उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से एक बेहद गंभीर और प्रशासनिक मनमानी का मामला सामने आया है। जहां एक ओर सरकारें हाशिए पर खड़े समाज के उत्थान और उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने के बड़े-बड़े दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर मेरठ प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई ने दलित समाज के करीब डेढ़ सौ परिवारों को भुखमरी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। मामला मेरठ के डूंगर गांव का है, जहां दलित समुदाय द्वारा संचालित पुश्तैनी चर्मशोधन (Leather Tanning) इकाइयों पर जिला प्रशासन ने अचानक ताला जड़ दिया है।Read also:-KGMU और SGPGI धर्मांतरण मामले पर राजभवन का कड़ा प्रहार; UP के हर मेडिकल कॉलेज में बनेगा 'एंटी-कन्वर्जन सेल'
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इस घोर अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ अब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने कड़ा संज्ञान लिया है। आयोग ने मेरठ के जिलाधिकारी (DM) और जिला ग्राम्य विकास अभिकरण (DRDA) के डायरेक्टर को नोटिस जारी कर इस पूरे प्रकरण पर स्पष्टीकरण मांगा है। आयोग ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि यदि समय रहते संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो संबंधित अधिकारियों को सम्मन जारी कर दिल्ली तलब किया जाएगा।
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क्या है पूरा विवाद और कैसे शुरू हुआ अन्याय?
\r\n\r\nमेरठ के डूंगर गांव में दलित समाज के लोग पीढ़ियों से अपने पारंपरिक और पुश्तैनी कार्य—चर्मशोधन (चमड़ा साफ करने और तैयार करने का काम)—से जुड़े हुए हैं। यह न केवल उनके जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन है, बल्कि एक ऐसा सूक्ष्म उद्योग है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल देता है।
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इस कार्य को सुव्यवस्थित करने और दलितों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश सरकार के 'जिला ग्राम्य विकास अभिकरण' (DRDA) ने इन परिवारों को चर्मशोधन इकाइयां बनाकर दी थीं। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, इन इकाइयों को संचालित करने का अनुबंध 17 जून 2034 तक पूरी तरह से वैध है।
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लेकिन शोषित क्रांति दल के आरोपों के अनुसार, प्रशासन ने नियमों और अनुबंध की धज्जियां उड़ाते हुए 13 अप्रैल 2026 को अचानक गांव में धावा बोल दिया। बिना किसी पूर्व सूचना, बिना किसी कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) और बिना कोई मोहलत दिए, प्रशासन ने इन इकाइयों को सील कर दिया। इस अचानक हुई कार्रवाई ने गरीब मजदूरों और कारीगरों के पैरों तले जमीन खिसका दी।
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लाखों का कच्चा माल सड़कर हुआ बर्बाद, 150 परिवारों पर टूटा कहर
\r\n\r\nप्रशासन की इस जल्दबाजी और असंवेदनशील कार्रवाई का सबसे बड़ा खामियाजा गरीब दलित परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। चर्मशोधन की प्रक्रिया में कच्चे चमड़े (Raw Hides) को रसायनों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के जरिए तैयार किया जाता है। प्रशासन ने सीलिंग की कार्रवाई इतनी क्रूरता से की कि कारीगरों को अपना कच्चा माल तक समेटने या सुरक्षित करने का मौका नहीं दिया गया।
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नतीजतन, इकाइयों के अंदर रखा लाखों रुपये का कच्चा माल पूरी तरह से सड़कर बर्बाद हो चुका है। इससे न केवल भारी आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि इकाइयों के आसपास भयंकर बदबू और संक्रमण का खतरा भी पैदा हो गया है। शोषित क्रांति दल के अनुसार, प्रशासन की इस हिटलरशाही ने गांव के लगभग 150 परिवारों की रोजी-रोटी छीन ली है। जिन परिवारों के घर में रोज कुआं खोदकर पानी पीने जैसी स्थिति थी, आज वे भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की दवा और दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
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शोषित क्रांति दल (SKD) ने उठाई दलितों की आवाज
\r\n\r\nजब स्थानीय स्तर पर अधिकारियों ने इन गरीब परिवारों की कोई सुनवाई नहीं की, तो शोषित क्रांति दल (SKD) ने इस अन्याय के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। एसकेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकांत के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मेरठ से लेकर दिल्ली तक इस मुद्दे को उठाया।
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दलितों पर हो रहे इस अत्याचार और प्रशासनिक गुंडागर्दी के खिलाफ 21 मई 2026 को शोषित क्रांति दल का प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली पहुंचा। वहां उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) के अध्यक्ष श्री किशोर मकवाना से मुलाकात की और उन्हें इस पूरे प्रकरण का एक विस्तृत शिकायती पत्र सौंपा।
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अध्यक्ष रविकांत ने आयोग को बताया कि डूंगर गांव की यह घटना सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह दलितों को आर्थिक रूप से पंगु बनाने और उन्हें उनके पुश्तैनी काम से बेदखल करने की एक गहरी साजिश का हिस्सा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब DRDA का एग्रीमेंट 2034 तक लागू है, तो प्रशासन ने किस कानून और अधिकार के तहत रातों-रात 13 अप्रैल 2026 को इन पर सील लगा दी?
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NCSC का सख्त एक्शन: DM और DRDA को अल्टीमेटम
\r\n\r\nशोषित क्रांति दल द्वारा रखे गए तथ्यों, नष्ट हुए माल और अनुबंध के कागजातों का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने मामले की गंभीरता को समझा। आयोग ने इसे दलित समुदाय के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का सीधा हनन माना है।
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तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करते हुए NCSC ने मेरठ के जिलाधिकारी (DM) और DRDA के डायरेक्टर को नोटिस थमा दिया है। आयोग ने अपने नोटिस में स्पष्ट रूप से पूछा है कि:
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- \r\n किस नियम के तहत 2034 तक वैध अनुबंध वाली इकाइयों को 2026 में सील किया गया?\r\n \r\n
- \r\n सीलिंग से पहले प्रभावित परिवारों को कानूनी रूप से नोटिस क्यों नहीं दिया गया?\r\n \r\n
- \r\n इस सीलिंग के कारण हुए लाखों के आर्थिक नुकसान और भुखमरी की स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है?\r\n \r\n
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आयोग ने सख्त हिदायत दी है कि यदि तय सीमा के भीतर प्रशासन द्वारा तथ्यात्मक और संतोषजनक जवाब नहीं दिया जाता है, तो आयोग अपने सिविल कोर्ट के अधिकारों का प्रयोग करते हुए अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब (Summon) करेगा।
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शोषित क्रांति दल की प्रमुख मांगें
\r\n\r\nशोषित क्रांति दल ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से गुहार लगाई है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप कर तुरंत न्याय सुनिश्चित करे। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
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- \r\n तुरंत हटे सील: मेरठ जिला प्रशासन को सख्त निर्देश दिए जाएं कि वह डूंगर गांव की चर्मशोधन इकाइयों से तुरंत सील हटाए ताकि लोग अपना काम दोबारा शुरू कर सकें।\r\n \r\n
- \r\n नुकसान का मुआवजा: प्रशासन की मनमानी के कारण जो लाखों रुपये का कच्चा माल सड़कर बर्बाद हुआ है, उसका उचित आकलन कर प्रभावित परिवारों को आर्थिक मुआवजा दिया जाए।\r\n \r\n
- \r\n दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: जिन अधिकारियों ने बिना नोटिस दिए और अनुबंध की अनदेखी करते हुए दलितों की आजीविका छीनी है, उनके खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत और पद के दुरुपयोग की कार्रवाई की जाए।\r\n \r\n
- \r\n सुरक्षा की गारंटी: भविष्य में इन गरीब परिवारों को किसी भी तरह के प्रशासनिक या स्थानीय उत्पीड़न का शिकार न होना पड़े, इसकी लिखित गारंटी दी जाए।\r\n \r\n
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न्याय की आस में डूंगर के दलित
\r\n\r\nडूंगर गांव का यह मामला केवल एक व्यवसाय के बंद होने का नहीं है, बल्कि यह भारत के हाशिए पर पड़े वर्ग के आर्थिक सशक्तिकरण पर एक सीधा प्रहार है। एक ओर जहां देश 'मेक इन इंडिया' और 'लोकल फॉर वोकल' की बात कर रहा है, वहीं स्थानीय प्रशासन पुश्तैनी कारीगरों के हाथ काट रहा है।
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अब सभी की निगाहें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की अगली कार्रवाई और मेरठ प्रशासन के जवाब पर टिकी हैं। क्या मेरठ का जिला प्रशासन अपनी गलती मानकर डूंगर गांव के 150 परिवारों को उनका रोजगार वापस लौटाएगा? या फिर नौकरशाही की लालफीताशाही में दलितों के अधिकार और उनका भविष्य यूं ही दबता रहेगा? शोषित क्रांति दल ने साफ कर दिया है कि जब तक डूंगर के दलितों को न्याय नहीं मिल जाता, उनका यह संघर्ष सड़क से लेकर संवैधानिक संस्थाओं तक जारी रहेगा।
Sabse pehle comment karne wale banein.