उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर का दिल कहे जाने वाले सेंट्रल मार्केट (Central Market) में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है। कभी शाम ढलते ही रंग-बिरंगी लाइटों, खरीदारों की भारी भीड़ और वाहनों के शोर से गुलजार रहने वाला यह बाजार अब धीरे-धीरे अपनी रौनक खो रहा है। इसका मुख्य कारण मेरठ सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण (Meerut Central Market demolition) की वह तलवार है, जो सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के बाद हजारों व्यापारियों की रोजी-रोटी पर लटक रही है।READ ALSO:-यूपी में होली का डबल डोज: बिजनौर में विधायक का डांस, 'हमजोली' अखिलेश का तंज और सीएम योगी का हुड़दंगियों पर 'हंटर'
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हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि अब लगातार मार्केट की तस्वीर बदली नजर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट के ध्वस्तीकरण संबंधी आदेश के बाद व्यापारियों में भारी असमंजस और चिंता का माहौल है। अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई से खड़े किए गए शोरूम्स और दुकानों को व्यापारी अब अपने ही हाथों से तोड़ने को मजबूर हैं। कई दुकानों के बाहर “बिकाऊ है” (For Sale) के पोस्टर और बैनर भी दिखाई देने लगे हैं। टीन शेड और अन्य निर्माण सामग्री भी बिक्री के लिए रखी जा रही है।
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यह स्थिति केवल एक बाजार के उजड़ने की नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों के भविष्य पर छाए अंधेरे की कहानी है, जो पिछले कई दशकों से इस बाजार से अपना जीवन यापन कर रहे थे। आइए, इस पूरे घटनाक्रम, सुप्रीम कोर्ट के आदेश, आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता के खिलाफ व्यापारियों के आक्रोश और इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण करें।
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मेरठ सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण: सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और अल्टीमेटम
\r\n\r\nइस पूरे विवाद की जड़ वह कानूनी लड़ाई है जो पिछले कई वर्षों से आवासीय भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर लड़ी जा रही थी। मेरठ के पॉश इलाके शास्त्री नगर में स्थित यह सेंट्रल मार्केट मूल रूप से उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (UP Housing and Development Board) द्वारा आवासीय भूखंड (Residential Plots) के रूप में आवंटित किया गया था। लेकिन समय के साथ, लोगों ने अपने घरों के बाहरी हिस्सों को दुकानों और शोरूम्स में बदल दिया।
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17 दिसंबर 2024 का ऐतिहासिक फैसला
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर 2024 को एक कड़ा आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया था कि आवासीय भूखंडों का व्यावसायिक उपयोग पूरी तरह से अवैध है। अदालत ने बिल्डिंग को खाली करने और अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने के सख्त निर्देश दिए थे।
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"आपके पास बहुत बुलडोजर हैं, अब चलाइए!"
\r\n\r\nइस मामले में सबसे बड़ा मोड़ जनवरी 2026 में तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और आवास विकास परिषद की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए तंज कसा कि "आपके पास बहुत बुलडोजर हैं, अब चलाइए उनको"। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से छह सप्ताह के भीतर सभी अवैध निर्माणों को ध्वस्त कर इसकी अनुपालन रिपोर्ट अदालत में पेश करने का अल्टीमेटम दिया है। आवास विकास परिषद को 17 मार्च 2026 तक माननीय उच्च न्यायालय में इन ध्वस्तीकरण की कार्रवाइयों की रिपोर्ट दाखिल करनी है।
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अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि वह अपने पुराने आदेश को परिवर्तित करने या कोई नई मोहलत देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। इस आदेश के बाद आवास विकास परिषद ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं और ध्वस्तीकरण के नोटिस तैयार कर लिए हैं।
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ग्राउंड जीरो की हकीकत: शटर हटाकर दोबारा दरवाजे लगा रहे व्यापारी
\r\n\r\nमेरठ सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण की आहट ने व्यापारियों को मानसिक रूप से तोड़ दिया है। जब उन्हें यह महसूस हो गया कि कानूनी रूप से अब कोई राहत मिलने की उम्मीद बेहद कम है, तो उन्होंने भारी नुकसान से बचने के लिए खुद ही अतिक्रमण हटाना शुरू कर दिया।
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- \r\n बोर्ड और लाइटें हटाई जा रही हैं: ऊंची इमारतों में स्थापित नामी ब्रांड्स के शोरूम, जो कभी लोगों को आकर्षित करते थे, अब अपने विशाल साइन बोर्ड और कीमती लाइटें हटाने लगे हैं।\r\n \r\n
- \r\n शटर की जगह मूल दरवाजे: सबसे चौंकाने वाला दृश्य यह है कि जिन कारोबारियों ने अपने आवास के आगे शटर लगाकर दुकानें बना ली थीं, वे अब शटर उखाड़कर दोबारा लकड़ी या लोहे के आवासीय दरवाजे लगवा रहे हैं। व्यापारी यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि उनका भवन अपने मूल आवासीय स्वरूप में लौट आया है, ताकि कम से कम उनके रहने का घर बुलडोजर की चपेट में आने से बच जाए।\r\n \r\n
- \r\n 'बिकाऊ है' के पोस्टर: बाजार की गलियों में अब ग्राहकों को बुलाने वाली आवाजों की जगह शटरों और दीवारों पर लगे 'बिकाऊ है' के पोस्टर नजर आते हैं। व्यापारी अपनी दुकानों के तोड़े गए छज्जे, आगे बढ़ाए गए हिस्से, टीन शेड और अन्य निर्माण सामग्री कबाड़ के भाव बेचने को मजबूर हैं।\r\n \r\n
एक समय था जब शाम के समय इस बाजार में दुपहिया वाहन (Two-wheeler) निकालना भी मुश्किल होता था, लेकिन आज वहां पहले जैसी भीड़ बिल्कुल नजर नहीं आ रही है।
\r\n\r\n661/6 कॉम्प्लेक्स का ध्वस्तीकरण: जब चला था पहला बड़ा बुलडोजर
\r\n\r\nव्यापारियों में यह दहशत रातों-रात नहीं फैली है। इसका ट्रेलर वे अक्टूबर 2025 में देख चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में 26-27 अक्टूबर 2025 को शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट के भूखंड संख्या 661/6 पर बने एक अवैध 3-मंजिला कॉम्प्लेक्स को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में बुलडोजर से जमींदोज कर दिया गया था।
\r\n\r\nइस कॉम्प्लेक्स में लगभग 22 दुकानें थीं, जो वर्षों से वहां व्यापार कर रही थीं। जांच में सामने आया था कि यह निर्माण 1990 में गलत पावर ऑफ अटॉर्नी (Power of Attorney) के आधार पर बिना किसी स्वीकृत नक्शे के किया गया था। इस दौरान व्यापारियों का रोना-धोना मचा, महिलाओं ने अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ा कर गुहार लगाई, लेकिन कोर्ट के आदेश के आगे प्रशासन बेबस था।
\r\n\r\nउस एक कार्रवाई ने पूरे बाजार को यह संदेश दे दिया कि मेरठ सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण अब केवल कागजी धमकी नहीं, बल्कि एक कड़वी जमीनी हकीकत है। अब शहर में ऐसे 1468 से अधिक अवैध व्यावसायिक परिसरों की सूची तैयार है, जो आवासीय भूमि पर बने हैं और उन पर भी इसी तरह की कार्रवाई की तलवार लटकी हुई है।
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RTI कार्यकर्ता लोकेश खुराना के खिलाफ फूटा व्यापारियों का आक्रोश
\r\n\r\nइस पूरे घटनाक्रम में एक व्यक्ति का नाम सबसे ज्यादा विवादों में है— आरटीआई कार्यकर्ता (RTI Activist) लोकेश खुराना। सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों का सीधा आरोप है कि लगातार शिकायतों और आरटीआई अर्जियों के चलते ही प्रशासन और न्यायालय की यह कार्रवाई इतनी तेज हुई है।
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व्यापारियों का मानना है कि शहर में और भी कई जगह अवैध निर्माण हैं, लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता ने सुनियोजित तरीके से केवल सेंट्रल मार्केट को निशाना बनाया है। इस बात से आक्रोशित होकर व्यापारियों ने शहर के तीन अलग-अलग थानों में प्रदर्शन किया है और आरटीआई कार्यकर्ता लोकेश खुराना के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की लिखित तहरीर दी है।
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व्यापारियों का तर्क है कि इस तरह की 'ब्लैकमेलिंग' और चयनात्मक (Selective) शिकायतों से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी छीनी जा रही है। दूसरी ओर, प्रशासन का कहना है कि वे किसी व्यक्ति विशेष की शिकायत पर नहीं, बल्कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के सीधे आदेशों का पालन कर रहे हैं।
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राजनीतिक सरगर्मी: जब भाजपा के विरोध में व्यापारियों ने लगाए सपा के झंडे
\r\n\r\nमेरठ सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण का मामला अब केवल कानूनी और प्रशासनिक नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है। फरवरी 2026 के आखिरी सप्ताह में बाजार में एक अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला।
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व्यापारियों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के स्थानीय जनप्रतिनिधियों के प्रति भारी नाराजगी है। व्यापारियों का आरोप है कि संकट की इस घड़ी में, जब उनका पूरा व्यापार खत्म होने की कगार पर है, तब सत्तापक्ष के नेता उनकी कोई मदद नहीं कर रहे हैं और न ही सरकार तक उनकी आवाज प्रभावी ढंग से पहुंचा रहे हैं।
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- \r\n सपा के झंडों से विरोध: इसी उपेक्षा से तंग आकर 26 फरवरी 2026 को सेंट्रल मार्केट के कई व्यापारियों ने अपनी दुकानों की छतों और शटर पर विपक्षी पार्टी 'समाजवादी पार्टी' (SP) के झंडे लगा दिए। यह उनका विरोध दर्ज कराने का एक अनोखा और प्रतीकात्मक तरीका था।\r\n \r\n
- \r\n भाजपा कार्यकर्ताओं का हंगामा: जैसे ही दुकानों पर सपा के झंडे लगने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं में हड़कंप मच गया। वे भारी संख्या में मौके पर पहुंचे और व्यापारियों से बहस के बाद उन झंडों को उतरवा दिया।\r\n \r\n
- \r\n पुलिस की कार्रवाई: इस हंगामे के दौरान पुलिस ने शांति भंग करने के आरोप में लगभग चार व्यापारियों को हिरासत में ले लिया। हालांकि, बाद में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के थाने पहुंचने और भारी हंगामे के बाद पुलिस को उन्हें छोड़ना पड़ा।\r\n \r\n
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सपा कार्यकर्ता सुदीप जैन ने पुलिस की इस कार्रवाई पर तीखे सवाल उठाते हुए तंज कसा कि, "क्या सपा का झंडा कोई तालिबानी झंडा है, जिसे लगाने पर व्यापारियों को पुलिस हिरासत में ले रही है?"। यह घटना दर्शाती है कि ध्वस्तीकरण के डर ने व्यापारियों को सत्ता के खिलाफ कितना मुखर कर दिया है।
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क्या है 'मिक्स्ड लैंड यूज' (Mixed Land Use) का पेंच?
\r\n\r\nइस पूरी समस्या का समाधान क्या हो सकता है? नगर नियोजन विशेषज्ञों और व्यापारिक संगठनों के अनुसार, इसका एकमात्र व्यवहारिक समाधान 'मिक्स्ड लैंड यूज' (Mixed Land Use) नीति को लागू करना है।
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मिक्स्ड लैंड यूज क्या है?
\r\n\r\nमिक्स्ड लैंड यूज का अर्थ है किसी एक ही भूखंड या क्षेत्र में आवासीय (Residential) और व्यावसायिक (Commercial) दोनों गतिविधियों को कानूनी रूप से अनुमति देना। दिल्ली जैसे कई महानगरों में मास्टर प्लान के तहत इसे लागू किया गया है, जहां लोग ग्राउंड फ्लोर पर दुकान और ऊपर की मंजिलों पर रिहाइश रख सकते हैं।
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व्यापारियों की मांग है कि चूंकि यह बाजार 35 साल पुराना हो चुका है और शहर की अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा बन गया है, इसलिए सरकार को एक विशेष अध्यादेश या नीति लाकर सेंट्रल मार्केट को मिक्स्ड लैंड यूज घोषित कर देना चाहिए। उनका कहना है कि जो निर्माण हो चुके हैं, उन्हें कम्पाउंडिंग फीस (Compounding Fee / शमन शुल्क) लेकर वैध कर दिया जाए। पूर्व में आवास एवं विकास परिषद के अधिकारियों से मुलाकात के दौरान व्यापारियों को यह सलाह भी दी गई थी कि वे स्वयं अपने आगे बढ़ाए गए 10 से 12 फुट के अवैध निर्माण को तोड़ लें और बाकी हिस्से के शमन (Compounding) के लिए नई आवास नीति के तहत आवेदन करें। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद अधिकारी भी अब बेबस नजर आ रहे हैं।
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प्रशासनिक लापरवाही: 67 अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज
\r\n\r\nइस मेरठ सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण के मामले में केवल व्यापारी ही दोषी नहीं हैं। सवाल यह भी उठता है कि जब पिछले 3 दशकों में ये अवैध कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बन रहे थे, तब विकास प्राधिकरण और आवास विकास परिषद के अधिकारी क्या कर रहे थे?
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सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी बिंदु पर कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके परिणामस्वरूप, प्रशासन ने उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की है, जिनके कार्यकाल में ये अवैध निर्माण हुए। मामले में अब तक लापरवाही बरतने वाले 67 अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की जा चुकी है। यह एक स्पष्ट संदेश है कि भ्रष्टाचार और आंखों पर पट्टी बांधकर किए गए विकास का खामियाजा अंततः सभी को भुगतना पड़ता है।
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राहत की उम्मीद में जनप्रतिनिधियों और राष्ट्रपति से गुहार
\r\n\r\nचारों तरफ से कानूनी रास्ते बंद होते देख व्यापारी अब अंतिम उम्मीद के रूप में शासन और प्रशासन के शीर्ष स्तर पर गुहार लगा रहे हैं।
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व्यापारी संघ के नेता जनप्रतिनिधियों के माध्यम से उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव (Chief Secretary) और भारत की महामहिम राष्ट्रपति (President of India) तक अपना ज्ञापन भेजने की तैयारी कर रहे हैं। व्यापारियों की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
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- \r\n मानवीय दृष्टिकोण: व्यापारियों का कहना है कि न्याय करते समय मानवीय दृष्टिकोण (Humanitarian Approach) अपनाया जाए। यदि दुकानें टूट गईं, तो हजारों परिवारों के सामने रोटी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n नई आवास नीति का लाभ: राज्य सरकार नई आवास नीति में संशोधन करके इस 35 वर्ष पुराने बाजार को संरक्षित करे।\r\n \r\n
- \r\n स्ट्रीट वेंडिंग जोन: जो छोटे दुकानदार हैं, उनके पुनर्वास के लिए सरकार कोई वैकल्पिक व्यवस्था या अस्थायी कैनोपी (Canopy) की अनुमति प्रदान करे, जैसा कि स्थानीय सांसद अरुण गोविल और सीएम योगी से बातचीत के बाद अक्टूबर 2025 में अस्थायी तौर पर तय हुआ था।\r\n \r\n
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ध्वस्तीकरण का व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
\r\n\r\nमेरठ सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण मात्र ईंट और पत्थर गिरने की घटना नहीं है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र की अर्थव्यवस्था को झकझोरने वाला कदम है।
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- \r\n पूंजी का विनाश: दुकानों की साज-सज्जा, इंटीरियर और माल पर लगाया गया करोड़ों रुपये का निवेश रातों-रात शून्य हो गया है। व्यापारी खुद अपनी कीमती फिटिंग्स कौड़ियों के भाव बेच रहे हैं।\r\n \r\n
- \r\n रोजगार का संकट: एक दुकान या शोरूम में मालिक के अलावा 4 से 10 कर्मचारी काम करते हैं (जैसे सेल्समैन, सफाई कर्मचारी, एकाउंटेंट)। इन दुकानों के बंद होने से हजारों युवा बेरोजगार हो रहे हैं।\r\n \r\n
- \r\n मानसिक अवसाद: अपने जीवन भर की कमाई को टूटते हुए देखना किसी भी व्यक्ति के लिए गहरा मानसिक आघात है। कई व्यापारी डिप्रेशन (Depression) का शिकार हो रहे हैं, क्योंकि बैंक के कर्ज और परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर हैं।\r\n \r\n
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मेरठ की सेंट्रल मार्केट में पसरा सन्नाटा और हर गुजरते दिन के साथ बदलती तस्वीर पूरे शहरवासियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। मेरठ सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण का यह पूरा घटनाक्रम हमारे सिस्टम की उस बड़ी खामी को उजागर करता है, जहां पहले दशकों तक अवैध निर्माण होने दिया जाता है, और फिर अचानक कानून का डंडा चलने पर आम नागरिक की पूरी जिंदगी सड़क पर आ जाती है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश कानून के शासन (Rule of Law) को स्थापित करने के लिए आवश्यक है, लेकिन राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इस कार्रवाई के दौरान मानवीय संवेदनाएं पूरी तरह से न कुचली जाएं। आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई किस दिशा में जाती है, क्या व्यापारियों को 'मिक्स्ड लैंड यूज' या शमन नीति के तहत कोई संजीवनी मिलेगी, या 17 मार्च 2026 की डेडलाइन से पहले बाजार पूरी तरह मलबे में तब्दील हो जाएगा? इस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के बाद मेरठ के प्रसिद्ध शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट पर ध्वस्तीकरण की तलवार लटक रही है। अदालत ने 6 सप्ताह के भीतर 1400 से अधिक अवैध कमर्शियल निर्माणों को गिराने का अल्टीमेटम दिया है। खौफजदा व्यापारी नुकसान से बचने के लिए खुद ही दुकानों के शटर, लाइटें और छज्जे तोड़कर 'बिकाऊ है' के पोस्टर लगा रहे हैं और इमारतों को उनके मूल आवासीय स्वरूप में लौटाने की कोशिश कर रहे हैं। कार्रवाई में तेजी आने का आरोप लगाते हुए व्यापारियों ने एक आरटीआई कार्यकर्ता के खिलाफ एफआईआर की तहरीर दी है। स्थानीय भाजपा नेताओं से मदद न मिलने पर व्यापारियों ने अपनी दुकानों पर सपा के झंडे लगाकर विरोध जताया था। हजारों परिवारों की रोजी-रोटी बचाने के लिए व्यापारी अब राष्ट्रपति और मुख्य सचिव से गुहार लगा रहे हैं, जबकि प्रशासन 17 मार्च तक कोर्ट में अपनी कार्रवाई की रिपोर्ट सौंपने की तैयारी कर रहा है।
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