मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के व्यापारिक जगत में उस वक्त हड़कंप मच गया जब वस्तु एवं सेवा कर खुफिया महानिदेशालय (DGGI - Directorate General of GST Intelligence) की मेरठ जोनल यूनिट ने देश के सबसे बड़े कर अपवंचन (Tax Evasion) नेटवर्कों में से एक का भंडाफोड़ किया। यह मामला मेरठ डीजीजीआई 294 करोड़ जीएसटी घोटाला से जुड़ा है, जिसमें फर्जी और डमी फर्मों का मायाजाल बुनकर सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का चूना लगाया गया। न्यायालय विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेरठ की अदालत ने इस महाघोटाले के मुख्य आरोपी मौहम्मद आकिब को 14 दिन की न्यायिक हिरासत (रिमांड) में जेल भेज दिया है। यह कार्रवाई स्पष्ट संदेश देती है कि कर चोरों और फर्जीवाड़े के जरिए अर्थव्यवस्था को खोखला करने वाले सफेदपोश अपराधियों के खिलाफ सरकार अब 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की नीति पर काम कर रही है।READ ALSO:-मेरठ वालों के लिए बड़ी खुशखबरी: GAIL गैस ने PNG कनेक्शन किया 'फ्री', अब 30 नहीं बल्कि 7 से 15 दिन में घर पहुंचेगी पाइपलाइन!
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मेरठ जैसे बड़े व्यापारिक हब में जहां बेगमपुल, सदर और अन्य बाजारों के ईमानदार व्यापारी दिन-रात मेहनत करके देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे रहे हैं, वहीं कुछ शातिर सिंडिकेट फर्जी बिलिंग और बोगस फर्मों के सहारे करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा कर रहे हैं। इस विस्तृत और खोजी रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि आखिर यह पूरा मेरठ डीजीजीआई 294 करोड़ जीएसटी घोटाला कैसे काम करता था, आरोपी ने कैसे 276.16 करोड़ रुपये की फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) पास कराई, सरकारी खजाने से 18.22 करोड़ रुपये का नकद रिफंड कैसे लूटा, और अदालत में इस मामले को लेकर क्या-क्या दलीलें दी गईं।
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ऑपरेशन डीजीजीआई: 294 करोड़ के जीएसटी घोटाले का पर्दाफाश
\r\n\r\nडीजीजीआई (DGGI) मेरठ जोनल यूनिट लंबे समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर में चल रहे फर्जी बिलिंग सिंडिकेट्स पर नजर रखे हुए थी। डेटा एनालिटिक्स (Data Analytics), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रेड फ्लैग इंडिकेटर्स का उपयोग करते हुए अधिकारियों को कुछ ऐसी फर्मों का सुराग मिला, जो बिना किसी वास्तविक माल की आपूर्ति (Supply of Goods) के केवल कागजों पर करोड़ों रुपये का टर्नओवर दिखा रही थीं।
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गहन जांच के बाद, डीजीजीआई मेरठ के निरीक्षक संजय सिंह और उनकी टीम ने दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके में एक बड़ी छापेमारी को अंजाम दिया।
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- \r\n आरोपी की पहचान: इस पूरे सिंडिकेट के मास्टरमाइंड की पहचान मौहम्मद आकिब (पुत्र मौहम्मद रईस) के रूप में हुई।\r\n \r\n
- \r\n पता: आकिब पूर्वी दिल्ली के थाना लक्ष्मी नगर क्षेत्र के अंतर्गत एम-74/1, प्रथम तल, जगत राम पार्क का निवासी है।\r\n \r\n
- \r\n गिरफ्तारी का समय: डीजीजीआई की टीम ने पुख्ता सबूतों के आधार पर 25 मार्च 2026 की सुबह 7:40 बजे मौहम्मद आकिब को गिरफ्तार कर लिया।\r\n \r\n
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यह गिरफ्तारी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि यह उस पूरे नेटवर्क की कमर तोड़ने की शुरुआत है जो मेरठ डीजीजीआई 294 करोड़ जीएसटी घोटाला को अंजाम दे रहा था।
\r\n\r\nघोटाले का 'मोडस ऑपरेंडी' (Modus Operandi): कैसे बुना गया डमी फर्मों का जाल?
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आम जनता और ईमानदार करदाताओं के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर यह 294 करोड़ रुपये का आंकड़ा पहुंचा कैसे? मास्टरमाइंड मौहम्मद आकिब ने इस अपराध को अंजाम देने के लिए बेहद शातिराना तरीका अपनाया था।
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चरण 1: डमी प्रोपराइटर और फर्जी फर्मों का निर्माण
\r\n\r\nआरोपी ने सबसे पहले समाज के गरीब और अनपढ़ तबके के लोगों को कुछ पैसों का लालच देकर उनके पैन कार्ड (PAN Card), आधार कार्ड (Aadhar Card) और बैंक खाते के दस्तावेज हासिल किए। इन दस्तावेजों और फर्जी रेंट एग्रीमेंट (Fake Rent Agreement) के आधार पर जीएसटी पोर्टल पर अनेक 'डमी फर्में' (Dummy Firms) पंजीकृत कराई गईं। कागजों पर ये फर्में करोड़ों का व्यापार कर रही थीं, लेकिन असलियत में इनका कोई भौतिक अस्तित्व (Physical Existence) नहीं था। कोई गोदाम नहीं, कोई दुकान नहीं, कोई माल नहीं।
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चरण 2: 276.16 करोड़ रुपये की फर्जी आईटीसी (Fake ITC) का खेल
\r\n\r\nजीएसटी प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) है। इसका अर्थ है कि जब कोई व्यापारी माल खरीदता है तो वह उस पर चुकाए गए टैक्स का क्रेडिट ले सकता है। मौहम्मद आकिब ने अपनी डमी फर्मों के बीच माल की खरीद-फरोख्त (Sale-Purchase) के फर्जी ई-वे बिल (E-way Bills) और जीएसटी चालान (Tax Invoices) जनरेट किए। वास्तव में एक भी सुई का व्यापार नहीं हुआ, केवल कागजों पर बिल काटे गए। इस तरीके से उसने सह-अभियुक्तों के साथ मिलकर जीएसटी नेटवर्क में 276.16 करोड़ रुपये की भारी-भरकम फर्जी आईटीसी पास कर ली और उसे आगे बेचकर नकद मुनाफा कमाया।
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चरण 3: 18.22 करोड़ रुपये का नकद रिफंड (Fake Refund)
\r\n\r\nआरोपी सिर्फ फर्जी आईटीसी तक ही नहीं रुका। उसने सह-अभियुक्तों के साथ मिलकर तीन विशेष फर्मों का इस्तेमाल करते हुए सरकार से 18.22 करोड़ रुपये का फर्जी रिफंड भी प्राप्त किया। आमतौर पर यह रिफंड 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' (Inverted Duty Structure) या शून्य-दर आपूर्ति (Zero-Rated Supply/Exports) के नाम पर लिया जाता है। जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि लूटे गए इस 18.22 करोड़ के रिफंड में से, आकिब ने अपनी निजी फर्म 'मैसर्स ए टू जेड सोल्यूशन' (M/s A to Z Solution) के बैंक खाते में सीधे तौर पर 4.77 करोड़ रुपये ट्रांसफर (Transfer) किए थे। यह बैंक एंट्री (Bank Entry) उसके खिलाफ सबसे बड़ा और अकाट्य डिजिटल साक्ष्य (Digital Evidence) बन गई है।
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विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेरठ की अदालत में पेशी और जिरह
\r\n\r\n25 मार्च 2026 को गिरफ्तारी के बाद, डीजीजीआई मेरठ की टीम ने आरोपी मौहम्मद आकिब को भारी सुरक्षा के बीच मेरठ स्थित 'विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट' (Special Chief Judicial Magistrate) की अदालत में पेश किया (केस संख्या-13/2026)।
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डीजीजीआई के निरीक्षक संजय सिंह की ओर से अदालत में विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई और आरोपी से इस बड़े नेटवर्क से जुड़े अन्य सफेदपोशों, सीए (Chartered Accountants), और हवाला ऑपरेटरों के बारे में पूछताछ करने के लिए 14 दिन की न्यायिक रिमांड (Judicial Remand) की मांग की गई।
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बचाव पक्ष (अभियुक्त के वकील) की दलीलें
\r\n\r\nअदालत कक्ष में अभियुक्त मौहम्मद आकिब के विद्वान अधिवक्ता ने रिमांड का कड़ा विरोध किया। उन्होंने मौखिक रूप से आपत्ति दर्ज कराते हुए तर्क दिया कि:
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- \r\n उनके मुवक्किल पर लगाए गए 276.16 करोड़ रुपये की आईटीसी चोरी के आरोप मनगढ़ंत हैं।\r\n \r\n
- \r\n विभाग (DGGI) के पास यह साबित करने के लिए कोई ठोस प्रत्यक्ष साक्ष्य (Direct Evidence) नहीं है कि आकिब ने ही इन फर्मों का संचालन किया है।\r\n \r\n
- \r\n अधिवक्ता ने अदालत से मांग की कि रिमांड प्रार्थना पत्र को निरस्त कर दिया जाए और आरोपी को जमानत दी जाए।\r\n \r\n
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विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) का पक्ष
\r\n\r\nइसके जवाब में डीजीजीआई के विशेष लोक अभियोजक (Special PP) लक्ष्य कुमार सिंह और उनकी सहयोगी अधिवक्ता श्रीमती वंदना सिंह ने अदालत के सामने दस्तावेजों का अंबार लगा दिया। उन्होंने 'मैसर्स ए टू जेड सोल्यूशन' के बैंक स्टेटमेंट दिखाए, जिसमें फर्जी रिफंड का 4.77 करोड़ रुपया सीधे आकिब के खाते में आया था। इसके अलावा, डमी फर्मों के आईपी एड्रेस (IP Address) और डिजिटल फुटप्रिंट भी पेश किए गए।
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अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी पर 5 करोड़ रुपये से अधिक के कर अपवंचन (Tax Evasion) का पुख्ता मामला बनता है, जो सीजीएसटी एक्ट के तहत एक संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-Bailable) अपराध है।
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अदालत का फैसला: 14 दिन की रिमांड और 'मिहिर राजेश शाह' गाइडलाइंस का पालन
\r\n\r\nविद्वान विशेष अभियोजन और अभियुक्त के अधिवक्ता की तीखी जिरह को सुनने तथा सभी प्रपत्रों (Documents) का गहनता से अवलोकन करने के बाद, मजिस्ट्रेट ने अपना आदेश (Order) पारित किया।
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मजिस्ट्रेट की अहम टिप्पणियां: अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि प्रथम दृष्टया यह साबित होता है कि अभियुक्त ने सह-अभियुक्तों के साथ मिलकर एक बड़ा आपराधिक षड्यंत्र रचा है। लगभग 294 करोड़ रुपये (276.16 करोड़ ITC + 18.22 करोड़ रिफंड) की कर चोरी का यह आरोप देश की अर्थव्यवस्था के खिलाफ एक बेहद गंभीर 'आर्थिक अपराध' (White Collar Crime) है।
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कानूनी प्रक्रिया का पूर्ण पालन: अदालत ने यह भी जांचा कि डीजीजीआई ने गिरफ्तारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन किया है या नहीं। हाल ही में आए ऐतिहासिक फैसले 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य 2025' (Mihir Rajesh Shah vs State of Maharashtra 2025) के सख्त अनुपालन को अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया।
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- \r\n गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) का पंचनामा बनाया गया।\r\n \r\n
- \r\n सीजर रिपोर्ट (Seizure Report), रीजन टू बिलीव (Reason to Believe), अरेस्ट मीमो (Arrest Memo) और जामा तलाशी के सभी प्रपत्र 25 मार्च 2026 की सुबह 8:00 बजे ही आरोपी को सौंप दिए गए थे।\r\n \r\n
- \r\n आरोपी की गिरफ्तारी की सूचना विधिवत रूप से उसके परिजनों/सम्बन्धियों को दी गई।\r\n \r\n
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इन सभी वैधानिक प्रक्रियाओं के पूर्ण होने और अपराध की गंभीरता को देखते हुए, अदालत ने मौहम्मद आकिब का 14 दिन का रिमांड स्वीकार कर लिया। आरोपी को 06 अप्रैल 2026 तक के लिए जिला कारागार (District Jail) भेज दिया गया है, जिसके बाद उसे पुनः अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
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CGST Act 2017 की संगीन धाराएं: क्या है इनका मतलब?
\r\n\r\nइस महाघोटाले में डीजीजीआई ने केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 (CGST Act 2017) की सबसे सख्त धाराओं का इस्तेमाल किया है। एक जागरूक नागरिक और व्यापारी होने के नाते हमें इन धाराओं का अर्थ समझना चाहिए:
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इस प्रकरण में धारा-132(1)(b), 132(1)(c), 132(1)(f), 132(1)(l), और 132(1)(i) के तहत केस दर्ज किया गया है।
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- \r\n धारा 132(1)(b): यह धारा तब लगाई जाती है जब कोई व्यक्ति बिना माल या सेवाओं की वास्तविक आपूर्ति (Supply) के केवल फर्जी इनवॉयस (Invoice) या बिल जारी करता है।\r\n \r\n
- \r\n धारा 132(1)(c): यह धारा उस व्यक्ति पर लगती है जो ऊपर बताए गए फर्जी बिलों का उपयोग करके अवैध रूप से इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का लाभ उठाता है। इस मामले में 276.16 करोड़ का फर्जी आईटीसी इसी धारा के तहत आता है।\r\n \r\n
- \r\n धारा 132(1)(f): किसी भी वित्तीय रिकॉर्ड को नष्ट करना, फर्जी खाते बनाना या जांच अधिकारियों के समक्ष गलत दस्तावेज प्रस्तुत करना इस धारा के दायरे में आता है।\r\n \r\n
- \r\n धारा 132(1)(i): यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए भी कि फलां माल या सेवाओं से जुड़े लेन-देन में टैक्स चोरी हुई है, उसे प्राप्त करता है या उसमें डील करता है, तो यह धारा लगती है।\r\n \r\n
- \r\n धारा 132(1)(l): उपरोक्त किसी भी अपराध को करने का प्रयास करना या उस अपराध को करने में सहायता (Abetment) करना।\r\n \r\n
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5 करोड़ से ऊपर का नियम: सीजीएसटी एक्ट की धारा 132(5) के अनुसार, यदि कर चोरी की राशि 500 लाख (5 करोड़ रुपये) से अधिक है, तो वह अपराध स्वतः ही 'संज्ञेय और गैर-जमानती' (Cognizable and Non-Bailable) बन जाता है। आकिब के मामले में यह राशि 294 करोड़ है, इसलिए उसे मजिस्ट्रेट अदालत से तुरंत जमानत मिलना लगभग असंभव है।
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ईमानदार व्यापार बनाम फर्जी सिंडिकेट: मेरठ की अर्थव्यवस्था पर असर
\r\n\r\nमेरठ डीजीजीआई 294 करोड़ जीएसटी घोटाला सिर्फ सरकार के खजाने का नुकसान नहीं है, बल्कि यह बाजार में काम कर रहे ईमानदार व्यापारियों के लिए भी एक बड़ा खतरा है।
\r\n\r\nजब कोई सिंडिकेट फर्जी बिलों के आधार पर बिना टैक्स चुकाए माल को बाजार में उतारता है, तो उसकी लागत बहुत कम हो जाती है। इसके विपरीत, एक ईमानदार व्यापारी जो 18% या 28% जीएसटी पूरी ईमानदारी से चुकाकर माल ला रहा है, वह कीमत की इस अनुचित प्रतिस्पर्धा (Unfair Competition) में पिछड़ जाता है। ऐसे घोटाले 'पैरेलल इकॉनमी' (Black Economy) को जन्म देते हैं।
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इसके अलावा, कई बार ये सिंडिकेट बिना जानकारी के किसी मासूम व्यापारी को भी अपने फर्जी बिल थमा देते हैं। बाद में जब डीजीजीआई की जांच होती है, तो अनजाने में वह ईमानदार व्यापारी भी कानूनी पचड़े में फंस जाता है, उसे पेनाल्टी देनी पड़ती है और उसका आईटीसी ब्लॉक (ITC Block) कर दिया जाता है। इसलिए, यह आवश्यक है कि व्यापारी अपने आपूर्तिकर्ताओं (Suppliers) की अच्छी तरह से जांच (Due Diligence) करें और केवल विश्वसनीय पार्टियों के साथ ही व्यापार करें।
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डीजीजीआई मेरठ (DGGI Meerut) का शानदार ट्रैक रिकॉर्ड
\r\n\r\nमेरठ जोनल यूनिट (MZU) का अधिकार क्षेत्र पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ है। हाल के वर्षों में डीजीजीआई मेरठ ने टैक्स चोरी के खिलाफ जो आक्रामक रुख अपनाया है, वह काबिले तारीफ है।
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- \r\n पैन-मसाला और गुटखा सिंडिकेट: इससे पहले भी मेरठ यूनिट ने गुटखा और सिगरेट की बिना बिल के आपूर्ति करने वाले कई बड़े गिरोहों का भंडाफोड़ किया था।\r\n \r\n
- \r\n स्क्रैप (कबाड़) माफिया: लौह और स्क्रैप उद्योग में फर्जी आईटीसी पास करने वाले माफियाओं के खिलाफ भी डीजीजीआई मेरठ ने सैकड़ों करोड़ की रिकवरी की है।\r\n \r\n
- \r\n डेटा ड्रिवन अप्रोच: अब अधिकारी सड़कों पर ट्रकों का पीछा करने के बजाय, ई-वे बिल पोर्टल और जीएसटीआर (GSTR) रिटर्न के डेटाबेस में छिपे 'एल्गोरिदम' का विश्लेषण करते हैं। सॉफ्टवेयर खुद बता देता है कि कौन सी नई फर्म एक महीने के भीतर करोड़ों का टर्नओवर कर रही है, और अधिकारी वहीं छापा मारते हैं।\r\n \r\n
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मौहम्मद आकिब की गिरफ्तारी इसी आधुनिक 'डेटा-ड्रिवन' पुलिसिंग का एक शानदार उदाहरण है।
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आगे क्या होगा? (Next Steps in Investigation)
\r\n\r\nअब जबकि मौहम्मद आकिब 06 अप्रैल 2026 तक जेल में है, डीजीजीआई के अधिकारियों का काम खत्म नहीं हुआ है, बल्कि यह असली जांच की शुरुआत है।
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- \r\n मनी ट्रेल की जांच (Following the Money): अधिकारी अब यह पता लगाएंगे कि जो 18.22 करोड़ रुपये का नकद रिफंड सरकारी खजाने से लूटा गया था, वह आकिब के खाते (A to Z Solution) से निकलकर किन-किन लोगों के पास गया। इसमें हवाला ऑपरेटरों के शामिल होने की पूरी संभावना है।\r\n \r\n
- \r\n सह-अभियुक्तों की तलाश: आकिब अकेला 294 करोड़ का सिंडिकेट नहीं चला सकता। इस खेल में सीए (Chartered Accountants), फर्जी बिल ब्रोकर और वो लोग शामिल होंगे जिन्होंने अपने आधार/पैन कार्ड बेचे थे। जल्द ही इस मामले में कई और बड़ी गिरफ्तारियां देखने को मिल सकती हैं।\r\n \r\n
- \r\n संपत्तियों की जब्ती (Attachment of Properties): सरकार का पैसा वसूलने के लिए डीजीजीआई धारा 83 के तहत आरोपी आकिब की संपत्तियों (घर, गाड़ियां) और बैंक खातों को प्रोविजनल रूप से कुर्क (Attach) करने की कार्रवाई भी शुरू करेगी।\r\n \r\n
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न्यायालय विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेरठ द्वारा मेरठ डीजीजीआई 294 करोड़ जीएसटी घोटाला मामले में मुख्य आरोपी मौहम्मद आकिब को 14 दिन की रिमांड पर भेजना भारतीय न्याय व्यवस्था और कर प्रशासन की एक बड़ी जीत है। डमी फर्मों के सहारे 276 करोड़ का फर्जी आईटीसी और 18 करोड़ का रिफंड लूटने वाला यह सिंडिकेट देश की आर्थिक जड़ों को खोखला कर रहा था। डीजीजीआई मेरठ की यह त्वरित और सटीक कार्रवाई उन सभी जालसाजों के लिए एक खुली चेतावनी है जो सोचते हैं कि वे डिजिटल प्रणाली में सेंध लगाकर बच निकलेंगे। 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य 2025' के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए की गई यह वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित करती है कि आरोपी किसी भी तकनीकी खामी का फायदा उठाकर बच न सके। अब सभी की निगाहें 06 अप्रैल 2026 पर टिकी हैं, जब यह साफ होगा कि इस महाघोटाले के तार दिल्ली-मेरठ से होते हुए और किन सफेदपोशों तक जुड़े हुए हैं।
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सार (Summary): डीजीजीआई (DGGI) मेरठ जोनल यूनिट ने 294 करोड़ रुपये के एक विशाल जीएसटी कर अपवंचन नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। टीम ने पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर निवासी मास्टरमाइंड मौहम्मद आकिब को गिरफ्तार किया है। आरोपी पर डमी फर्म बनाकर 276.16 करोड़ रुपये की फर्जी आईटीसी पास करने और 18.22 करोड़ रुपये का नकद रिफंड लेने का आरोप है, जिसमें से 4.77 करोड़ रुपये सीधे उसकी फर्म 'ए टू जेड सोल्यूशन' में ट्रांसफर किए गए। 25 मार्च 2026 को विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेरठ की अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए अपराध की गंभीरता और सीजीएसटी एक्ट 2017 की धाराओं के तहत आकिब को 14 दिन की न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया है। मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी।
\r\n\r\nडिस्क्लेमर: यह न्यूज़ रिपोर्ट मौजूद प्रेस रिलीज़ और स्पेशल प्रॉसिक्यूशन ऑफिसर और आरोपी के वकील की दलीलों और वैलिड कोर्ट के ऑर्डर पर आधारित है।