खबरीलाल डेस्क
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, चाय के साथ दो-चार बिस्किट खाना हो या शाम की हल्की भूख मिटाने के लिए चिप्स का पैकेट खोलना, ये आदतें हमारी दिनचर्या का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं। टीवी देखते हुए या ऑफिस में काम करते हुए हम इन पैकेज्ड फूड्स को बस एक हानिरहित 'स्नैक' (Snack) मानकर खा लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस चमकदार पैकेट के अंदर कितना नमक (Sodium), कितनी चीनी (Added Sugar) और कितना सैचुरेटेड फैट (Saturated Fat) छिपा है?READ ALSO:-उत्तराखंड के चमोली में बड़ा टनल हादसा: निर्माणाधीन सुरंग में घुसा मलबा और पानी, 20 से ज्यादा मजदूर फंसे, 10 का रेस्क्यू
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इसी गंभीर विषय पर गुरुवार को देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने कड़ा रुख अपनाते हुए खाद्य नियामक संस्था FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) को कड़ी फटकार लगाई है। यह मामला सिर्फ एक नया लेबल लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों नागरिकों के स्वास्थ्य और उन्हें मिलने वाली पारदर्शी जानकारी के अधिकार से जुड़ा है।
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सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी का मुख्य कारण क्या है?

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सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड्स पर 'फ्रंट-ऑफ-पैक' (Front-of-Pack) चेतावनी लेबल लागू करने में हो रही अत्यधिक देरी पर गहरी चिंता और नाराजगी व्यक्त की है।
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अदालत का स्पष्ट मानना है कि:
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    जानकारी का अधिकार: उपभोक्ताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वे जो पैकेटबंद खाना खा रहे हैं, वह उनके शरीर के लिए कितना सुरक्षित या हानिकारक है।
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    FSSAI का ढुलमुल रवैया: FSSAI का फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल पर अंतिम फैसला अब तक लटका हुआ है।
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    कोर्ट का अल्टीमेटम: सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा है कि यदि सरकार और नियामक एजेंसियां जल्द ही कोई अंतिम और ठोस फैसला नहीं लेती हैं, तो अदालत जनहित में खुद कड़े निर्देश जारी करने के लिए बाध्य होगी।
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अदालत की यह चिंता मुख्य रूप से उन पैकेज्ड फूड उत्पादों को लेकर है, जिनमें नमक, चीनी और हानिकारक सैचुरेटेड फैट की मात्रा अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों से कहीं अधिक पाई जाती है।
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आखिर 'फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल' (FOPL) होता क्या है?

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वर्तमान परिदृश्य में, भारत में बिकने वाले अधिकांश पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स (जैसे नमकीन, बिस्किट, नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक्स) पर पोषण (Nutrition) से जुड़ी जानकारी पैकेट के पीछे (Back of the Pack) या साइड में बहुत ही छोटे अक्षरों और जटिल प्रतिशत में दी जाती है। एक आम उपभोक्ता के लिए उस बारीक न्यूट्रिशन चार्ट को पढ़ना और यह डिकोड करना लगभग असंभव होता है कि उत्पाद में चीनी या फैट सुरक्षित सीमा में है या नहीं।
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फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल (FOPL) के फायदे:

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    तत्काल पहचान: इसका मुख्य मकसद पोषण संबंधी जानकारी को पैकेट के ठीक सामने (Front) बड़े, स्पष्ट और आसान तरीके से दिखाना है।
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    खरीदारी में आसानी: खरीदारी के समय ग्राहक महज कुछ सेकंड में यह समझ सकेगा कि उत्पाद में कौन से पोषक तत्व (Nutrients) अत्यधिक मात्रा में हैं।
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    लाल रंग की चेतावनी (Red Warning): स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि जिन उत्पादों में हानिकारक तत्व ज्यादा हों, उन पर स्पष्ट लाल रंग की चेतावनी होनी चाहिए।
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FSSAI का 'INR मॉडल' और उससे जुड़ा विवाद

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सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान, FSSAI ने अपने प्रस्तावित Indian Nutrition Rating (INR) मॉडल का जिक्र किया।
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    इस मॉडल में किसी भी पैकेज्ड फूड की पोषण गुणवत्ता बताने के लिए 0.5 से 5 स्टार (Star Rating) देने का प्रस्ताव है।
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    इस रेटिंग सिस्टम में ऊर्जा, चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट (नकारात्मक तत्व) के साथ-साथ प्रोटीन, फाइबर और फलों/सब्जियों के अंश (सकारात्मक तत्व) को मिलाकर एक ओवरऑल रेटिंग दी जाती है।
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    सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की आपत्ति: विशेषज्ञों का तर्क है कि स्टार रेटिंग भ्रामक हो सकती है। कंपनियां अपने अनहेल्दी जंक फूड में थोड़ा सा फाइबर या विटामिन मिलाकर अच्छी रेटिंग हासिल कर सकती हैं, जिससे मूल हानिकारक तत्वों (अत्यधिक चीनी या नमक) पर पर्दा डल जाएगा। FSSAI चेतावनी शब्दों के बजाय पोषण की टेबल सामने रखने की बात कर रहा है, जो फिर से आम लोगों की समझ से परे हो सकती है।
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वैज्ञानिक अध्ययन: आखिर पैकेटबंद खाना शरीर को कितना नुकसान पहुंचाता है?

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क्या हर चिप्स या बिस्किट का पैकेट जहर है? नहीं। किसी भी खाद्य पदार्थ का असर उसकी पूरी पोषण संरचना, खाई जाने वाली मात्रा और व्यक्ति की समग्र जीवनशैली (Overall Diet) पर निर्भर करता है। लेकिन समस्या यह है कि आज बाजार में मौजूद ज्यादातर स्नैक्स अल्ट्रा-प्रोसेस्ड (Ultra-Processed) की श्रेणी में आते हैं।
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1. अमेरिकी कोहोर्ट अध्ययन (21 साल लंबी रिसर्च)

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एक बहुत ही बड़े और प्रामाणिक अमेरिकी अध्ययन में 13,172 ऐसे वयस्कों को शामिल किया गया, जिन्हें शोध की शुरुआत में डायबिटीज (मधुमेह) की बीमारी नहीं थी।
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    फॉलो-अप अवधि: औसतन 21 वर्षों तक इन लोगों के खान-पान का गहराई से अध्ययन किया गया।
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    अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) का प्रभाव: अध्ययन के अंत में पाया गया कि जो लोग ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खा रहे थे, उनमें डायबिटीज का खतरा काफी अधिक था।
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    चौंकाने वाला आंकड़ा: यदि कोई व्यक्ति हर दिन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की महज एक अतिरिक्त सर्विंग (One extra serving) खाता है, तो उसके टाइप-2 डायबिटीज होने का जोखिम 2% बढ़ जाता है।
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    इसमें विशेष रूप से मीठे पेय पदार्थ (Sweetened Beverages), अल्ट्रा-प्रोसेस्ड मीट और मीठे स्नैक्स को सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा माना गया।
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2. भारत में डाइट की खतरनाक स्थिति: ICMR-INDIAB सर्वे

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विदेशों ही नहीं, भारत में भी खान-पान की आदतें तेजी से बिगड़ रही हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा किए गए ICMR-INDIAB सर्वे पर आधारित एक विस्तृत स्टडी में 18,090 भारतीय वयस्कों के आहार और मेटाबॉलिक जोखिम (Metabolic Risk) का विश्लेषण किया गया।
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भारतीय डाइट की प्रमुख कमियां (स्टडी के अनुसार):

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आहार घटक (Diet Component)
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भारतीय डाइट में स्थिति
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स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव
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कार्बोहाइड्रेट (Carbs)
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अत्यधिक (कम गुणवत्ता वाला)
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टाइप-2 डायबिटीज, प्री-डायबिटीज और तेजी से बढ़ता मोटापा।
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सैचुरेटेड फैट (Fats)
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सुझाई गई लिमिट (Limit) से ऊपर
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हृदय रोग, कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना और ब्लड प्रेशर की समस्या।
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प्रोटीन (Protein)
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बहुत कम
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कमजोर मांसपेशियां, सुस्त मेटाबॉलिज्म और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी।
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शोधकर्ताओं ने स्पष्ट रूप से पाया कि भारतीयों की रोजमर्रा की डाइट में रिफाइंड अनाज, सफेद चावल और एडेड शुगर (कम गुणवत्ता वाले कार्बोहाइड्रेट) की मात्रा बहुत अधिक हो गई है। कई राज्यों में तो लोगों द्वारा खाए जाने वाले सैचुरेटेड फैट का स्तर सुरक्षित सीमाओं को पार कर चुका है।
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इस अध्ययन का सीधा निष्कर्ष यह था कि भारतीयों को अपने आहार में कुल कार्बोहाइड्रेट और हानिकारक फैट को कम करना होगा। साथ ही, पौधों से मिलने वाले प्रोटीन (Plant-based protein) और उच्च गुणवत्ता वाले पोषक तत्वों को बढ़ाना होगा, तभी देश को मेटाबॉलिक बीमारियों की महामारी से बचाया जा सकता है।
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क्या सिर्फ एक लेबल बदल देगा लोगों की खाने की आदत?

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यह एक बहुत ही वाजिब सवाल है कि क्या पैकेट के सामने एक बड़ा सा लाल वॉर्निंग लेबल छप जाने से लोग तुरंत अपना पसंदीदा चिप्स या बिस्किट खाना छोड़ देंगे?
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शायद तुरंत नहीं। जो व्यक्ति जंक फूड खाने का आदी है, वह उसे खाएगा। लेकिन एक स्पष्ट वॉर्निंग लेबल सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से कई बड़े बदलाव ला सकता है:
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    तुलनात्मक निर्णय (Smart Choice): अगर किसी सुपरमार्केट में एक उपभोक्ता के सामने दो तरह के स्नैक्स रखे हैं, तो साफ जानकारी उसे तुलना करने में मदद करेगी। यदि एक पैकेट पर 'अत्यधिक नमक' की लाल चेतावनी है और दूसरे पर नहीं, तो एक जागरूक ग्राहक निश्चित रूप से दूसरा (स्वस्थ) विकल्प चुनेगा।
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    फूड कंपनियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव: जब कंपनियों को पता चलेगा कि उनके उत्पाद के हानिकारक तत्व पैकेट के सामने बड़े-बड़े अक्षरों में छपेंगे, तो वे बदनामी और बिक्री घटने के डर से अपने उत्पादों को सुधारने (Reformulation) के लिए मजबूर होंगी। वे खुद ही उत्पाद में चीनी, नमक और ट्रांस-फैट की मात्रा कम करने लगेंगी।
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    बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा: माता-पिता बच्चों के लिए खरीदारी करते समय इन लेबल्स को देखकर आसानी से तय कर पाएंगे कि कौन सा प्रोडक्ट बच्चों के विकास के लिए सही है और कौन सा धीमा जहर।
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सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख इस बात का साफ संकेत है कि जन-स्वास्थ्य (Public Health) को अब कॉर्पोरेट मुनाफे से ऊपर रखने का समय आ गया है। FSSAI और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच 'न्यूट्रिशन टेबल बनाम वॉर्निंग लेबल' की बहस भले ही जारी हो, लेकिन एक बात तय है कि भारत को पारदर्शी खाद्य लेबलिंग नीतियों की तत्काल आवश्यकता है। जब तक यह नया नियम लागू नहीं होता, तब तक एक सतर्क उपभोक्ता के रूप में हमें खुद पैकेट के पीछे दी गई न्यूट्रिशन जानकारी को पढ़ने और समझने की आदत डालनी चाहिए। आपकी सेहत, अंततः आपके ही चुनाव पर निर्भर करती है।