उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाने वाले चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU), मेरठ में इन दिनों एक बड़ा और गंभीर मामला सामने आया है। इस सीसीएसयू मेरठ विवाद ने विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच खलबली मचा दी है। सांख्यिकी (STATICS) विभाग के वरिष्ठ शिक्षक डॉ. हरे कृष्णा पर एक विश्वविद्यालय कर्मी शंकर सिंह नेगी ने मानसिक उत्पीड़न, आर्थिक भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और जानलेवा हमला करवाने जैसे बेहद संगीन आरोप लगाए हैं। न्याय न मिलने और अपनी जान का खतरा बताते हुए पीड़ित कर्मचारी शंकर सिंह नेगी अब विश्वविद्यालय परिसर में ही आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने उच्च शिक्षा के इस मंदिर में चल रही कथित अनियमितताओं की पोल खोलकर रख दी है, जिससे शिक्षा जगत में हड़कंप मचा हुआ है।READ ALSO:-खौफनाक वारदात: 'तुम्हारे बेटे को खत्म कर दिया, लाश ले जाओ...' फोन पर गूंजती रही चीखें, सोनीपत में मेरठ के युवक की बेरहमी से हत्या
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मानसिक उत्पीड़न और अभद्र भाषा का गंभीर आरोप

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अनशन पर बैठे पीड़ित कर्मी शंकर सिंह नेगी का सबसे पहला और मुख्य आरोप सांख्यिकी विभाग के शिक्षक डॉ. हरे कृष्णा के व्यवहार को लेकर है। उनका कहना है कि डॉ. कृष्णा द्वारा कर्मचारियों के साथ लगातार अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। एक शैक्षणिक संस्थान में, जहां शिक्षकों से आदर्श व्यवहार की अपेक्षा की जाती है, वहां इस तरह के आरोप विश्वविद्यालय की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं। नेगी का कहना है कि उन्होंने इसकी शिकायत पहले भी की थी, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिसके चलते उन्हें अपनी आवाज आला अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए आमरण अनशन जैसे कठोर कदम को उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह सीसीएसयू मेरठ विवाद केवल एक कर्मचारी का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की कार्यसंस्कृति पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
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U.F.M (नकल) और स्क्रूटनी विभाग पर 20 सालों से एकाधिकार

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शिकायतकर्ता नेगी ने अपने ज्ञापन में एक बहुत ही हैरान करने वाला तथ्य सामने रखा है। उनका आरोप है कि डॉ. हरे कृष्णा को सांख्यिकी विभाग में पिछले 20 वर्षों से निरंतर U.F.M (Unfair Means / नकल) और कॉपियों की स्क्रूटनी (पुनर्मूल्यांकन) का प्रभारी (इंचार्ज) बनाया हुआ है। शिक्षा जगत के जानकारों का मानना है कि किसी भी संवेदनशील और गोपनीय विभाग में एक ही व्यक्ति का दो दशकों तक काबिज रहना प्रशासनिक पारदर्शिता के नियमों के खिलाफ है।
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नेगी ने विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार से पुरजोर मांग की है कि पिछले पांच वर्षों में डॉ. हरे कृष्णा के प्रभार के दौरान किए गए U.F.M (नकल) और स्क्रूटनी के कार्यों की एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। इससे यह साफ हो सकेगा कि क्या इतने लंबे समय तक इस पद पर रहते हुए किसी प्रकार की अनियमितता या छात्रों के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ तो नहीं किया गया है। 
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आउटसोर्सिंग के नाम पर सरकारी धन का कथित दुरुपयोग

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इस सीसीएसयू मेरठ विवाद में भ्रष्टाचार का एक और बेहद गंभीर आरोप सामने आया है, जो सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता से जुड़ा है। पीड़ित कर्मी के अनुसार, डॉ. हरे कृष्णा के निजी वाहन चालक दीपक और उसकी पत्नी पूजा (जो नगला भटटू के निवासी हैं) प्रोफेसर के घर में निजी तौर पर काम करते हैं। आरोप है कि इन दोनों को विश्वविद्यालय द्वारा अधिकृत एक आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से फर्जी तरीके से विश्वविद्यालय के पेरोल पर रखा गया है।
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शिकायत के मुताबिक, दीपक को तृतीय श्रेणी (Class III) और पूजा को चतुर्थ श्रेणी (Class IV) कर्मी के रूप में दर्शाकर पिछले दो वर्षों से विश्वविद्यालय के फंड से उनके वेतन का भुगतान कराया जा रहा है। नेगी का आरोप है कि यह सरासर पद का दुरुपयोग, मनमानी और विश्वविद्यालय को सीधा आर्थिक नुकसान पहुंचाना है। उन्होंने मांग की है कि इस वित्तीय घोटाले की तुरंत जांच कराई जाए और विश्वविद्यालय को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई डॉ. हरे कृष्णा के वेतन या संपत्ति से की जाए।
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जानलेवा हमला और फर्जी दस्तावेजों पर नियुक्तियों का पर्दाफाश

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शिकायत का सबसे खौफनाक हिस्सा वह है जिसमें शंकर सिंह नेगी ने अपनी जान को खतरा बताया है। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय के कुछ चुनिंदा प्रभावशाली लोग, जो उच्च अधिकारियों के बेहद करीब हैं, वे विश्वविद्यालय को "दीमक की तरह खोखला" कर रहे हैं। नेगी का दावा है कि इन भ्रष्टाचारियों की पोल खोलने के कारण उन पर अब तक दो बार घातक और जानलेवा हमले कराए जा चुके हैं, जिनमें उन्हें गंभीर चोटें भी आई हैं।
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इसके साथ ही, नेगी ने कई अधिकारियों और कर्मचारियों पर बिना योग्यता के फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ऊंचे पदों और मनचाहे वेतन पर काम करने का आरोप लगाया है। इन नामों में मुख्य रूप से डॉ. हरे कृष्णा, विश्वविद्यालय अभियंता मनीष मिश्रा, संदीप अग्रवाल, धर्मेन्द्र (बी-टैक, जिन पर पूर्व में गंभीर आरोप रहे हैं), ओमेन्द्र, संजीव शर्मा और उनके अन्य साथी शामिल हैं। पीड़ित नेगी ने मांग की है कि इन सभी अधिकारियों के शैक्षणिक दस्तावेजों और इनकी आय से अधिक संपत्ति की निष्पक्ष जांच कराई जाए। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में उनके साथ कोई दुर्घटना होती है या उनके जीवन को कोई हानि पहुंचती है, तो उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी इन्हीं अधिकारियों की होगी।
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प्रोफेसर का बचाव और प्रशासन की भूमिका

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ताजा जानकारी के अनुसार, इस पूरे सीसीएसयू मेरठ विवाद पर डॉ. हरे कृष्णा ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि शंकर सिंह नेगी मानसिक रूप से परेशान हैं और बिना किसी साक्ष्य के केवल चर्चा में आने के लिए एक प्रोफेसर को निशाना बना रहे हैं। हालांकि, मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा परिषद के अधिकारियों ने भी कुलसचिव को पत्र भेजकर इस प्रकरण में निष्पक्ष जांच की मांग की है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन और शासन इस मामले में क्या कदम उठाता है। क्या एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन किया जाएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? 
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यह पूरा सीसीएसयू मेरठ विवाद न केवल एक विश्वविद्यालय के आंतरिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है, बल्कि यह उच्च शिक्षा प्रणाली में व्याप्त प्रशासनिक खामियों को भी उजागर करता है। शंकर सिंह नेगी का आमरण अनशन इस बात का प्रतीक है कि जब व्यवस्था से सुनवाई नहीं होती, तो न्याय की गुहार लगाने के लिए व्यक्ति को अपने प्राणों को संकट में डालना पड़ता है। प्रशासन को चाहिए कि वह इस मामले की एक पारदर्शी और उच्च स्तरीय जांच कराए। यदि आरोप सच पाए जाते हैं, तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, और यदि आरोप झूठे हैं, तो स्थिति स्पष्ट कर विश्वविद्यालय की साख को बहाल किया जाना चाहिए।
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सीसीएसयू मेरठ में कर्मचारी शंकर सिंह नेगी द्वारा सांख्यिकी विभाग के प्रो. हरे कृष्णा और अन्य अधिकारियों के खिलाफ आमरण अनशन शुरू किया गया है। नेगी ने मानसिक उत्पीड़न, UFM और स्क्रूटनी में 20 साल से एकाधिकार, घरेलू नौकरों को विश्वविद्यालय के खर्च पर आउटसोर्सिंग से वेतन दिलाने, और फर्जी दस्तावेजों के जरिए नियुक्तियों जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। इसके अलावा, उन्होंने अपने ऊपर हुए जानलेवा हमलों का जिक्र करते हुए भविष्य में किसी भी अनहोनी के लिए इन्हीं अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। यह विवाद अब शिक्षा जगत में चर्चा का विषय बन गया है और निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है।
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