भारत में एक सरकारी नौकरी पाना केवल रोजगार हासिल करना नहीं है, बल्कि यह एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और जीवन भर के स्थायित्व का प्रतीक माना जाता है। इसी सपने और मजबूरी का फायदा उठाकर देश में शिक्षा और रोजगार के नाम पर कई बड़े सिंडिकेट सक्रिय हो गए हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर (NCR) क्षेत्र में सक्रिय एक ऐसे ही बेहद शातिर और हाई-टेक गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जिसने सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर दर्जनों बेरोजगार युवाओं की जिंदगी भर की जमा-पूंजी लूट ली। एसटीएफ (STF) के खुलासे ने पूरे प्रशासनिक अमले और युवाओं को हैरत में डाल दिया है। यह गिरोह इतना पेशेवर था कि वह शिकार को फंसाने के लिए बाकायदा दिल्ली के बड़े सरकारी मंत्रालयों और दफ्तरों तक का इस्तेमाल करता था।
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एसटीएफ (STF) का खुलासा: क्या कहते हैं अधिकारी? इस पूरे सनसनीखेज रैकेट का भंडाफोड़ करते हुए एसटीएफ के वरिष्ठ अधिकारी बृजेश कुमार सिंह ने मीडिया को कई चौंकाने वाली जानकारियां दी हैं। बृजेश कुमार सिंह के अनुसार, इस गिरोह के सदस्य बाकायदा एक सुसंगठित नेटवर्क की तरह काम करते थे। इनका मुख्य काम ही उन युवाओं की तलाश करना था जो सालों से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं और किसी भी कीमत पर रोजगार पाना चाहते हैं। अधिकारी ने बताया, "इन लोगों का एक पूरा गिरोह है जो दिन-रात ऐसे लोगों की तलाश में घूमता रहता है, जिनका सरकारी नौकरी पाने का सपना होता है। वे पहले बड़ी ही चालाकी से युवाओं को अपनी बातों के जाल में फंसाते हैं और फिर उनके दिमाग में यह बात डाल देते हैं कि उनका सीधा संपर्क मंत्रालयों के उच्च अधिकारियों से है।"
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इन बड़े सरकारी विभागों को बनाया था ठगी का हथियार इस गिरोह की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि ये कोई छोटी-मोटी नौकरी का झांसा नहीं देते थे। युवाओं को आकर्षित करने के लिए इन्होंने भारत सरकार और राज्य सरकारों के सबसे प्रतिष्ठित विभागों को अपना ढाल बनाया था। एसटीएफ की जांच में सामने आया है कि जालसाज मुख्य रूप से भारतीय रेलवे (Indian Railways), भारतीय सेना (Indian Army), भारतीय डाक विभाग (Indian Post Office), वनरक्षक (Forest Guard), दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA - Delhi Development Authority), और दिल्ली पावर कॉरपोरेशन (Delhi Power Corporation) जैसे विभागों में सीधी भर्ती और बैक-डोर एंट्री का सपना दिखाते थे। इन प्रतिष्ठित विभागों का नाम सुनते ही युवा आसानी से उनके झांसे में आ जाते थे। इसके एवज में गिरोह प्रत्येक कैंडिडेट से 10 लाख रुपये तक की भारी-भरकम रकम वसूलता था।
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ठगी का मास्टरमाइंड तरीका (Modus Operandi): कैसे जीतते थे भरोसा? कोई भी व्यक्ति आसानी से 10 लाख रुपये किसी अनजान को नहीं दे सकता। इस बात को यह गिरोह बखूबी जानता था। इसलिए, इन्होंने युवाओं का भरोसा जीतने के लिए एक ऐसा 'कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मैकेनिज्म' तैयार किया था, जिसे देखकर अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी गच्चा खा जाएं।
\r\n\r\nएसटीएफ की जांच रिपोर्ट की मानें तो यह गिरोह बेहद शातिर है। कैंडिडेट को पूरी तरह भरोसा दिलाने के लिए वे उन्हें केवल फोन पर या किसी होटल में नहीं मिलते थे, बल्कि सीधे दिल्ली स्थित उस सरकारी विभाग के मुख्यालय या दफ्तर में बुलाते थे, जिसका फर्जी जॉइनिंग लेटर उन्हें थमाना होता था। उदाहरण के लिए, यदि किसी को DDA में नौकरी का झांसा दिया गया है, तो उसे DDA के असली ऑफिस में बुलाया जाता था। दफ्तर के बाहर या कैंटीन में बैठकर ये जालसाज अंदर से कोई फाइल लाने का नाटक करते थे, वहां मौजूद कुछ कर्मचारियों से हाथ मिलाते थे (जो अक्सर अज्ञानतावश या छोटी-मोटी रिश्वत के लालच में ऐसा करते थे), जिससे शिकार को यह पूरा यकीन हो जाता था कि इस व्यक्ति की विभाग में बहुत गहरी पकड़ है।
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इंटर्नशिप की आड़ में फर्जी ट्रेनिंग का खेल गिरोह की शातिरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे कैंडिडेट को दो-तीन बार उस संबंधित विभाग में बुलाकर यह एहसास करा देते थे कि उनकी चयन प्रक्रिया जारी है। बात केवल दफ्तर के चक्कर लगवाने तक ही सीमित नहीं थी। कई जगह तो यह गिरोह कुछ भ्रष्ट तत्वों से मिलीभगत कर या सुरक्षा की कमियों का फायदा उठाकर युवाओं को इंटर्नशिप की आड़ में फर्जी ट्रेनिंग भी करा देता था। युवाओं को कुछ डमी फाइलें पकड़ा दी जाती थीं और उन्हें बताया जाता था कि उनकी 'प्रोबेशनरी ट्रेनिंग' शुरू हो गई है। जब युवा यह सब अपनी आंखों से देखता था, तो वह बिना कोई सवाल किए अपने परिवार के गहने बेचकर या कर्ज लेकर 10 लाख रुपये की रकम इन ठगों के हवाले कर देता था।
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ईमेल पर आता था फर्जी जॉइनिंग लेटर और फिर टूटता था सपना कैंडिडेट को पूरी तरह से विश्वास में लेने और उससे पूरी रकम वसूलने के बाद, यह सिंडिकेट अपने अंतिम चरण को अंजाम देता था। एसटीएफ के अनुसार, पैसे ऐंठने के बाद गिरोह बड़ी ही सफाई से एक बेहद असली दिखने वाला, सरकारी मुहर और फर्जी डिजिटल हस्ताक्षर युक्त जॉइनिंग लेटर तैयार करता था और उसे कैंडिडेट की ईमेल आईडी पर भेज देता था। यह ईमेल भी ऐसे सर्वर या डोमेन से भेजा जाता था जो प्रथम दृष्टया सरकारी प्रतीत होता था।
\r\n\r\nयुवा अपने हाथ में जॉइनिंग लेटर देखकर जश्न मनाने लगते थे। लेकिन यह जॉइनिंग लेटर पूरी तरह से फर्जी है, इस खौफनाक सच्चाई का पता पीड़ित को उस वक्त चलता था, जब वह पूरी तैयारी के साथ अपना लेटर लेकर उस विभाग के संबंधित एचआर या प्रशासन कार्यालय में ड्यूटी ज्वाइन करने पहुंचता था। वहां मौजूद अधिकारी जब उस लेटर को देखकर कहते थे कि "यह तो फर्जी है और ऐसी कोई भर्ती हमारे यहां निकली ही नहीं है," तब युवाओं के पैरों तले जमीन खिसक जाती थी।
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करोड़ों का साम्राज्य: 2 वर्ष में 25 से ज्यादा शिकार एसटीएफ की अब तक की सघन पूछताछ और जांच में यह बात निकलकर सामने आई है कि यह कोई नया गिरोह नहीं है। पिछले लगभग 2 वर्षों से यह सिंडिकेट पूरी सक्रियता के साथ दिल्ली-एनसीआर और आसपास के राज्यों में अपना जाल बिछाए हुए था। इस छोटी सी अवधि में ही यह गिरोह 20 से 25 भोले-भाले युवाओं को अपना शिकार बना चुका है। अगर प्रति कैंडिडेट 10 लाख रुपये के औसत से गणना की जाए, तो यह घोटाला कम से कम 2 से 2.5 करोड़ रुपये का बैठता है। पुलिस अब इन ठगों के बैंक खातों, कॉल डिटेल्स और उन संपत्तियों की जांच कर रही है जो इन्होंने इस काली कमाई से जुटाई हैं।
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खबरीलाल मीडिया की युवाओं से अपील यह घटना एक बहुत बड़ा सबक है। सरकारी नौकरी कभी भी बैक-डोर एंट्री, पैसे देकर या किसी बिचौलिए के माध्यम से नहीं मिलती है। भर्ती की सभी प्रक्रियाएं संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB) या राज्य स्तरीय आयोगों द्वारा पारदर्शी तरीके से पूरी की जाती हैं। युवाओं को यह समझना होगा कि शॉर्टकट के चक्कर में वे न केवल अपना पैसा गंवाते हैं, बल्कि उनका पूरा करियर भी तबाह हो जाता है। किसी भी विभाग का जॉइनिंग लेटर मिलने पर उसे सीधे विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या दफ्तर जाकर वेरीफाई जरूर करें। एसटीएफ की यह कार्रवाई निश्चित रूप से ऐसे अन्य गिरोहों के लिए एक कड़ा संदेश है, लेकिन असली बचाव युवाओं की अपनी जागरूकता में ही छिपा है।
Sabse pehle comment karne wale banein.