खबरीलाल डेस्क
ख़बरीलाल न्यूज़ डेस्क, मेरठ (06 अप्रैल 2026): उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद के सबसे पॉश और व्यस्ततम बाजारों में शुमार 'शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट' (Shastri Nagar Central Market) का अस्तित्व अब अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) के एक बेहद सख्त और त्वरित आदेश ने पूरे प्रशासनिक अमले और स्थानीय व्यापारियों की नींद उड़ा दी है। सोमवार को हुई एक अहम सुनवाई में अदालत ने प्रशासन को स्पष्ट और कड़ा अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि सेंट्रल मार्केट क्षेत्र में चिन्हित की गई 44 संपत्तियों को अगले 24 घंटे के अंदर सील कर दिया जाए।READ ALSO:-कानपुर-मेरठ किडनी कांड का सबसे बड़ा भंडाफोड़: 500-500 की गड्डियों से खेलने वाला मास्टरमाइंड परवेज सैफी गिरफ्तार, खुलेंगे कई सफेदपोशों के राज
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सुप्रीम कोर्ट के इस सीधे और स्पष्ट आदेश के बाद बाजार में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया है। प्रशासनिक बुलडोजर और सीलिंग की कार्रवाई के खौफ से दहशतजदा व्यापारियों ने प्रशासन के पहुंचने से पहले ही अपनी-अपनी दुकानों और प्रतिष्ठानों को खाली करना शुरू कर दिया है।
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दहशत का माहौल: "बचा लो जो बच सकता है"

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश आते ही सोमवार दोपहर बाद से सेंट्रल मार्केट का नजारा पूरी तरह से बदल गया। जहां कभी ग्राहकों की भारी भीड़ हुआ करती थी, वहां अब लोडिंग-अनलोडिंग करने वाले छोटे हाथी, पिकअप वैन और ट्रकों की लंबी कतारें लग गई हैं।
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व्यापारियों में भारी दहशत है। अपनी आंखों के सामने अपनी जीवनभर की पूंजी और कारोबार को उजड़ता देख व्यापारियों की आंखों में आंसू हैं। अपनी दुकानें खाली कर रहे कई व्यापारियों ने रुंधे गले से बताया कि, "प्रशासनिक सीलिंग की कार्रवाई होने के बाद दुकान के अंदर रखा लाखों रुपये का माल, फर्नीचर और मशीनरी सब कुछ फंस जाएगा। प्रशासन कब सील खोलेगा और सामान वापस मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। इसलिए हम सीलिंग की कार्रवाई से पहले ही अपना सारा कीमती सामान, स्टॉक और कैश काउंटर यहां से निकाल रहे हैं, ताकि बाद में हमें दोहरी आर्थिक मार और परेशानी का सामना न करना पड़े।"
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रडार पर सिर्फ दुकानें नहीं: स्कूल, अस्पताल और बैंक भी शामिल

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सुप्रीम कोर्ट की तलवार सिर्फ छोटे या मझोले दुकानदारों पर ही नहीं लटकी है, बल्कि रसूखदार संस्थानों पर भी गिरी है। अदालत द्वारा जिन 44 संपत्तियों को तत्काल प्रभाव से सील करने की सूची जारी की गई है, उनमें कई बड़े निजी स्कूल, नामी नर्सिंग होम/अस्पताल और राष्ट्रीयकृत व निजी बैंक भी शामिल हैं।
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अदालत का स्पष्ट मानना है कि आवासीय भूखंडों (Residential Plots) का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों (Commercial Activities) के लिए नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि इन प्रतिष्ठानों को तत्काल प्रभाव से वहां से शिफ्ट (Shift) किया जाए और उसके बाद सीलिंग की कार्रवाई पूरी की जाए। विशेषकर अस्पतालों में भर्ती मरीजों और स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने के निर्देश दिए गए हैं। जो दुकानें इन 44 संपत्तियों के दायरे या उसी कॉम्प्लेक्स में संचालित हो रही थीं, वे भी इस सीलिंग के सीधे निशाने पर आ गई हैं।
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सबसे बड़ा दर्द: 'शमन शुल्क' देने वाले और खुद तोड़ने वाले भी नपे

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इस पूरी कार्रवाई में सबसे ज्यादा मानसिक और आर्थिक रूप से वे व्यापारी टूट गए हैं, जिन्होंने प्रशासन के नियमों का पालन करते हुए खुद को बचाने की हर संभव कोशिश की थी।
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दरअसल, विवाद गहराने के बाद कई व्यापारियों ने भू-उपयोग (Land Use) बदलने या जुर्माने के तौर पर भारी-भरकम 'शमन शुल्क' (Compounding Fee) सरकारी खजाने में जमा कराया था। इतना ही नहीं, आवास एवं विकास परिषद (Awas Vikas Parishad) के आदेशों का पालन करते हुए कई व्यापारियों ने 'सेट बैक' (Setback) के नियमों के तहत अपनी दुकानों का आगे का हिस्सा खुद ही हथौड़े चलवाकर तोड़ दिया था, ताकि वे अपनी दुकान को निर्धारित सीमा तक पीछे हटाकर दोबारा बना सकें।
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व्यापारियों का कहना है कि उन्होंने अपने प्रतिष्ठानों को बचाने के लिए करोड़ों रुपये का शमन शुल्क जमा किया और अपनी दुकानें खुद तोड़ीं। लेकिन इसके बावजूद, जब सुप्रीम कोर्ट में 44 संपत्तियों की फाइनल सूची पेश की गई, तो उसमें उनका नाम भी शामिल था। इस बात ने व्यापारियों को गहरे सदमे में डाल दिया है। उनका सवाल है कि जब उन्होंने सरकारी जुर्माने भर दिए और सेटबैक छोड़ दिया, तो फिर उन्हें किस बात की सजा दी जा रही है?
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पूर्व कमिश्नर ऋषिकेश भास्कर यशोद का 'हलफनामा'

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इस पूरे प्रकरण में मेरठ के तत्कालीन मंडलायुक्त (कमिश्नर) ऋषिकेश भास्कर यशोद की भूमिका भी सुप्रीम कोर्ट के रडार पर आ गई थी। अदालत ने पूर्व कमिश्नर से सीधा जवाब तलब किया था कि आखिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट ध्वस्तीकरण (Demolition) आदेशों के खिलाफ जाकर ध्वस्तीकरण रोकने और सेंट्रल मार्केट को 'मार्केट स्ट्रीट' घोषित करने का आदेश किस अधिकार से जारी कर दिया था?
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सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान पूर्व कमिश्नर यशोद की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत हलफनामा (Affidavit) पेश किया गया। अपने बचाव में सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि, "जिस व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स को तोड़ने का आदेश दिया गया था, उस पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई तब तक पूरी की जा चुकी थी। उसके बाद, इलाके में बिगड़ती कानून-व्यवस्था और स्थानीय जनप्रतिनिधियों (विधायकों/सांसदों) की आम सहमति व जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए ही आगे की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई गई थी।" हालांकि, सुप्रीम कोर्ट उनके इस जवाब से कितना संतुष्ट है, यह आने वाले आदेशों में स्पष्ट होगा।
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कहाँ गए 'रहनुमा'? जनप्रतिनिधियों ने बना ली पूरी तरह दूरी

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आमतौर पर व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए सबसे आगे खड़े रहने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं की इस मामले में चुप्पी सबसे ज्यादा अखर रही है।
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सेंट्रल मार्केट के इस जीवन-मरण के संकट में सत्ताधारी पार्टी (भाजपा) के बड़े जनप्रतिनिधि हों या विपक्ष (सपा, रालोद, कांग्रेस) के कद्दावर नेता, सभी ने इस पूरे मामले से एक सुरक्षित दूरी बना ली है और कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।
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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नेताओं की इस 'चुप्पी' का सीधा कारण सुप्रीम कोर्ट का खौफ है। जिस सख्त अंदाज में सर्वोच्च अदालत ने मेरठ के पूर्व कमिश्नर जैसे आला अधिकारी को तलब कर लिया, उसे देखकर कोई भी नेता अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का जोखिम मोल नहीं लेना चाहता। सभी जन प्रतिनिधि इस बात से डरे हुए हैं कि उनका कोई भी बयान या विरोध प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना माना जा सकता है, जिससे उनका राजनीतिक करियर खतरे में पड़ सकता है।
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नेताओं की इस बेरुखी ने व्यापारियों को पूरी तरह से अकेला छोड़ दिया है। अब देखना यह है कि प्रशासन अगले 24 घंटों में इस बड़े सीलिंग अभियान को कैसे अंजाम देता है और क्या इन उजड़ते व्यापारियों को कहीं से कोई कानूनी संजीवनी मिल पाती है या नहीं। फिलहाल, सेंट्रल मार्केट में सिर्फ हथौड़ों की आवाज, भागदौड़ और एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है।