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\r\n\r\nआतंकवाद की दुनिया तेजी से बदल रही है, और भारत अब 'लोन वुल्फ अटैक' (Lone Wolf Attack) के बढ़ते खतरे के निशाने पर है। महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने हाल ही में पुणे से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर जुबैर हैंगरगेकर को गिरफ्तार किया, जो आतंकी संगठन अलकायदा (Al-Qaeda) से जुड़ा था। जांच में पता चला है कि यह 37 वर्षीय इंजीनियर ऑनलाइन माध्यम से अलकायदा के संपर्क में आया और देश में 'लोन वुल्फ अटैक' की तैयारी में था। यह घटना भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि कैसे आतंकी संगठन अब बिना किसी बड़े नेटवर्क के, इंटरनेट के माध्यम से अकेले व्यक्तियों को हिंसा के लिए प्रेरित कर रहे हैं।READ ALSO:-डिजिटल अरेस्ट स्कैम पर सुप्रीम कोर्ट का 'सख्त' रुख: 'अब हम शांत नहीं बैठेंगे, सख्ती से निपटेंगे'
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क्या होता है 'लोन वुल्फ अटैक'?
\r\n\r\n'लोन वुल्फ अटैक' यानी 'अकेला भेड़िया हमला', ऐसे हमलों को कहते हैं जिन्हें एक व्यक्ति अंजाम देता है।
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- \r\n परिभाषा: हमलावर किसी संगठन का सीधा सदस्य नहीं होता, लेकिन इंटरनेट, सोशल मीडिया, वीडियो या कट्टर समूहों के भाषणों से प्रेरित होकर एक विशेष विचारधारा को अपनाता है।\r\n \r\n
- \r\n कार्यशैली: हमलावर समाज के बीच ही सामान्य जीवन जीता है, लेकिन खामोशी से अपनी तैयारी करता है और अचानक हमला कर देता है। ये हमले उतना ही नुकसान पहुंचाते हैं जितना पहले बड़े आतंकवादी संगठन किया करते थे।\r\n \r\n
- \r\n खतरनाक चेतावनी: 2019 में जारी ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स की रिपोर्ट ने साफ चेतावनी दी थी कि आने वाले सालों में 'लोन वुल्फ अटैक' बढ़ेंगे और ये बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं।\r\n \r\n
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ऑनलाइन कट्टरता और जुबैर हैंगरगेकर
\r\n\r\nपुणे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर जुबैर हैंगरगेकर की गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है कि यह खतरा भारत में भी फैल चुका है।
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- \r\n आतंकी कनेक्शन: जुबैर 2019 में ऑनलाइन माध्यम से अलकायदा के सदस्यों के संपर्क में आया। वह इन आकाओं के कहने पर देश में लोन वुल्फ अटैक की तैयारी में था।\r\n \r\n
- \r\n इंटरनेट की भूमिका: इन हमलावरों को इंटरनेट के डार्कनेट जैसे हिस्सों में ऐसी सामग्री मिलती है, जो उन्हें कट्टरता की ओर धकेलती है। सुरक्षा एजेंसियों के लिए डार्कनेट को ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है।\r\n \r\n
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आतंकी संगठन क्यों दे रहे इस पैटर्न को बढ़ावा?
\r\n\r\nआतंकी संगठन अब इस मॉडल को जानबूझकर बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि यह बेहद प्रभावी, सस्ता और जोखिम रहित है:
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- \r\n कम लागत, बड़ा लक्ष्य: संगठन जानते हैं कि किसी देश में सीधे हमला करने के लिए पैसा, लोग, हथियार और छिपने की जगहों की जरूरत होती है। इंटरनेट के जरिए लोगों के दिमाग को प्रभावित करने से बिना किसी खर्च के उनका लक्ष्य हासिल हो जाता है।\r\n \r\n
- \r\n पहचानना मुश्किल: लोन वुल्फ हमलावर अकेले होते हैं। वे किसी संगठन की कमांड चेन में नहीं होते। बाहरी तौर पर वे बिल्कुल सामान्य दिखते हैं, इसलिए पुलिस के लिए उन्हें पहचानना लगभग असंभव होता है।\r\n \r\n
- \r\n ट्रेनिंग ऑनलाइन: ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स के अनुसार, कई हमलावरों ने बम बनाने से लेकर बंदूक चलाने तक की ट्रेनिंग डार्कनेट या इंटरनेट से ली है, जिससे सीधा संपर्क टूट जाता है।\r\n \r\n
- \r\n वैचारिक प्रेरणा: इस्लामिक स्टेट के प्रवक्ता अबू मोहम्मद अल अदनानी ने 2014 में अपील की थी कि अगर आपके पास हथियार नहीं हैं, तो कार को ही अपना हथियार बनाकर हमला करें।\r\n \r\n
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दुनिया में बढ़ रहे लोन वुल्फ के खतरनाक हमले
\r\n\r\nयह पैटर्न दुनिया भर में देखा जा रहा है:
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- \r\n न्यूजीलैंड (2019): क्राइस्टचर्च में एक चरमपंथी ने धड़ाधड़ गोलियां चलाकर 51 लोगों की हत्या की।\r\n \r\n
- \r\n जर्मनी (क्रिसमस): एक सऊदी डॉक्टर ने बाजार में गाड़ी चढ़ा दी।\r\n \r\n
- \r\n अमेरिका (2016): ऑरलैंडो नाइटक्लब में फायरिंग, 50 की मौत।\r\n \r\n
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इतिहास और प्रोफाइल:
\r\n\r\nलोन वुल्फ शब्द 1990 के दशक में श्वेत नस्लवादी समूहों द्वारा शुरू किया गया था। अमेरिका में हुए 70 प्रतिशत हमले अब अकेले लोगों द्वारा किए जाते हैं। इन हमलावरों में इस्लामिक कट्टरपंथी, श्वेत नस्लवादी और धार्मिक चरमपंथी शामिल होते हैं।
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ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स (2019) ने चेतावनी दी थी कि यह पैटर्न बहुत खतरनाक साबित होगा।
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- \r\n बढ़ते मामले: अमेरिका के लॉस एंजिलिस में भीड़ पर तेज रफ्तार कार चढ़ाना, कनाडा के वैंकूवर में इसी तरह की घटना, और 2019 में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में एक चरमपंथी द्वारा 51 लोगों की हत्या, इसके प्रमुख उदाहरण हैं।\r\n \r\n
- \r\n शुरुआत: 1990 के दशक में अमेरिका और यूरोप के श्वेत नस्लवादी समूहों ने अपने समर्थकों को अकेले हमला करने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद यह तरीका इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों ने भी अपनाया।\r\n \r\n
पुणे की गिरफ्तारी के बाद भारत को अब न सिर्फ पारंपरिक सीमा पार आतंकवाद से, बल्कि इंटरनेट के माध्यम से फैल रहे इस साइबर-प्रेरित आतंकवाद से भी निपटने के लिए अपनी रणनीति को अपग्रेड करने की जरूरत है।
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