खबरीलाल डेस्क
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से एक बड़ी और महत्वपूर्ण कानूनी खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट लिव इन रिलेशनशिप (Allahabad High Court Live in Relationship) के मामले में एक बेहद ऐतिहासिक और स्पष्ट फैसला सुनाया है, जिसने समाज में कानून और नैतिकता के बीच चल रही पुरानी बहस को एक नई दिशा दी है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी अन्य वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो यह कानून की नजर में कोई 'अपराध' (Crime) नहीं है।READ ALSO:-1 अप्रैल से आम आदमी की जेब पर कैंची: पेनकिलर-एंटीबायोटिक समेत 900 जरूरी दवाएं होंगी महंगी, क्या ईरान युद्ध है इसका कारण?
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सामाजिक नैतिकता (Social Morality) कभी भी भारत के नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने के कोर्ट के कर्तव्य पर हावी नहीं हो सकती। खबरीलाल (Khabreelal) की इस विस्तृत कानूनी रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर यह पूरा मामला क्या है, शाहजहांपुर (Shahjahanpur) के इस कपल की याचिका में क्या कहा गया था, और पुलिस-प्रशासन के लिए कोर्ट ने क्या सख्त निर्देश जारी किए हैं।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n

इलाहाबाद हाई कोर्ट लिव इन रिलेशनशिप: क्या है शाहजहांपुर का यह पूरा मामला?

\r\n\r\n
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले से जुड़ा हुआ है। जानकारी के अनुसार, शाहजहांपुर निवासी अनामिका और नेत्रपाल नाम का एक कपल एक-दूसरे के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) में रह रहा है। नेत्रपाल पहले से ही एक शादीशुदा व्यक्ति है। जब अनामिका के परिवार वालों को इस रिश्ते के बारे में पता चला, तो उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
याचिकाकर्ताओं (अनामिका और नेत्रपाल) ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई। याचिका में आरोप लगाया गया था कि अनामिका के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य उनके इस रिश्ते के सख्त खिलाफ हैं। परिवार वालों की तरफ से उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं और कपल को 'ऑनर किलिंग' (Honor Killing) का गहरा डर सता रहा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
बचाव पक्ष यानी महिला के परिवार के वकील ने अदालत में दलील दी कि चूंकि नेत्रपाल पहले से ही कानूनी रूप से शादीशुदा है, इसलिए किसी दूसरी महिला के साथ 'पति-पत्नी' की तरह रहना उसके लिए एक आपराधिक कृत्य है। परिवार का तर्क था कि समाज इस तरह के रिश्तों को मान्यता नहीं देता है और यह पूरी तरह से अनैतिक है। लेकिन, कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

कानून और सामाजिक नैतिकता के बीच की बहस (Law vs. Morality)

\r\n\r\n
इलाहाबाद हाई कोर्ट लिव इन रिलेशनशिप के इस मामले में सुनवाई करते हुए एक बहुत ही गंभीर और वैचारिक टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'कानून' और 'सामाजिक नैतिकता' दो अलग-अलग चीजें हैं और कानून को हमेशा सामाजिक मान्यताओं या रूढ़िवादी नैतिकता से अलग रखा जाना चाहिए।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

अदालत ने कहा:

\r\n\r\n
\r\n
"ऐसा कोई भी कानून या अपराध नहीं है जिसके तहत कोई शादीशुदा व्यक्ति, किसी अन्य वयस्क के साथ पूर्ण आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा हो, तो उसे किसी भी तरह के आपराधिक कृत्य के लिए अभियोजित (Prosecute) किया जा सके।"
\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
हाई कोर्ट के इस कथन का सीधा अर्थ यह है कि समाज भले ही किसी रिश्ते को अनैतिक (Immoral) मानता हो, लेकिन अगर वह रिश्ता देश के दंड विधान (Penal Code) के तहत कोई अपराध गठित नहीं करता है, तो कोर्ट उस रिश्ते में रहने वाले नागरिकों के मूल अधिकारों (Fundamental Rights) की रक्षा करने से पीछे नहीं हटेगा। नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) की रक्षा करने के लिए कोर्ट की कार्रवाई को 'सामाजिक राय' या 'नैतिकता' निर्देशित नहीं कर सकती।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

कपल ने मांगी थी सुरक्षा: पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल 

\r\n\r\n
इस मामले में केवल कानूनी बहस ही नहीं थी, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए। याचिकाकर्ता अनामिका ने कोर्ट को बताया कि उसने अपनी और अपने पार्टनर की जान को खतरे को देखते हुए शाहजहांपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP Shahjahanpur) को पहले ही एक लिखित एप्लीकेशन (Application) दी थी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस एप्लीकेशन में अनामिका ने स्पष्ट रूप से लिखा था कि वह एक बालिग (Adult) है, अपनी मर्जी और पूरी समझदारी के साथ उस आदमी (नेत्रपाल) के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है, और उसे अपने ही परिवार से जान का खतरा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
लेकिन, कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि एसएसपी शाहजहांपुर ने इस गंभीर शिकायत पर कोई त्वरित या ठोस कार्रवाई नहीं की। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहां आए दिन 'ऑनर किलिंग' के मामले सामने आते रहते हैं, वहां पुलिस की यह उदासीनता किसी बड़ी अनहोनी का कारण बन सकती थी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

सुप्रीम कोर्ट के 'शक्ति वाहिनी' फैसले का कड़ा हवाला

\r\n\r\n
अपनी बात को वजन देने और पुलिस को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के एक बेहद प्रसिद्ध और ऐतिहासिक फैसले का संदर्भ दिया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
कोर्ट ने 'शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ और अन्य (2018) 7 SSC 192' मामले का हवाला देते हुए कहा कि एक साथ रहने वाले दो वयस्कों (Adults) की जान और माल की सुरक्षा करना राज्य और विशेषकर पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य है। शक्ति वाहिनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने खाप पंचायतों और ऑनर किलिंग पर सख्त रोक लगाते हुए स्पष्ट किया था कि जब दो वयस्क अपनी मर्जी से साथ रहने का फैसला करते हैं, तो कोई भी तीसरा व्यक्ति (यहां तक कि उनके माता-पिता भी) उनके खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल नहीं कर सकता।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
हाई कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक (SP/SSP) पर विशेष संवैधानिक और वैधानिक दायित्व है कि वे ऐसे कपल्स को हर हाल में सुरक्षा मुहैया कराएं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

कपल की गिरफ्तारी पर रोक और बीएनएस (BNS 2023) की धारा 87

\r\n\r\n
जब कोई लड़की अपनी मर्जी से घर छोड़कर जाती है, तो अक्सर परिवार वाले लड़के के खिलाफ अपहरण (Kidnapping) का झूठा मुकदमा दर्ज करा देते हैं। इस मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ था।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
याचिकाकर्ताओं के खिलाफ शाहजहांपुर जिले के जैतीपुर थाने (Jaitipur Police Station) में केस क्राइम नंबर 4/2026 के तहत एक एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थी। यह मुकदमा नए आपराधिक कानून, 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS 2023) की धारा 87 के तहत दर्ज किया गया था, जो अपहरण से संबंधित है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
हाई कोर्ट ने याचिका के साथ लगे दोनों याचिकाकर्ताओं के संयुक्त हलफनामे (Joint Affidavit) का संज्ञान लिया, जिसमें लड़की ने खुद को बालिग और अपनी मर्जी से साथ रहने की बात कबूली थी। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) यह अपहरण का मामला नहीं बनता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इसके बाद, इलाहाबाद हाई कोर्ट लिव इन रिलेशनशिप मामले में राहत देते हुए राज्य सरकार को 8 अप्रैल के लिए नोटिस जारी किया। साथ ही, हाई कोर्ट ने अपने अगले आदेशों तक याचिकाकर्ताओं (अनामिका और नेत्रपाल) की गिरफ्तारी पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी है। महिला के परिवार द्वारा दर्ज कराई गई इस एफआईआर के आधार पर अब पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकती।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

परिवार को सख्त चेतावनी: "संपर्क करने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश न करें"

\r\n\r\n
अदालत ने केवल गिरफ्तारी पर रोक लगाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं की, बल्कि महिला के परिवार वालों को एक बहुत ही सख्त और स्पष्ट चेतावनी भी जारी की।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
हाई कोर्ट ने महिला (अनामिका) के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे कपल को किसी भी तरीके से परेशान न करें। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि परिवार का कोई भी सदस्य न तो इस कपल से संपर्क करने की कोशिश करेगा और न ही उनके घर या उनके रहने के स्थान पर जबरन घुसने का प्रयास करेगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
न्यायाधीश ने चेतावनी दी है कि यदि परिवार की ओर से किसी भी प्रकार की धमकी दी जाती है या कपल को शारीरिक/मानसिक रूप से कोई नुकसान पहुंचाया जाता है, तो अदालत इसे न्याय की अवमानना मानेगी और दोषियों के खिलाफ अत्यंत सख्त दंडात्मक कार्रवाई (Strict Action) की जाएगी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक की तय की गई व्यक्तिगत जवाबदेही

\r\n\r\n
भारत के न्यायिक इतिहास में कई बार ऐसा देखा गया है कि कोर्ट के आदेश के बावजूद जमीनी स्तर पर कपल्स को सुरक्षा नहीं मिल पाती। इस खामी को दूर करने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
कोर्ट ने अपने आदेश में बिल्कुल साफ कर दिया है कि याचिकाकर्ता कपल (अनामिका और नेत्रपाल) की सुरक्षा के लिए शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP Shahjahanpur) व्यक्तिगत रूप से (Personally) जिम्मेदार होंगे।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इसका सीधा मतलब यह है कि अदालत ने जिले के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी की जवाबदेही तय कर दी है। कोर्ट ने कहा कि यदि इस कपल की सुरक्षा में रत्ती भर भी लापरवाही (Negligence) हुई या उनके साथ कोई अप्रिय घटना घटी, तो इसके लिए किसी जूनियर अधिकारी को नहीं, बल्कि सीधे तौर पर पुलिस अधीक्षक को जिम्मेदार ठहराया जाएगा और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यह आदेश पुलिस महकमे के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वे न्यायालय के आदेशों को हल्के में न लें।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

शादीशुदा व्यक्ति का लिव-इन में रहना: क्या कहता है कानून? (Legal Analysis)

\r\n\r\n
इलाहाबाद हाई कोर्ट लिव इन रिलेशनशिप पर दिया गया यह फैसला समाज के एक बड़े वर्ग को चौंका सकता है, क्योंकि भारत में शादीशुदा होते हुए किसी अन्य के साथ रहने को नैतिक रूप से गलत माना जाता है। लेकिन कानूनी स्थिति इससे भिन्न है। आइए इसे गहराई से समझते हैं:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
1. व्यभिचार (Adultery) अब अपराध नहीं: साल 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले (जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ) में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके तहत 'एडल्टरी' या व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। इसका अर्थ है कि यदि कोई विवाहित व्यक्ति (चाहे वह पुरुष हो या महिला) किसी अन्य वयस्क के साथ सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है या साथ रहता है, तो उसे इसके लिए जेल नहीं भेजा जा सकता।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
2. तलाक का आधार (Ground for Divorce): हालांकि, शादीशुदा होते हुए लिव-इन में रहना कोई 'आपराधिक कृत्य' (Criminal Offence) नहीं है, लेकिन यह हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) और अन्य व्यक्तिगत कानूनों के तहत 'तलाक' (Divorce) का एक ठोस आधार जरूर है। नेत्रपाल की पहली पत्नी इस लिव-इन रिलेशनशिप के आधार पर कोर्ट से तलाक की मांग कर सकती है और भरण-पोषण (Alimony) का दावा कर सकती है, लेकिन वह नेत्रपाल या अनामिका को जेल नहीं भिजवा सकती।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
3. लिव-इन रिलेशनशिप और घरेलू हिंसा अधिनियम: भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को अब कानूनी मान्यता प्राप्त है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (Domestic Violence Act) के तहत "घरेलू संबंध" (Domestic Relationship) की परिभाषा में विवाह की प्रकृति वाले रिश्तों (Relationships in the nature of marriage) को भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि लिव-इन में रहने वाली महिला भी घरेलू हिंसा के खिलाफ कानूनी संरक्षण पाने की हकदार है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

समाज पर इस फैसले का प्रभाव (Impact on Society)

\r\n\r\n
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला केवल एक कपल की सुरक्षा तक सीमित नहीं है; इसका पूरे समाज और भारतीय न्याय प्रणाली पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जीत: यह फैसला भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) की जीत है। यह स्थापित करता है कि दो बालिग व्यक्ति अपनी जिंदगी कैसे जीना चाहते हैं, यह उनका निजी फैसला है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    झूठे मुकदमों पर लगाम: अक्सर माता-पिता अपनी बालिग बेटियों के मर्जी से चले जाने पर लड़कों के खिलाफ अपहरण और बलात्कार के झूठे मुकदमे (जैसे BNS धारा 87) दर्ज करा देते हैं। इस फैसले के बाद, पुलिस और निचली अदालतों को ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करने और गिरफ्तारी करने से पहले संयुक्त हलफनामे और लड़की की मर्जी की बारीकी से जांच करनी होगी।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    ऑनर किलिंग के खिलाफ कड़ा संदेश: यह आदेश खाप पंचायतों और रूढ़िवादी परिवारों के लिए एक सख्त संदेश है कि वे 'झूठी शान' (Honor) के नाम पर कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    सामाजिक बनाम कानूनी नैतिकता: यह फैसला इस बात की स्पष्ट रेखा खींचता है कि अदालतें धार्मिक या सामाजिक संहिताओं से नहीं, बल्कि भारत के संविधान (Constitution of India) से चलती हैं।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट लिव इन रिलेशनशिप मामले में दिया गया यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका के प्रगतिशील और अधिकार-उन्मुख (Rights-oriented) दृष्टिकोण का एक बेहतरीन उदाहरण है। शाहजहांपुर के अनामिका और नेत्रपाल के मामले में हाई कोर्ट ने यह स्थापित कर दिया है कि एक शादीशुदा पुरुष का किसी अन्य बालिग महिला के साथ सहमति से रहना सामाजिक नजरिए से भले ही अनैतिक हो, लेकिन यह कोई कानूनी अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के 'शक्ति वाहिनी' फैसले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने पुलिस प्रशासन की जवाबदेही तय की है और स्पष्ट किया है कि नागरिकों की रक्षा करना पुलिस का सर्वोपरि कर्तव्य है। यह फैसला उन सभी बालिग कपल्स के लिए एक बड़ी ढाल बनकर उभरा है, जो अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनते हैं और जिन्हें 'ऑनर किलिंग' या झूठे मुकदमों का खौफ सताता है। खबरीलाल इस तरह के कानूनी पहलुओं और कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों से आपको लगातार अवगत कराता रहेगा।