़क छाप गुंडा नहीं, बल्कि एक शातिर दिमाग शख्स था जो डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड कॉलिंग ऐप्स का इस्तेमाल करना बखूबी जानता था। पाकिस्तान से जो भी निर्देश (ऑर्डर्स) आते थे, वे सीधे सुहेल को मिलते थे। किस शहर की रेकी करनी है, कहां कैमरा लगाना है और किसे कितना पैसा देना है, यह सब सुहेल ही तय करता था।
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संभल की महक: फाइनेंसर और स्लीपर सेल की 'रानी' इस मॉड्यूल में एक महिला की मौजूदगी ने एजेंसियों को सबसे ज्यादा हैरान किया। संभल की रहने वाली 'साने करम उर्फ महक' इस ग्रुप की को-मास्टरमाइंड थी। महक का मुख्य काम पैसों का लेन-देन (फंडिंग) संभालना था। पाकिस्तानी आका जो भी पैसा डमी खातों (Fake Accounts) या हवाला के जरिए भेजते थे, वह महक के नियंत्रण में आता था। महक ही प्रवीण, रितिक और वाल्मीकि बंधुओं को उनके काम के हिसाब से पैसे बांटती थी। इसके अलावा, एक महिला होने के नाते महक पुलिस की चेकिंग से आसानी से बच निकलती थी और जासूसी के उपकरणों (कैमरे, सिम कार्ड) की डिलीवरी का काम भी करती थी।
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खौफनाक 'ऑपरेंडी' - सैन्य ठिकानों पर कैसे लगाए गए हाईटेक CCTV?

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आम तौर पर जासूस अपने मोबाइल से छिपकर फोटो खींचते हैं, लेकिन इस गिरोह का तरीका (Modus Operandi) बिल्कुल अलग और हाई-टेक था। उन्होंने जासूसी की दुनिया में एक नया 'डिजिटल' तरीका ईजाद किया था।
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1. दिल्ली से हाईटेक कैमरों की खरीद: मास्टरमाइंड सुहेल के निर्देश पर इस गिरोह ने दिल्ली के इलेक्ट्रॉनिक मार्केट (संभवतः गफ्फार या नेहरू प्लेस) से छोटे, पावरफुल और हाई-डेफिनिशन (HD) नाइट-विजन वाले CCTV कैमरे खरीदे। ये वो कैमरे थे जिन्हें इंटरनेट (Wi-Fi या सिम कार्ड) के जरिए दुनिया के किसी भी कोने से एक्सेस किया जा सकता था।
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2. रितिक गंगवार का तकनीकी दिमाग: गिरफ्तार रितिक गंगवार इस गिरोह का 'टेक्निकल एक्सपर्ट' था। उसे कैमरों की कोडिंग, उन्हें हैक करने और नेटवर्क से जोड़ने में महारत हासिल थी। रितिक ने इन कैमरों को इस तरह से कॉन्फ़िगर किया था कि इनकी लाइव फीड किसी भारतीय सर्वर पर सेव होने की बजाय, सीधे पाकिस्तान के सर्वर पर बाउंस हो जाए।
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3. इंस्टॉलेशन (कैमरे लगाना): इन जासूसों ने बेहद चालाकी से अंबाला का सैन्य स्टेशन, दिल्ली कैंट (जहां सेना का भारी जमावड़ा होता है), सोनीपत रेलवे स्टेशन, गाजियाबाद और दिल्ली के प्रमुख बस टर्मिनलों के आसपास रेहड़ी-पटरी वालों या खाली पड़े खंभों पर ये कैमरे इंस्टॉल कर दिए। कैमरे इतनी गुप्त जगहों पर लगाए गए थे कि किसी आम आदमी या गश्ती पुलिस को शक ही नहीं हुआ।
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4. 24x7 लाइव मॉनिटरिंग: कैमरे लगाने के बाद, रितिक और सुहेल ने इन सभी कैमरों का एक्सेस अपने मोबाइल फोन के एक विशेष ऐप में ले लिया। इसके बाद वे सुरक्षित ठिकानों पर बैठकर 24 घंटे इन सैन्य ठिकानों और रेलवे स्टेशनों की लाइव फीड देखते थे। जब भी सेना का कोई बड़ा काफिला (Convoy) गुजरता, या किसी विशेष ट्रेन की मूवमेंट होती, तो वे उस हिस्से का वीडियो रिकॉर्ड करके तुरंत पाकिस्तान फॉरवर्ड कर देते थे।
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5. फर्जी सिम कार्ड का जाल: पुलिस से बचने के लिए इन लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सैकड़ों सिम कार्ड खरीद रखे थे। वे आपस में बात करने या इंटरनेट चलाने के लिए इन्ही सिम कार्ड्स का इस्तेमाल करते थे और काम होते ही सिम तोड़कर फेंक देते थे।
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मौत का 'रेट कार्ड' - एक वीडियो के 3000 से 8000 रुपये

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देश से गद्दारी करने वाले इन जासूसों का जमीर चंद हजार रुपयों में बिक चुका था। पुलिस जांच में एक 'रेट कार्ड' का खुलासा हुआ है।
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पाकिस्तानी हैंडलर्स ने इन जासूसों को टारगेट दे रखा था।
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    किसी सामान्य रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड के वीडियो के लिए: 3,000 रुपये
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    दिल्ली कैंट या अंबाला जैसे सैन्य छावनी के संवेदनशील वीडियो (जहां तोपों, टैंकों या सैनिकों की आवाजाही दिख रही हो) के लिए: 8,000 रुपये तक
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यह सारा पैसा बैंक के उन 'फेक अकाउंट्स' (डमी खातों) में आता था, जिन्हें फर्जी आधार कार्ड और पैन कार्ड की मदद से खोला गया था। पैसे आते ही महक और सुहेल उसे तुरंत निकाल लेते थे और नकद रूप में बाकी सदस्यों को उनका हिस्सा दे देते थे। इस पैसे का इस्तेमाल और ज्यादा हाईटेक कैमरे खरीदने, सफर करने और ऐशो-आराम की जिंदगी जीने में किया जा रहा था।
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दिल्ली धमाके जैसी खौफनाक साजिश और टारगेट पॉइंट्स

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आखिर पाकिस्तान को अंबाला या दिल्ली कैंट के रेलवे स्टेशनों की लाइव फीड क्यों चाहिए थी? जब IB (Intelligence Bureau) और दिल्ली स्पेशल सेल के तेजतर्रार अधिकारियों ने सुहेल को रिमांड पर लेकर सख्ती से पूछताछ की, तो जो राज खुला उसने सुरक्षा एजेंसियों के रोंगटे खड़े कर दिए।
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सूत्रों के मुताबिक, इस रेकी का मकसद सिर्फ जानकारी जुटाना नहीं था। पाकिस्तान के आतंकी संगठन (संभवतः लश्कर या जैश) इन स्लीपर सेल्स की मदद से भारत के बड़े शहरों में 'सीरियल ब्लास्ट' या सेना के काफिलों पर हमले की साजिश रच रहे थे।
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क्यों चुने गए ये स्थान?

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    अंबाला छावनी (Ambala Cantt): यह भारतीय सेना और वायुसेना (Rafale लड़ाकू विमानों का बेस) का एक बेहद महत्वपूर्ण बेस है। यहां से पाकिस्तान सीमा की तरफ सैनिकों की मूवमेंट होती है।
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    दिल्ली कैंट (Delhi Cantt): यह सेना का मुख्यालय क्षेत्र है। यहां से पूरे देश के सैन्य ऑपरेशंस कंट्रोल होते हैं।
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    सोनीपत और गाजियाबाद रेलवे स्टेशन: उत्तर भारत से निकलने वाली हर महत्वपूर्ण ट्रेन (जिसमें सेना की स्पेशल ट्रेनें भी शामिल हैं) इन्हीं रूटों से होकर गुजरती हैं।
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आईएसआई का प्लान था कि इन लाइव फीड्स के जरिए वे भारतीय सेना की रूटीन मूवमेंट, उनकी शिफ्ट चेंजिंग का समय, और सुरक्षा में मौजूद खामियों (Loopholes) की स्टडी करें। इसके बाद, सटीक समय और सटीक जगह पर किसी बड़े आतंकी हमले (जैसे दिल्ली में पहले हो चुके हैं या पठानकोट/पुलवामा की तर्ज पर) को अंजाम दिया जा सके।
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मल्टी-एजेंसी इन्वेस्टिगेशन - UP ATS, NIA, IB और स्पेशल सेल का 'जॉइंट ऑपरेशन'

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मामला देश की आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़ा होने के कारण, गाजियाबाद पुलिस ने तुरंत इस केस को उच्च स्तरीय एजेंसियों के सुपुर्द कर दिया। वर्तमान में इस मामले की जांच एक 'जॉइंट टास्क फोर्स' कर रही है:
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    UP ATS (उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ता): एटीएस मेरठ और संभल में सुहेल और महक के बैकग्राउंड, उनके परिवार और स्थानीय संपर्कों की जांच कर रही है। एटीएस यह पता लगा रही है कि क्या मेरठ में इनके और भी साथी छिपे हैं?
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    दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल: स्पेशल सेल की टीम दिल्ली कैंट और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के आसपास लगाए गए कैमरों को ट्रेस कर रही है और हार्डवेयर की जांच कर रही है।
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    IB (खुफिया ब्यूरो) और NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी): ये केंद्रीय एजेंसियां पाकिस्तान कनेक्शन, पैसों के ट्रेल (फंडिंग रूट) और डार्क वेब चैट्स को डिकोड करने में लगी हैं।
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14 अन्य संदिग्ध हिरासत में: सुहेल और उसके 5 साथियों की निशानदेही पर पुलिस और एटीएस की टीमों ने पुणे (महाराष्ट्र), अंबाला (हरियाणा), पंजाब और चंडीगढ़ में ताबड़तोड़ छापेमारी की है। इस दौरान 14 अन्य संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। ये वो लोग हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सुहेल को सिम कार्ड, बैंक अकाउंट या लॉजिस्टिक सपोर्ट मुहैया करा रहे थे।
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 पुलिस ने 12 मार्च को जैश-ए-संगठन से जुड़े आरोपियों को अरेस्ट किया था।

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आगे क्या? फोरेंसिक जांच और इलेक्ट्रॉनिक सुबूत

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पुलिस ने गिरफ्तार 6 आरोपियों के पास से दर्जनों महंगे स्मार्टफोन, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड, डमी सिम कार्ड और वाई-फाई डोंगल जब्त किए हैं। इन सभी उपकरणों को FSL (Forensic Science Laboratory) भेज दिया गया है।
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साइबर एक्सपर्ट्स अब इन फोन्स से डिलीट किए गए डेटा, व्हाट्सएप कॉल रिकॉर्ड्स, टेलीग्राम चैट्स और सिग्नल ऐप की हिस्ट्री को रिकवर कर रहे हैं। एजेंसियों को उम्मीद है कि फोरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद पाकिस्तान में बैठे उन आकाओं के असली नाम और नंबरों का खुलासा हो सकेगा जो इस पूरे खेल को ऑपरेट कर रहे थे।
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साथ ही, जिन जगहों पर आरोपियों ने कैमरे लगाए थे, उन्हें तुरंत प्रभाव से हटा दिया गया है और सैन्य ठिकानों के आसपास जैमर और एंटी-स्निफर डिवाइस एक्टिवेट कर दिए गए हैं ताकि भविष्य में कोई अन्य स्लीपर सेल ऐसी हिमाकत न कर सके।
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'ख़बरीलाल' का विश्लेषण

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गाजियाबाद की कौशांबी पुलिस द्वारा किया गया यह पर्दाफाश भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की एक बड़ी जीत है। एक छोटी सी चूक या थोड़ी सी देरी से देश को एक बड़ी आतंकी घटना का सामना करना पड़ सकता था।
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यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि आतंकवाद का स्वरूप अब बदल चुका है। अब आतंकी सीमा पार से हथियारों के साथ घुसपैठ करने के साथ-साथ, हमारे ही समाज में मौजूद चंद गद्दारों (जैसे मेरठ का सुहेल) को चंद रुपयों का लालच देकर 'डिजिटल आतंकवाद' फैला रहे हैं। आम नागरिकों को भी अब आंखें खुली रखनी होंगी। यदि आपके आसपास कोई व्यक्ति अचानक से बिना किसी नौकरी के ऐशो-आराम की जिंदगी जीने लगे, या सार्वजनिक/संवेदनशील जगहों पर संदिग्ध उपकरण लगाता दिखे, तो तुरंत पुलिस को सूचना दें।