(विशेष संवाददाता, मेरठ) | दिनांक: 08/02/2026
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मेरठ: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले मेरठ शहर के पॉश इलाके शास्त्री नगर का सेंट्रल मार्केट (Central Market), जो अपनी चमक-धमक और भीड़भाड़ के लिए जाना जाता था, आज एक अजीब से सन्नाटे और दहशत के साये में है। सुप्रीम कोर्ट के 27 जनवरी 2026 के एक आदेश ने यहां के सैकड़ों व्यापारियों की नींद उड़ा दी है।READ ALSO:-मेरठ: शहनाई की गूंज के बीच मातम, फेरों से चंद घंटे पहले 'वर्दी वाली दुल्हन' का अपहरण! हिस्ट्रीशीटर अंकित पर एफआईआर
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शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में शास्त्री नगर के आवासीय भूखंडों (Residential Plots) पर बने अवैध व्यावसायिक कॉम्प्लेक्सों को 6 सप्ताह (Six Weeks) के भीतर ध्वस्त करने का आदेश दिया है। "कानून का राज" स्थापित करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का यह कदम व्यापारियों के लिए किसी प्रलय से कम नहीं है। आदेश की मियाद (Deadline) नजदीक आते ही बाजार में अफरा-तफरी का माहौल है। स्थिति यह हो गई है कि बुलडोजर चलने के डर से व्यापारी अब खुद ही अपनी दुकानों के अवैध हिस्सों को तोड़ने लगे हैं।
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क्या है सुप्रीम कोर्ट का 27 जनवरी का आदेश?

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इस पूरे विवाद की जड़ आवासीय और व्यावसायिक भूमि उपयोग का उल्लंघन है। शास्त्री नगर एक आवासीय कॉलोनी है, जिसे उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (UP Housing & Development Board) ने विकसित किया था। लेकिन समय के साथ, मुख्य सड़कों पर स्थित मकानों को अवैध रूप से बड़े-बड़े शोरूम, कॉम्प्लेक्स और दुकानों में तब्दील कर दिया गया।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:
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"आवासीय क्षेत्रों में अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियां न केवल नियमों का उल्लंघन हैं, बल्कि यह निवासियों के जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती हैं। अवैध निर्माणों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जा सकता।"
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कोर्ट के आदेश के मुख्य बिंदु:

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    समय सीमा: अवैध निर्माण को हटाने के लिए 6 सप्ताह का समय दिया गया है।
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    स्पष्ट निर्देश: आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक गतिविधियां तुरंत बंद हों और अवैध ढांचे गिराए जाएं।
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    अगली सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च को तय की गई है, जिसमें प्रशासन को अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) पेश करनी होगी।
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ग्राउंड जीरो—शनिवार को दिखा डर का मंजर

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8 फरवरी 2026 (शनिवार) को जब 'खबरिलाल' की टीम सेंट्रल मार्केट पहुंची, तो नजारा बदला हुआ था। आमतौर पर ग्राहकों से गुलजार रहने वाले इस बाजार में सन्नाटा था। दुकानों के शटर या तो बंद थे या आधे खुले थे।
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लेकिन सबसे चौंकाने वाला दृश्य यह था कि कई दुकानदार स्वयं ध्वस्तीकरण (Self-Demolition) कर रहे थे। लेबर और मिस्त्री हथौड़े और छेनी लेकर दुकानों के बाहर निकले हुए छज्जों, रैम्प, टीन शेड और साइन बोर्ड्स को उखाड़ रहे थे।
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व्यापारियों की मनोदशा: एक कपड़ा व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "साहब, अगर आवास विकास वाले बुलडोजर लेकर आए, तो वे यह नहीं देखेंगे कि क्या वैध है और क्या अवैध। वे पूरी दुकान को मलबे में मिला देंगे। इसलिए हम खुद ही आगे का हिस्सा हटा रहे हैं ताकि कोर्ट को दिखा सकें कि हम आदेश का पालन कर रहे हैं। शायद इससे हमारी रोजी-रोटी बच जाए।"
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यह डर स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में अवैध निर्माणों पर जिस तरह से बुलडोजर गरजा है, उसने व्यापारियों के मन में यह खौफ बैठा दिया है कि प्रशासन अब रियायत के मूड में नहीं है।
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लोकेश खुराना का हस्तक्षेप—"यह सिर्फ दिखावा है"

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इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ आरटीआई एक्टिविस्ट और याचिकाकर्ता लोकेश खुराना ने लाया है। जहां एक तरफ व्यापारी खुद को बचाने की जद्दोजहद में हैं, वहीं दूसरी तरफ खुराना ने प्रशासन की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
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लोकेश खुराना ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आईजीआरएस (IGRS) पोर्टल और लिखित पत्र के माध्यम से एक औपचारिक शिकायत भेजी है। उनका आरोप है कि आवास एवं विकास परिषद के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने के नाम पर महज "खानापूर्ति" (Eyewash) कर रहे हैं।
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लोकेश खुराना के गंभीर आरोप:

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    ध्वस्तीकरण बनाम अतिक्रमण: खुराना का कहना है, "सुप्रीम कोर्ट का आदेश 'अवैध निर्माण' (Illegal Construction) यानी उन बहुमंजिला इमारतों को ध्वस्त करने का है जो आवासीय भूखंड पर बनी हैं। लेकिन अधिकारी इसे 'अतिक्रमण हटाओ अभियान' (Anti-Encroachment Drive) बताकर केवल टीन शेड और पटरी साफ करवा रहे हैं। यह कोर्ट की अवमानना है।"
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    शमन (Compounding) का खेल: खुराना ने बताया कि अधिकारी व्यापारियों को यह कहकर भ्रमित कर रहे हैं कि वे अपनी इमारतों का नक्शा पास करवा लेंगे या कंपाउंडिंग करवा लेंगे। जबकि 'नई भवन निर्माण एवं विकास उपविधि' (Building Bylaws) के तहत, आवासीय भूखंड पर 100% व्यावसायिक निर्माण को नियमित (Regularize) करने का कोई प्रावधान ही नहीं है।
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    भ्रष्टाचार की बू: शिकायत में यह भी आशंका जताई गई है कि अधिकारी जानबूझकर सही कार्रवाई नहीं कर रहे हैं ताकि बाद में वे कोर्ट में कह सकें कि 'हमने कार्रवाई की थी', जबकि असल अवैध इमारतें ज्यों की त्यों खड़ी रहेंगी।
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खुराना ने सीएम से मांग की है कि एक उच्च-स्तरीय जांच कमेटी बनाई जाए जो यह सुनिश्चित करे कि 13 मार्च तक सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अक्षरशः (In letter and spirit) पालन हो।
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प्रशासन और राजनीति—चुप्पी साधे बैठे जिम्मेदार

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सेंट्रल मार्केट के व्यापारी इस वक्त खुद को अनाथ महसूस कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, पिछले एक हफ्ते में व्यापारी संघ के प्रतिनिधियों ने शहर के कई बड़े नेताओं, विधायकों और सांसदों के दरवाज़े खटखटाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आगे कोई भी नेता खुलकर बोलने को तैयार नहीं है।
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सीएम से मिलने की होड़: व्यापारियों का एक प्रतिनिधिमंडल पिछले कई दिनों से लखनऊ में डेरा डालने की तैयारी में है। वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर अपनी व्यथा सुनाना चाहते हैं। उनका तर्क है कि हजारों परिवार इस बाजार से जुड़े हैं। अगर बाजार टूटा, तो वे भुखमरी के कगार पर आ जाएंगे। लेकिन खबर लिखे जाने तक उन्हें सीएम से मिलने का समय (Appointment) नहीं मिल पाया है।
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अधिकारियों का रुख: आवास एवं विकास परिषद के अधिकारी दबी जुबान में मान रहे हैं कि दबाव बहुत ज्यादा है। एक अधिकारी ने ऑफ-द-रिकॉर्ड बताया, "सुप्रीम कोर्ट का डंडा है। हम चाहकर भी किसी को राहत नहीं दे सकते। 13 मार्च को हमें जवाब देना है। अगर तब तक कार्रवाई नहीं दिखी, तो हम पर गाज गिरेगी।"
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13 मार्च का दिन और भविष्य की तस्वीर
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अब सबकी निगाहें 13 मार्च 2026 पर टिकी हैं। यह वह तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई होगी।
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संभावित परिदृश्य (Scenarios):

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    परिदृश्य ए (सख्त कार्रवाई): यदि लोकेश खुराना की दलीलें कोर्ट में सही साबित होती हैं और कोर्ट को लगता है कि प्रशासन ने सिर्फ दिखावा किया है, तो कोर्ट तत्काल प्रभाव से पैरामिलिट्री फोर्स की मौजूदगी में पूरे मार्केट को ध्वस्त करने का आदेश दे सकता है (जैसा दिल्ली के सीलिंग ड्राइव में हुआ था)।
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    परिदृश्य बी (राहत की उम्मीद): यदि व्यापारी सरकार को यह समझाने में सफल हो जाते हैं कि वे लैंड यूज़ चेंज (Land Use Change) का भारी जुर्माना भरने को तैयार हैं, तो शायद कोर्ट कोई बीच का रास्ता निकाले। हालांकि, आवासीय कॉलोनी के बीचों-बीच इसकी संभावना कम ही नजर आती है।
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मेरठ का सेंट्रल मार्केट इस समय 'दो पाटों' के बीच फंसा है—एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट और कठोर आदेश, और दूसरी तरफ दशकों पुरानी रोजी-रोटी। आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश खुराना की सक्रियता ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि प्रशासन इस बार मामले को फाइलों में नहीं दबा पाएगा।
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आने वाले 4-5 हफ्ते मेरठ के व्यापारिक इतिहास के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं। क्या सेंट्रल मार्केट इतिहास बन जाएगा या कोई नया रास्ता निकलेगा? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल यहां सिर्फ हथौड़ों की आवाज और व्यापारियों की सिसकियाँ ही सुनाई दे रही हैं।
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विशेष नोट: पाठकों के लिए जानकारी

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अगर आप भी शास्त्री नगर या इसके आसपास रहते हैं और अवैध निर्माण की शिकायत करना चाहते हैं, तो जनसुनवाई पोर्टल का उपयोग कर सकते हैं। वहीं, व्यापारियों को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी दलाल के बहकावे में न आएं और कानूनी विशेषज्ञों की राय लें।
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(खबरीलाल मीडिया नेटवर्क—सच्चाई, बिना किसी मिर्च-मसाले के)
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