मेरठ: पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सबसे प्रमुख और तेजी से विकसित हो रहा शहर मेरठ, इन दिनों भूमाफियाओं (Land Mafia) और अवैध कॉलोनाइजर्स का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है। रैपिड रेल (Namo Bharat) और नए एक्सप्रेसवे के निर्माण के बाद से शहर की सीमाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है। इसी विस्तार की आड़ में शहर के बाहरी इलाकों (Outskirts) और हरियाली वाले खेतों में कुकुरमुत्ते की तरह अवैध कॉलोनियां पनप रही हैं। इन कॉलोनियों को रोकने की जिम्मेदारी 'मेरठ विकास प्राधिकरण' (MDA) की है, लेकिन मेडा की कार्यप्रणाली हमेशा 'दिखावे' और 'खानापूर्ति' तक ही सीमित रही है।
\r\n\r\nलेकिन, अब इस पूरे 'नेक्सस' (Nexus) पर देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) का डंडा चल गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने मेरठ के बाहरी क्षेत्रों, विशेष रूप से लावड़ रोड स्थित 'उल्देपुर' गांव में धड़ल्ले से विकसित हो रही अवैध कॉलोनियों पर सख्त नाराजगी जताते हुए सीधे अधिकारियों से जवाब तलब किया है। इस ऐतिहासिक आदेश के बाद से मेरठ के प्रशासनिक महकमे में भूचाल आ गया है और फाइलों में धूल फांक रहे ध्वस्तीकरण के आदेश बाहर निकाले जाने लगे हैं।
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: प्रमुख सचिव पी. गुरुप्रसाद से रिपोर्ट तलब
\r\n\r\nयह पूरा विवाद तब सुप्रीम कोर्ट की नजरों में आया जब न्यायालय में उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद की शास्त्रीनगर कॉलोनी से जुड़े एक पुराने मामले की सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान ही यह तथ्य उभर कर सामने आया कि शहर के नियोजित विकास को ताक पर रखकर बाहरी इलाकों में धड़ल्ले से कृषि भूमि पर कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं।
\r\n\r\nमामले की गंभीरता और स्थानीय प्राधिकरण की नाकामी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बेहद कड़े निर्देश जारी किए हैं।
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\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट के आदेश की सबसे बड़ी बातें:
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- \r\n उल्देपुर का 'विशेष' जिक्र: अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया है कि आवास विकास परिषद के चेयरमैन और प्रमुख सचिव पी. गुरुप्रसाद व्यक्तिगत रूप से यह पता लगाएं कि क्या मेरठ शहर के बाहरी इलाके में, विशेष रूप से 'उल्देपुर' (Uldepur) नामक स्थान पर अवैध रूप से रिहायशी या कच्चे मकानों का निर्माण हो रहा है?\r\n \r\n
- \r\n वकीलों को भी दी गई जिम्मेदारी: न्यायालय ने सिर्फ सरकारी अधिकारियों पर भरोसा न करते हुए, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकीलों को भी यह निर्देश दिया है कि वे ग्राउंड लेवल पर जानकारी जुटाएं और इस अवैध निर्माण की हकीकत से न्यायालय को अवगत कराएं।\r\n \r\n
- \r\n सख्त रिपोर्ट की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे कॉलोनाइजेशन के मुद्दे पर एक विस्तृत, पारदर्शी और तथ्यात्मक रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है।\r\n \r\n
\r\n\r\nइस आदेश का सीधा मतलब यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत अब स्थानीय अधिकारियों के 'झूठे दावों' और 'कागजी कार्रवाइयों' से तंग आ चुकी है और वह शहर के मास्टर प्लान को बर्बाद होने से बचाना चाहती है।
\r\n\r\nMDA की 'ढकोसला' कार्रवाई: फाइलों में ध्वस्तीकरण, जमीन पर निर्माण
\r\n\r\nमेरठ के आम नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह दर्द रहा है कि मेडा (MDA) के अधिकारी शुरुआत में भूमाफियाओं को पूरी छूट देते हैं। खेतों में रातों-रात सड़कें बिछ जाती हैं, बिजली के खंभे लग जाते हैं और जब गरीब जनता अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई लगाकर वहां प्लॉट खरीद लेती है, तब अचानक मेडा की नींद टूटती है।
\r\n\r\nकार्रवाई के नाम पर सिर्फ एक 'ड्रामा':
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- \r\n दिखावटी बुलडोजर: प्राधिकरण की टीम पूरे दलबल के साथ मौके पर पहुंचती है। कॉलोनी की बाहरी चारदीवारी या सड़क के एक छोटे से हिस्से को बुलडोजर से तोड़ा जाता है।\r\n \r\n
- \r\n फोटोग्राफी और लीपापोती: टीम इस तोड़फोड़ की शानदार तस्वीरें खींचती है और दफ्तर लौट आती है। इन तस्वीरों को फाइलों में चस्पा कर यह रिपोर्ट बना दी जाती है कि "अवैध कॉलोनी को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है।"\r\n \r\n
- \r\n खेल फिर शुरू: टीम के लौटते ही अगले दिन कॉलोनाइजर उस टूटी हुई दीवार को फिर से चुनवा देता है और प्लाटिंग की बिक्री का खेल दोगुनी रफ्तार से शुरू हो जाता है।\r\n \r\n
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश मेडा की इसी 'पिक एंड चूज' और दिखावटी कार्यप्रणाली पर एक तगड़ा प्रहार है।
\r\n\r\nचौंकाने वाले आंकड़े: मेरठ में वैध और अवैध कॉलोनियों का असली सच
\r\n\r\nमेरठ विकास प्राधिकरण के ही आधिकारिक रिकॉर्ड्स इस बात की चीख-चीख कर गवाही देते हैं कि शहर में अवैध कॉलोनियों का जाल किस कदर फैल चुका है। जब हम इन आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं, तो स्थिति की भयावहता साफ नजर आती है।
\r\n\r\n| \r\n कॉलोनियों की स्थिति (Status) \r\n | \r\n \r\n कॉलोनियों की संख्या \r\n | \r\n \r\n विस्तृत जानकारी (Details) \r\n | \r\n
|---|---|---|
| \r\n पूर्णतः स्वीकृत (Approved) \r\n | \r\n \r\n मात्र 285 \r\n | \r\n \r\n केवल वे कॉलोनियां जिनका नक्शा, लेआउट प्लान और लैंड-यूज (धारा 143) मेडा द्वारा विधिवत पास है। \r\n | \r\n
| \r\n नियमित की गईं (Regularized) \r\n | \r\n \r\n 119 \r\n | \r\n \r\n वे पुरानी कॉलोनियां जो दशकों पहले अवैध रूप से बसी थीं, लेकिन बाद में मेडा ने भारी शुल्क वसूल कर उन्हें 'वैध' की श्रेणी में डाल दिया। \r\n | \r\n
| \r\n अवैध कॉलोनियां (Illegal) \r\n | \r\n \r\n 386 \r\n | \r\n \r\n यह संख्या केवल सरकारी फाइलों में दर्ज अवैध कॉलोनियों की है। \r\n | \r\n
\r\n\r\n\r\nजमीनी हकीकत: विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज 386 का आंकड़ा सिर्फ 'हिमशैल का सिरा' (Tip of the iceberg) है। हकीकत में मवाना रोड, लावड़ रोड, रुड़की रोड, और गढ़ रोड के बाहरी बेल्ट में हजारों की संख्या में अवैध कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं, जिनका कोई सरकारी रिकॉर्ड ही नहीं है। बिना सीवर, बिना चौड़ी सड़कों और बिना ग्रीन बेल्ट के बस रही ये कॉलोनियां मेरठ को एक बड़े 'स्लम' (मलिन बस्ती) में बदल रही हैं।\r\n
\r\n\r\nभूमाफियाओं का मकड़जाल: कैसे लुटती है आम जनता की गाढ़ी कमाई?
\r\n\r\nउल्देपुर हो या मेरठ का कोई और इलाका, अवैध कॉलोनाइजर्स का काम करने का तरीका (Modus Operandi) बिल्कुल एक जैसा और बेहद शातिर होता है:
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- \r\n सस्ती जमीन की खरीद: माफिया सबसे पहले किसानों से कृषि भूमि (Agricultural Land) कौड़ियों के भाव खरीदते हैं या एग्रीमेंट (Agreement to Sell) कर लेते हैं।\r\n \r\n
- \r\n सरकारी नियमों की धज्जियां: बिना लैंड-यूज चेंज कराए (बिना कृषि भूमि को आवासीय में बदले) और बिना मेडा से नक्शा पास कराए, रातों-रात खेतों के बीच खड़ंजा (ईंटों की सड़क) बिछा दिया जाता है।\r\n \r\n
- \r\n लुभावने वादों का जाल: "शहर से सटी सबसे सस्ती कॉलोनी," "हाथों-हाथ रजिस्ट्री और कब्जा," जैसे लुभावने विज्ञापनों और होर्डिंग्स के जरिए आम जनता को आकर्षित किया जाता है।\r\n \r\n
- \r\n जिंदगी भर का पछतावा: एक आम आदमी जो किराए के मकान से तंग आकर अपने जीवन भर की जमापूंजी (PF, Loan) लगाकर वहां 100 गज का प्लॉट खरीद लेता है, वह सबसे बड़ा भुक्तभोगी बनता है। जब मकान बन रहा होता है, तब मेडा का बुलडोजर आकर उसे मलबे में तब्दील कर देता है। कॉलोनाइजर अपना फोन बंद कर फरार हो जाता है और आम आदमी न्याय के लिए दर-दर भटकता है।\r\n \r\n
\r\n\r\nMDA उपाध्यक्ष का एक्शन मोड: "सुप्रीम आदेश का होगा अक्षरशः पालन"
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट के इस हंटर के बाद मेरठ विकास प्राधिकरण में आपातकालीन बैठकों का दौर जारी है। फाइलों पर जमी धूल साफ की जा रही है और लावड़ रोड सहित शहर के सभी प्रवेश द्वारों पर मौजूद कॉलोनियों का नया सर्वे शुरू कर दिया गया है।
\r\n\r\nइस पूरे प्रकरण पर कड़ा रुख अपनाते हुए मेडा के उपाध्यक्ष (VC) संजय कुमार मीना ने आधिकारिक बयान जारी किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि, "माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी सख्ती और संवेदनशीलता के साथ पालन किया जाएगा। अवैध कॉलोनाइजर्स के खिलाफ अब सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि जमीनी और निर्णायक कार्रवाई होगी।"
\r\n\r\nवीसी ने अपने महकमे का बचाव करते हुए यह भी कहा, "ऐसा नहीं है कि प्राधिकरण शांत बैठा था। लावड़ रोड और विशेषकर उल्देपुर में भी अवैध कॉलोनियों पर कई बार ध्वस्तीकरण (Demolition) की कार्रवाई की गई है। लेकिन अब यह अभियान और भी बड़े स्तर पर चलाया जाएगा और किसी भी भूमाफिया को बख्शा नहीं जाएगा।"
\r\n\r\nआम जनता के लिए विशेष चेतावनी (Buyer's Alert)
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट का यह डंडा केवल अधिकारियों के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के लिए भी एक 'वेक-अप कॉल' (Wake-up Call) है। यदि आप भी मेरठ या आसपास के इलाके में प्लॉट या घर खरीदने का सपना देख रहे हैं, तो खून-पसीने की कमाई लुटाने से पहले इन बातों की गांठ बांध लें:
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- \r\n मेडा का अप्रूवल लेटर मांगें: किसी भी ब्रोकर या बिल्डर के झांसे में न आएं। प्लॉट खरीदने से पहले उस कॉलोनी का 'मेरठ विकास प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत लेआउट प्लान' अपनी आंखों से देखें और उसे क्रॉस-चेक करें।\r\n \r\n
- \r\n RERA रजिस्ट्रेशन की जांच करें: उत्तर प्रदेश में अब हर नए रियल एस्टेट प्रोजेक्ट का UP-RERA (रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी) में रजिस्टर्ड होना अनिवार्य है। बिल्डर से रेरा नंबर मांगें और उसे वेबसाइट पर चेक करें।\r\n \r\n
- \r\n खेतों में प्लॉट न खरीदें: यदि कोई आपको मुख्य सड़क से दूर खेतों के बीच प्लॉट काट कर दे रहा है और लैंड-यूज कमर्शियल/आवासीय नहीं है, तो वहां एक रुपया भी न लगाएं।\r\n \r\n
- \r\n सस्ते के लालच से बचें: जो चीज बाजार भाव से बहुत ज्यादा सस्ती मिल रही है, उसके पीछे कोई न कोई कानूनी झोल (अवैध निर्माण) जरूर होता है।\r\n \r\n
क्या अब थमेगा अवैध कॉलोनियों का खेल?
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट का यह आदेश मेरठ के रियल एस्टेट सेक्टर के लिए एक बहुत बड़ी 'सर्जिकल स्ट्राइक' साबित होने जा रहा है। इससे उन भूमाफियाओं के हौसले जरूर टूटेंगे जो अधिकारियों की मिलीभगत से शहर के मास्टर प्लान को निगल रहे थे। अब गेंद आवास विकास के प्रमुख सचिव और मेडा के पाले में है। पूरे शहर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मेडा इस बार कोई ठोस कार्रवाई कर पाएगा या फिर से सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने के लिए कोई नई 'कागजी फाइल' तैयार की जाएगी। आने वाले कुछ दिन मेरठ के भूमाफियाओं और लापरवाह अधिकारियों के लिए बेहद भारी गुजरने वाले हैं!
Sabse pehle comment karne wale banein.