उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर का पॉश इलाका शास्त्री नगर इन दिनों किसी पुलिस छावनी से कम नजर नहीं आ रहा है। यहां के सेंट्रल मार्केट (सेक्टर-2) में दशकों से जमे अतिक्रमण और अवैध व्यावसायिक निर्माण पर जब सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा चला, तो जमीन पर एक ऐसा भूचाल आ गया है जिसने प्रशासन और स्थानीय जनता को आमने-सामने ला खड़ा किया है। उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (UP Housing and Development Board) की टीमें जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कराने और नोटिस चस्पा करने पहुंचीं, तो उन्हें महिलाओं के उस रौद्र रूप का सामना करना पड़ा जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।READ ALSO:-अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका: मिडिल ईस्ट की आग में झुलसा 'रुपया', इतिहास में पहली बार डॉलर के आगे 95.20 पर हुआ धड़ाम; क्या 98 तक गिरेगी कीमत?
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यह लड़ाई अब सिर्फ दुकानों को बचाने की नहीं रह गई है, बल्कि यह अपने सिर की छत बचाने की जद्दोजहद बन चुकी है। 70 करोड़ रुपये की सरकारी वसूली, 14 लाख रुपये के गायब चंदे और 35 साल पुरानी एक रंजिश ने इस मामले को उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा हॉट-टॉपिक बना दिया है।
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दीवारों से फाड़े गए सरकारी नोटिस, महिलाओं की दो टूक: "जान दे देंगे, पर मकान नहीं"

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गुरुवार का दिन सेक्टर-2 के लिए बेहद तनावपूर्ण रहा। आवास विकास की टीम जैसे ही अपने हाथों में सीलिंग और 'सेटबैक' (खाली जगह छोड़ने) के नोटिस लेकर पहुंची, स्थानीय महिलाएं सड़कों पर उतर आईं। आक्रोश इस कदर हावी था कि महिलाओं ने न केवल टीम का रास्ता रोका, बल्कि दीवारों पर चिपकाए गए सरकारी नोटिसों को सरेआम फाड़कर हवा में उड़ा दिया।
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हंगामे की सूचना मिलते ही भारी पुलिस बल के साथ एसपी सिटी विनायक गोपाल भोसले, सीओ सिविल लाइन सुचिता सिंह और नौचंदी थाना प्रभारी मौके पर पहुंचे। उन्होंने महिलाओं को कानूनी पेचीदगियों का हवाला देकर समझाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन महिलाओं ने एक सुर में कहा कि "किसी भी कीमत पर हम अपने प्रतिष्ठानों और घरों पर नोटिस नहीं लगने देंगे।"
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प्रदर्शन के दौरान माहौल उस वक्त और भी ज्यादा भावुक और तनावपूर्ण हो गया, जब मीनू नाम की एक महिला की अचानक तबीयत बिगड़ गई। आनन-फानन में अन्य महिलाओं ने उन्हें संभाला। पुलिस और प्रशासन की सख्ती के बावजूद महिलाओं का हौसला नहीं टूटा और मजबूरन आवास विकास की टीम को बैरंग लौटना पड़ा।
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"जनप्रतिनिधियों ने दिया धोखा": बंगाल चुनाव का भी उठा मुद्दा

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इन प्रदर्शनकारी महिलाओं की आंखों में सिर्फ गुस्सा नहीं है, बल्कि एक गहरा धोखा खाने का दर्द भी है। महिलाओं ने खुलेआम आरोप लगाया है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नेताओं ने उन्हें आश्वासन की घुट्टी पिलाई थी। उनका कहना है कि 15 दिनों तक चले उनके धरने को सांसद अरुण गोविल के आश्वासन के बाद समाप्त कराया गया था।
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महिलाओं का गंभीर आरोप है कि बंगाल चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के नाम पर सरकार ने उन्हें झूठा भरोसा दिया था और अब चुनाव बीत जाने के बाद उनके साथ पीठ में छुरा घोंपने जैसा काम किया जा रहा है। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनके मकान महज 35 से 40 वर्ग मीटर के छोटे से क्षेत्रफल में बने हैं। अगर वे आवास विकास के नए नियमों के तहत 1 मीटर का 'सेटबैक' भी छोड़ती हैं, तो उनके आशियाने पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएंगे और वे सड़क पर आ जाएंगी।
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सुप्रीम कोर्ट का वह सख्त आदेश, जिसने बदल दी सेंट्रल मार्केट की तस्वीर

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इस पूरे बवाल की पटकथा दिल्ली में स्थित देश की सर्वोच्च अदालत से लिखी गई है।
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    6 और 8 अप्रैल का एक्शन: 6 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने आवास विकास को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सेंट्रल मार्केट क्षेत्र की 44 चिन्हित अवैध संपत्तियों को तुरंत सील किया जाए। इसके बाद 8 अप्रैल को आवास विकास ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए 44 संपत्तियों पर ताला जड़ दिया।
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    859 संपत्तियों पर गिरी गाज: 9 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट पेश होने के बाद, अदालत ने और भी कड़ा रुख अपनाया। आदेश दिया गया कि 2 महीने के भीतर सभी 859 आवासीय संपत्तियों में चल रही 'कमर्शियल' गतिविधियों को पूरी तरह से बंद कराया जाए और आवासीय भवनों के लिए भी 'सेटबैक' छोड़ना अनिवार्य किया जाए।
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उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद के उप आवास आयुक्त अनिल कुमार सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश साफ हैं। नोटिस तैयार किए जा रहे हैं और इनके वितरण के बाद संपत्ति स्वामी को सिर्फ 15 दिन की मोहलत मिलेगी। 16वें दिन से परिषद अपना एक्शन शुरू कर देगा।
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सेटबैक का गणित: आखिर छोटे मकानों पर क्यों मंडरा रहा है खतरा?

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सेंट्रल मार्केट में पिछले काफी समय से यह अफवाह फैली थी कि 60 मीटर तक के आवासों को 'सेटबैक' के नियमों से छूट मिलेगी। लेकिन विभागीय सूत्रों ने साफ कर दिया है कि नियम सबके लिए बराबर हैं। अगर सेटबैक नहीं छोड़ा, तो छोटे मकानों पर भी बुलडोजर चलना तय है। आइए समझते हैं कि आवास विकास के नियम क्या कहते हैं:
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आवासीय (Residential) संपत्तियों के लिए नियम:

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    150 वर्ग मीटर तक: घर के सामने (फ्रंट सेटबैक) 1 मीटर जगह छोड़नी होगी।
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    151 से 300 वर्ग मीटर तक: फ्रंट सेटबैक 3 मीटर और घर के पीछे (रियर सेटबैक) 1.5 मीटर जगह छोड़नी अनिवार्य है।
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    300 से 500 वर्ग मीटर तक: फ्रंट सेटबैक 3 मीटर और रियर सेटबैक 3 मीटर छोड़ना होगा।
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व्यावसायिक (Commercial) संपत्तियों के लिए नियम:

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    100 वर्ग मीटर तक: फ्रंट सेटबैक 1.5 मीटर।
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    101 से 300 वर्ग मीटर तक: फ्रंट सेटबैक 3 मीटर।
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    301 से 1000 वर्ग मीटर तक: फ्रंट सेटबैक 4.5 मीटर और रियर सेटबैक 3 मीटर।
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चूंकि सेक्टर-2 के ज्यादातर मकान 100 वर्ग मीटर से कम के हैं, इसलिए वहां के निवासियों के लिए 1 मीटर या 1.5 मीटर जगह छोड़ना भी उनके पूरे मकान के ढांचे को तबाह कर देगा।
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70 करोड़ रुपये का 'महा-घोटाला': आवास विकास ने सुप्रीम कोर्ट से क्या छिपाया?

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इस पूरे प्रकरण में व्यापारियों के आक्रोश का सबसे बड़ा कारण 70 करोड़ रुपये की वह भारी-भरकम राशि है, जो उनसे आवास विकास ने वसूली थी। 27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, आवास विकास ने एक आदेश जारी किया था कि 36,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से शमन शुल्क (Compounding Fee) जमा करके आवासीय भूखंड को कमर्शियल में बदला जा सकता है। अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए, सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों ने कर्ज लेकर और जेवर बेचकर लगभग 70 करोड़ रुपये आवास विकास के खजाने में जमा कर दिए।
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अब व्यापारियों का सवाल यह है कि जब आवास विकास ने 70 करोड़ रुपये ले लिए, तो उसने सुप्रीम कोर्ट में यह बात क्यों नहीं बताई? एडीएम सिटी बृजेश कुमार सिंह का कहना है कि सीलिंग की कार्रवाई और भू-उपयोग बदलने का मामला दोनों अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा कि जो व्यापारी पैसा वापस लेना चाहते हैं, प्रशासन उनकी मदद करेगा। लेकिन व्यापारियों का मानना है कि यह उनके साथ किया गया एक बहुत बड़ा सरकारी धोखा है।
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अपनों ने ही लूटा? 14 लाख के चंदे पर व्यापारियों में फूट

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सरकारी सिस्टम से लड़ रहे व्यापारियों के बीच अब एक 'गृहयुद्ध' भी छिड़ गया है। इस पूरी कानूनी लड़ाई को लड़ने और आंदोलन को तेज करने के नाम पर सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों से करीब 14 लाख रुपये का चंदा इकट्ठा किया गया था। अब व्यापारियों द्वारा बनाए गए व्हाट्सएप ग्रुप्स में बवाल मचा हुआ है। आम व्यापारी उन "सफेदपोश" नेताओं से इस 14 लाख रुपये का हिसाब मांग रहे हैं। हिसाब न मिलने के कारण आंदोलन की पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा पर भी बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
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फ्लैशबैक 1990: एक 'थप्पड़' की गूंज, जो 35 साल बाद 859 परिवारों पर कहर बनकर टूटी

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सेंट्रल मार्केट का यह विवाद एक रात में नहीं उपजा है। इसके तार आज से 35 साल पीछे, वर्ष 1990 से जुड़े हैं। उस दौर में आवास विकास को सूचना मिली थी कि आवासीय भूखंड संख्या 661/6 पर एक अवैध कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बन रहा है। जब तत्कालीन अधीक्षण अभियंता अरविंद कुमार वहां निर्माण कार्य रुकवाने पहुंचे, तो स्थानीय व्यापारियों ने दबंगई दिखाते हुए हंगामा किया और सरेआम अधीक्षण अभियंता को थप्पड़ जड़ दिया था।
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नौचंदी थाने में उस थप्पड़ कांड की एफआईआर दर्ज हुई। वह थप्पड़ आवास विकास के अधिकारियों के स्वाभिमान पर लगा था। इसके बाद से ही आवास विकास ने इस मार्केट को अपने रडार पर ले लिया। कई बार अवैध निर्माण गिराने की कोशिश हुई, लेकिन राजनीतिक दबाव आड़े आता रहा। 2014 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इमारत गिराने का आदेश दिया, जिसे व्यापारियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अंततः, 17 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उस 661/6 कॉम्प्लेक्स सहित सभी अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने का ऐतिहासिक आदेश दिया। 25 अक्टूबर 2025 को 22 दुकानों वाले उस कॉम्प्लेक्स को जमींदोज कर दिया गया था।
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आगे क्या? मेरठ के शास्त्री नगर का यह मामला अब केवल एक अतिक्रमण हटाने का अभियान नहीं रह गया है। यह 35 साल पुराने 'कर्मों के फल', प्रशासनिक लालफीताशाही, नेताओं के झूठे वादों और आम आदमी की जीवन भर की कमाई के लुटने की एक बेहद जटिल और दुखद दास्तान बन गया है। 15 दिन के अल्टीमेटम के बाद जब बुलडोजर सड़कों पर उतरेंगे, तो हालात और भी बेकाबू हो सकते हैं। प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी, वहीं महिलाओं ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। पूरे उत्तर प्रदेश की नजरें अब मेरठ के सेंट्रल मार्केट पर टिकी हैं।
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