खबरीलाल डेस्क
भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा (Lifeline) कहा जाता है। हर दिन करोड़ों लोग ट्रेन से सफर करते हैं। जब भी गर्मियों की छुट्टियां शुरू होती हैं, ट्रेनों में यात्रियों का भारी दबाव बढ़ जाता है। इस डिमांड को पूरा करने के लिए रेलवे समर स्पेशल (Summer Special Trains) ट्रेनें तो चलाता है, लेकिन फिर भी यात्रियों की संख्या इतनी ज्यादा होती है कि कंफर्म टिकट मिलना मुश्किल हो जाता है।READ ALSO:-हापुड़ में खूनी खेल: शादी से लौट रहे प्रॉपर्टी डीलर की बीच सड़क पर सरेआम हत्या, परिजनों की मांग- "पहले आरोपियों का एनकाउंटर करो, फिर उठेगा शव"
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मजबूरी में यात्री वेटिंग लिस्ट (Waiting List) का टिकट कटाते हैं। कई बार किस्मत साथ देती है और टिकट कंफर्म हो जाता है, लेकिन कई बार चार्ट (Chart Preparation) बनने के बाद भी टिकट वेटिंग में ही रह जाता है। ऐसे में आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि रेलवे का टिकट अपग्रेडेशन सिस्टम (Ticket Upgradation System) और कंफर्मेशन का फॉर्मूला असल में काम कैसे करता है।
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1. वेटिंग लिस्ट (WL) का चक्रव्यूह: कौन सा टिकट होता है सबसे पहले कंफर्म?

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जब आप IRCTC की वेबसाइट या काउंटर से टिकट बुक करते हैं, तो आपको अलग-अलग तरह की वेटिंग लिस्ट देखने को मिलती है। किस टिकट के कंफर्म होने के चांस ज्यादा हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपको कौन सा वेटिंग कोड मिला है:
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    GNWL (जनरल वेटिंग लिस्ट - General Waiting List): अगर आप किसी ट्रेन के शुरूआती स्टेशन (Origination Station) से या उसके आस-पास के किसी बड़े स्टेशन से यात्रा शुरू कर रहे हैं, तो आपको GNWL टिकट मिलता है। इसमें टिकट कंफर्म होने की संभावना सबसे ज्यादा (Highest Chance) होती है। अगर कोई कंफर्म यात्री अपना टिकट कैंसिल करता है, तो सबसे पहले GNWL वाले को सीट दी जाती है।
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    RLWL (रिमोट लोकेशन वेटिंग लिस्ट - Remote Location): यह टिकट तब मिलता है जब आप ट्रेन के रूट के बीच में आने वाले किसी स्टेशन से टिकट बुक करते हैं। इसके कंफर्म होने के चांस GNWL के मुकाबले कम होते हैं, क्योंकि इस कोटे में सीटें बहुत सीमित होती हैं।
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    PQWL (पूल्ड कोटा वेटिंग लिस्ट - Pooled Quota): यह वेटिंग लिस्ट उन यात्रियों को दी जाती है जो ट्रेन के शुरुआती स्टेशन से किसी बीच के स्टेशन तक या दो मध्यवर्ती (Intermediate) स्टेशनों के बीच सफर करते हैं। इस लिस्ट के कंफर्म होने की संभावना सबसे कम (Very Low Chance) होती है।
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2. क्या है रेलवे का 'ऑटोमैटिक टिकट अपग्रेडेशन' सिस्टम? (Free Auto Upgradation)

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मान लीजिए आपने स्लीपर क्लास (Sleeper Class - SL) का टिकट बुक किया है और आपकी सीट वेटिंग में है। वहीं, उसी ट्रेन के थर्ड एसी (3A) या सेकेंड एसी (2A) में कुछ सीटें खाली रह गई हैं। रेलवे इन खाली सीटों का नुकसान नहीं उठाना चाहता। इसलिए, वह 'ऑटो-अपग्रेडेशन' (Auto-Upgradation) का नियम लागू करता है।
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इस सिस्टम के तहत, रेलवे स्लीपर क्लास के वेटिंग या कंफर्म यात्रियों को मुफ्त में AC क्लास में अपग्रेड कर देता है। इसके लिए आपको एक भी रुपया अतिरिक्त नहीं देना पड़ता। आपकी खाली हुई स्लीपर सीट वेटिंग लिस्ट वाले किसी दूसरे यात्री को दे दी जाती है, जिससे उसका टिकट भी कंफर्म हो जाता है।
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अपग्रेडेशन का इतिहास और विस्तार

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भारतीय रेलवे ने वेटिंग लिस्ट वाले यात्रियों को उच्च श्रेणी (Higher Class) में अपग्रेड करने की यह शानदार स्कीम 26 जनवरी, 2006 को शुरू की थी।
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    शुरुआत में यह सुविधा सिर्फ दो वीआईपी ट्रेनों— मुंबई सेंट्रल-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस और मुंबई सेंट्रल-हजरत निजामुद्दीन अगस्त क्रांति एक्सप्रेस में दी गई थी।
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    इसकी सफलता को देखते हुए 6 फरवरी, 2006 को इसे सभी राजधानी एक्सप्रेस और 30 अन्य प्रमुख ट्रेनों में लागू कर दिया गया।
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    बाद में 1 अप्रैल, 2014 से इस योजना का दायरा बढ़ाकर इसे देश की सभी मेल (Mail) और एक्सप्रेस (Express) ट्रेनों में लागू कर दिया गया।
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3. कैसे उठाएं इस फ्री अपग्रेडेशन का फायदा? (How to Opt)

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यह सुविधा अपने आप सबको नहीं मिलती। इसका फायदा उठाने के लिए आपको टिकट बुक करते समय थोड़ा अलर्ट रहना होगा:
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    जब आप IRCTC की वेबसाइट या ऐप से टिकट बुक कर रहे हों, तो पैसेंजर डिटेल्स भरने के बाद नीचे की तरफ 'Other Preferences' का एक सेक्शन आता है।
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    यहाँ आपको 'Consider for Auto Upgradation' (ऑटो अपग्रेडेशन के लिए विचार करें) के चेकबॉक्स पर टिक (Tick) करना होगा।
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    टिकट अपग्रेडेशन का फैसला ट्रेन का चार्ट तैयार होते समय (चार्टिंग के वक्त) सॉफ्टवेयर द्वारा ऑटोमैटिक तरीके से किया जाता है।
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अपग्रेडेशन का क्रम (Hierarchy of Upgradation):

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रेलवे बोर्ड के नियमों के मुताबिक, अपग्रेडेशन हमेशा नीचे से ऊपर की श्रेणी की तरफ होता है।
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    स्लीपर और एसी कोच के लिए: SL (Sleeper) ➔ 3E (AC 3-Tier Economy) ➔ 3A (AC 3-Tier) ➔ 2A (AC 2-Tier) ➔ 1A (First AC)।
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    सीटिंग (Chair Car) कोच के लिए: 2S (Second Seater) ➔ VS (Vistadome) ➔ CC (AC Chair Car) ➔ EC (Executive Class) ➔ EV ➔ EA।
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(नोट: रेलवे के अनुसार, किसी भी यात्री को अधिकतम दो क्लास ऊपर तक ही अपग्रेड किया जा सकता है। वहीं फर्स्ट एसी (1A) और एग्जीक्यूटिव क्लास में अपग्रेडेशन सिर्फ उनके ठीक नीचे वाली क्लास से ही होता है।)
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4. अपग्रेडेशन के लिए कौन है पात्र? (Eligibility Criteria)

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रेल मंत्रालय की गाइडलाइन्स के मुताबिक, इस सुविधा का लाभ सिर्फ उन यात्रियों को मिलता है जो टिकट का पूरा किराया (Full Fare) चुकाते हैं।
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    वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलर्ट: जो सीनियर सिटीजन (Senior Citizens) या रियायती दर वाले यात्री लोअर बर्थ (Lower Berth) कोटे के तहत टिकट बुक करते हैं, उन्हें अपग्रेडेशन का विकल्प बहुत सोच-समझकर चुनना चाहिए। रेलवे ने स्पष्ट किया है कि अगर आप हायर क्लास में अपग्रेड होते हैं, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आपको वहां भी 'लोअर बर्थ' ही मिलेगी। आपको अपर (Upper) या मिडिल (Middle) बर्थ भी दी जा सकती है।
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5. VIKALP स्कीम: जब एक ट्रेन में न मिले सीट, तो दूसरी में करें सफर

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ऑटो-अपग्रेडेशन के अलावा, रेलवे की एक और अचूक योजना है— 'विकल्प' (VIKALP - Alternate Train Accommodation Scheme)। जब आप किसी ट्रेन में टिकट बुक करते हैं और वह लंबी वेटिंग में चला जाता है, तो IRCTC आपको VIKALP स्कीम चुनने का विकल्प देता है।
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    कैसे काम करता है VIKALP? अगर आप इसे चुनते हैं, तो आप उसी रूट पर चलने वाली अन्य ट्रेनों को सेलेक्ट कर सकते हैं। यदि आपकी मूल ट्रेन में चार्ट बनने तक आपका टिकट कंफर्म नहीं होता है, तो रेलवे आपकी टिकट को आपके द्वारा चुनी गई किसी दूसरी ट्रेन में (जिसमें सीटें खाली हैं) बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के ट्रांसफर कर देगा। इससे आपकी यात्रा रद्द होने से बच जाती है।
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6. टिकट कंफर्म कराने के कुछ स्मार्ट प्रो-टिप्स (Pro Tips for Booking)

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अगर आप चाहते हैं कि आपका टिकट हर हाल में कंफर्म हो, तो इन बातों का ध्यान रखें:
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    जल्दी बुकिंग (120 दिन पहले): रेलवे में यात्रा की तारीख से 120 दिन पहले बुकिंग खुल जाती है। त्योहारी सीजन के लिए हमेशा एडवांस बुकिंग करें।
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    GNWL को प्राथमिकता दें: हमेशा कोशिश करें कि आपका टिकट GNWL कोटे में आए। इसके लिए अगर जरूरत पड़े, तो ट्रेन के ओरिजिन (शुरुआती) स्टेशन से टिकट बुक करें और बोर्डिंग (चढ़ने का स्टेशन) अपना नज़दीकी स्टेशन डाल दें।
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    ई-टिकट और कैंसिलेशन: अगर आपने ऑनलाइन (e-Ticket) वेटिंग टिकट लिया है और चार्ट बनने के बाद भी वह कंफर्म नहीं होता है, तो वह अपने आप कैंसिल हो जाएगा और पैसे आपके बैंक खाते में 3-4 दिन में रिफंड (Refund) आ जाएंगे। आप उस टिकट पर सफर नहीं कर सकते। हालांकि, पीआरएस (PRS) काउंटर से लिया गया वेटिंग टिकट यात्रा के लिए मान्य होता है, जिसके आधार पर आप TTE से संपर्क करके खाली सीट की मांग कर सकते हैं।
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भारतीय रेलवे अपने यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार काम कर रहा है। 'ऑटो-अपग्रेडेशन' और 'विकल्प' जैसी स्कीम्स इस बात का प्रमाण हैं कि रेलवे खाली सीटों का पूरा सदुपयोग करना चाहता है। अगली बार जब भी टिकट बुक करें, तो इन स्मार्ट विकल्पों पर टिक करना बिल्कुल न भूलें, क्या पता अगली यात्रा में आपको स्लीपर के दाम में AC का शानदार सफर मिल जाए!