खबरीलाल डेस्क
खबरीलाल टेक डेस्क | नई दिल्ली: अगर आप भविष्य में कोई नया स्मार्टफोन खरीदने जा रहे हैं, तो आपको उसमें भारत सरकार का 'आधार ऐप' (mAadhaar App) पहले से डाउनलोड या इंस्टॉल (Pre-installed) नहीं मिलेगा। भारत सरकार ने अपनी उस महत्वाकांक्षी योजना को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिसके तहत देश में बिकने वाले सभी स्मार्टफोन्स में आधार ऐप को इन-बिल्ट देना अनिवार्य करने की तैयारी चल रही थी।READ ALSO:-बिजनौर: सदर तहसील में सम्पूर्ण समाधान दिवस पर उमड़ी भीड़, DM और SP ने खुद सुनीं जनसमस्याएं, अधिकारियों को दिए 'ऑन-द-स्पॉट' निर्देश
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दिग्गज टेक कंपनियों, विशेषकर एपल (Apple) और सैमसंग (Samsung) द्वारा जताए गए कड़े विरोध और सुरक्षा चिंताओं के बाद सरकार ने यह कदम पीछे खींचा है। रॉयटर्स (Reuters) की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने शुक्रवार को इस बात की आधिकारिक पुष्टि कर दी है कि आधार ऐप को प्री-इंस्टॉल करने की अनिवार्यता का प्रस्ताव अब लागू नहीं किया जाएगा। आइए, खबरीलाल (Khabreelal) की इस रिपोर्ट में समझते हैं कि सरकार का मूल प्रस्ताव क्या था और दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों ने इसका विरोध क्यों किया।
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क्या था आधार ऐप का प्री-इंस्टॉल प्रस्ताव?

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डिजिटल इंडिया (Digital India) को बढ़ावा देने और नागरिकों को सरकारी सुविधाओं तक सीधी पहुंच देने के उद्देश्य से सरकार ने एक प्रस्ताव तैयार किया था। इस प्रस्ताव के तहत यह योजना थी कि भारत की सीमा के भीतर मैन्युफैक्चर होने वाले या बिकने वाले हर नए स्मार्टफोन में 'आधार ऐप' पहले से ही इंस्टॉल होकर आए।
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सरकार का तर्क था कि चूंकि आधार (Aadhaar) एक 12 अंकों की बेहद महत्वपूर्ण बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली है, जो फिंगरप्रिंट और आईरिस स्कैन से जुड़ी होती है और बैंकिंग से लेकर टेलीकॉम सेवाओं तक हर जगह इस्तेमाल होती है, इसलिए ऐप का फोन में होना नागरिकों के लिए सुविधाजनक होगा। उन्हें इसे अलग से प्ले स्टोर या ऐप स्टोर से खोजना और डाउनलोड नहीं करना पड़ेगा।
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Apple और Samsung ने क्यों किया कड़ा विरोध?

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जैसे ही सरकार का यह प्रस्ताव उद्योग जगत के सामने आया, स्मार्टफोन इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया। दुनिया की शीर्ष स्मार्टफोन निर्माता कंपनियों, विशेष रूप से एपल (Apple) और सैमसंग (Samsung) ने इसका पुरजोर विरोध किया। कंपनियों ने सरकार के सामने कई तकनीकी और व्यावसायिक चिंताएं रखीं:
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    सुरक्षा और ग्लोबल स्टैंडर्ड्स का जोखिम: टेक कंपनियों का सबसे बड़ा तर्क यह था कि किसी भी थर्ड-पार्टी या सरकारी ऐप को फैक्ट्री लेवल पर प्री-इंस्टॉल करने से डिवाइस के ग्लोबल सिक्योरिटी स्टैंडर्ड्स (Global Security Standards) पर असर पड़ सकता है। इससे हैकिंग या डेटा ब्रीच का खतरा बढ़ सकता है, जिससे ब्रांड की साख खराब होगी।
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    निर्माण प्रक्रिया (Manufacturing Process) में जटिलता: कंपनियों ने बताया कि वे पूरी दुनिया के लिए एक ही स्टैंडर्ड असेंबली लाइन पर फोन बनाती हैं। यदि केवल भारतीय बाजार के लिए एक विशेष ऐप को प्री-इंस्टॉल करना अनिवार्य कर दिया गया, तो उन्हें भारत के लिए एक अलग 'मैन्युफैक्चरिंग लाइन' तैयार करनी पड़ेगी, जो तकनीकी रूप से बेहद जटिल प्रक्रिया है।
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    लागत में भारी इजाफा: अलग मैन्युफैक्चरिंग लाइन और सॉफ्टवेयर टेस्टिंग के कारण उत्पादन की लागत (Production Cost) काफी बढ़ जाती, जिसका सीधा असर फोन की कीमतों पर पड़ता और अंततः इसका नुकसान भारतीय उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ता।
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आईटी मंत्रालय (MeitY) का हस्तक्षेप और बदला फैसला

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उद्योग जगत से मिले इस कड़े और तार्किक फीडबैक के बाद, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने इस प्रस्ताव पर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के साथ विस्तृत चर्चा की।
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रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मंत्रालय ने इस पूरे विचार की तकनीकी और व्यावसायिक समीक्षा की। समीक्षा के बाद मंत्रालय ने यह तय किया कि इस समय स्मार्टफोन में आधार ऐप को 'अनिवार्य' रूप से प्री-इंस्टॉल करने का नियम थोपना उद्योग और बाजार के हित में नहीं होगा। इसके बाद यूआईडीएआई (UIDAI) ने आधिकारिक रूप से साफ कर दिया कि यह योजना रद्द कर दी गई है।
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पहले भी हो चुके हैं ऐसे नाकाम प्रयास

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टेक जगत के जानकारों के अनुसार, यह कोई पहला मौका नहीं है जब सरकार ने किसी सरकारी ऐप को स्मार्टफोन्स में अनिवार्य रूप से इंस्टॉल करवाने की कोशिश की हो। रिपोर्ट्स बताती हैं कि पिछले दो सालों में यह छठी बार था जब इस तरह का कोई प्रस्ताव सरकारी गलियारों से निकलकर आया था। इससे ठीक पहले, बीते दिसंबर महीने में भी सरकार ने एक 'टेलीकॉम सिक्योरिटी ऐप' को सभी स्मार्टफोन्स में प्री-इंस्टॉल करने का आदेश जारी किया था। लेकिन तब भी स्मार्टफोन मेकर्स के भारी विरोध और व्यावहारिक दिक्कतों को देखते हुए उस आदेश को कुछ ही दिनों बाद वापस ले लिया गया था।
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आम यूजर्स के लिए इसका क्या मतलब है?

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सरकार के इस फैसले के बाद आम यूजर्स के अनुभव में कोई नकारात्मक बदलाव नहीं आएगा। जिन नागरिकों को अपने फोन में आधार कार्ड से जुड़ी सेवाएं (जैसे- ई-आधार डाउनलोड करना, पता बदलना या बायोमेट्रिक लॉक/अनलॉक करना) चाहिए, वे अपनी मर्जी से और अपनी सुविधा के अनुसार गूगल प्ले स्टोर (Google Play Store) या एपल ऐप स्टोर (Apple App Store) से आधिकारिक mAadhaar App को बिल्कुल मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं।
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इस फैसले से यह भी साफ हो गया है कि सरकार अब 'जबरन' ऐप्स थोपने के बजाय 'यूजर चॉइस' (User Choice) और टेक कंपनियों के ग्लोबल स्टैंडर्ड्स का सम्मान कर रही है।
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