खबरीलाल डेस्क
शिक्षा के मंदिरों में समानता और न्याय की उम्मीद की जाती है, लेकिन उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित प्रतिष्ठित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU) से एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC), भारत सरकार ने विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में एक दलित छात्र के साथ हुए कथित जातिगत भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न के मामले का कड़ा संज्ञान लिया है। आयोग ने इस प्रकरण में त्वरित कार्रवाई करते हुए CCSU के रजिस्ट्रार को एक आधिकारिक नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर विस्तृत जवाब तलब किया है। यह मामला उच्च शिक्षण संस्थानों में हाशिए पर मौजूद वर्गों के छात्रों के साथ होने वाले व्यवहार और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।READ ALSO:-मेरठ में दलितों के रोजगार पर प्रहार: 150 परिवार भुखमरी की कगार पर, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने DM को भेजा नोटिस, डूंगर चर्मशोधन मामले में मांगा जवाब
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

विवाद की पृष्ठभूमि: क्या है पूरा मामला?

\r\n\r\n
यह पूरा विवाद वर्ष 2021 के प्रवेश (Admission) सत्र से जुड़ा हुआ है। मेरठ के सूर्यपुरम, दिल्ली रोड निवासी मयंक कुमार वर्मा ने CCSU के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में प्रवेश के लिए आवेदन किया था। छात्र की शिकायत के अनुसार, प्रवेश प्रक्रिया के दौरान उन्हें भारी प्रशासनिक अनियमितताओं और स्पष्ट जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n
आरोपों के मुताबिक, छात्र ने विश्वविद्यालय द्वारा मांगी गई सभी औपचारिकताएं पूरी कीं। उन्होंने अपने सभी आवश्यक शैक्षणिक और व्यक्तिगत दस्तावेज विभाग में जमा किए और निर्धारित प्रवेश शुल्क (Admission Fee) का भी भुगतान किया। एक सामान्य प्रक्रिया के तहत, फीस जमा होने के बाद छात्र का नाम विश्वविद्यालय के आधिकारिक पोर्टल पर दर्ज (Lock) हो जाना चाहिए था। लेकिन मयंक वर्मा के मामले में ऐसा नहीं किया गया। उनका एडमिशन पोर्टल पर लॉक ही नहीं किया गया, जो कि इस पूरी साजिश का पहला कदम बताया जा रहा है।
\r\n\r\n
कक्षाओं में बैठने की अनुमति, लेकिन उपस्थिति दर्ज नहीं
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
शिकायतकर्ता मयंक कुमार वर्मा ने अपने अभ्यावेदन में बताया है कि उन्हें एडमिशन कंफर्म होने का भ्रम दिया गया। उन्हें कुछ समय तक नियमित रूप से विभाग की कक्षाओं में बैठने की अनुमति दी गई। एक छात्र के रूप में उन्होंने पूरी लगन के साथ अपनी कक्षाएं लीं, लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि रजिस्टर में उनकी उपस्थिति (Attendance) दर्ज ही नहीं की जा रही थी। यह एक छात्र के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ था। जब छात्र ने इस अनियमितता पर सवाल उठाए, तो उन्हें कथित तौर पर विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों के भेदभावपूर्ण रवैये का सामना करना पड़ा।
\r\n\r\n

\r\n\r\n

जातिसूचक टिप्पणियां और मानसिक उत्पीड़न

\r\n\r\n
इस प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू वह है जहां छात्र ने विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों पर जातिसूचक टिप्पणियां करने का आरोप लगाया है। एक उच्च शिक्षण संस्थान, जहां से भविष्य के पत्रकार और संचार विशेषज्ञ तैयार होते हैं, वहां ऐसी घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। शिकायत के अनुसार, छात्र को उसकी जाति को लेकर प्रताड़ित किया गया और ऐसा माहौल बनाया गया जिससे उसका वहां पढ़ाई जारी रखना असंभव हो जाए।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
\r\n
दबाव में कराया गया फीस रिफंड: मयंक का आरोप है कि जब उन्होंने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई, तो उन पर भारी मानसिक दबाव बनाया गया। अंततः उन्हें एक आवेदन लिखने के लिए मजबूर किया गया जिसमें उनके प्रवेश वापस लेने की बात कही गई थी। इसके बाद, उनके द्वारा जमा की गई फीस उनके बैंक खाते में वापस (Refund) कर दी गई। इस पूरी प्रक्रिया ने छात्र को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया।
\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

मजबूत साक्ष्यों के साथ NCSC पहुंचा छात्र

\r\n\r\n
इस घटनाक्रम ने मयंक कुमार वर्मा के मानसिक स्वास्थ्य पर बेहद गहरा और नकारात्मक प्रभाव डाला। लेकिन हार मानने के बजाय, उन्होंने न्याय के लिए कानूनी और संवैधानिक रास्ता चुना। 27 मई 2026 को उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) के समक्ष अपनी विस्तृत शिकायत दर्ज कराई।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
छात्र का दावा है कि उनके आरोप केवल मौखिक नहीं हैं, बल्कि उनके पास इस अन्याय को साबित करने के लिए पुख्ता सबूत मौजूद हैं। आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों में शामिल हैं:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    फीस जमा करने और रिफंड होने के स्पष्ट बैंक रिकॉर्ड।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ किए गए ई-मेल पत्राचार (E-mail Correspondence)।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    भेदभाव और उत्पीड़न को साबित करने वाली अहम ऑडियो रिकॉर्डिंग्स।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े अन्य सभी प्रासंगिक दस्तावेज।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) का सख्त निर्देश

\r\n\r\n
शिकायत की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए, NCSC के अनुसंधान अधिकारी प्रभात मोहन ठाकुर ने 11 जून 2026 को CCSU के रजिस्ट्रार को एक आधिकारिक नोटिस (फाइल सं.- ESDW/OL/UP/2026/333260) जारी किया है। आयोग ने इस मामले को अनुसूचित जातियों के संवैधानिक अधिकारों के हनन के रूप में स्वीकार किया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

नोटिस के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    15 दिन का अल्टीमेटम: विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि वह नोटिस प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर इस मामले के सभी तथ्यों, लगाए गए आरोपों की सच्चाई, और अब तक की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट आयोग को प्रस्तुत करे।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    जवाब दाखिल करने के माध्यम: विश्वविद्यालय यह रिपोर्ट डाक, ईमेल (पोर्टल के माध्यम से), या स्वयं उपस्थित होकर किसी भी वैध संचार साधन से प्रस्तुत कर सकता है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

अनुच्छेद 338 के तहत दीवानी अदालत की शक्तियां

\r\n\r\n
आयोग ने अपने पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में ढिलाई बरतता है या निर्धारित 15 दिनों के भीतर संतोषजनक उत्तर नहीं देता है, तो आयोग कड़े कदम उठाएगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
भारत के संविधान का अनुच्छेद 338 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को विशेष अधिकार प्रदान करता है। किसी भी शिकायत की जांच करते समय, NCSC के पास एक दीवानी अदालत (Civil Court) के समान शक्तियां होती हैं। इसका अर्थ यह है कि:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    आयोग भारत के किसी भी हिस्से से किसी भी व्यक्ति (इस मामले में CCSU के कुलपति, रजिस्ट्रार या विभागाध्यक्ष) को समन जारी कर सकता है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    उन्हें व्यक्तिगत रूप से आयोग के समक्ष उपस्थित होने के लिए बाध्य कर सकता है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    शपथ पर पूछताछ कर सकता है और किसी भी सार्वजनिक रिकॉर्ड या दस्तावेज को प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

न्याय की उम्मीद और आगे का रास्ता

\r\n\r\n
शिकायतकर्ता मयंक कुमार वर्मा का कहना है कि उन्होंने यह लड़ाई केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन सभी छात्रों के लिए शुरू की है जो भविष्य में इस तरह के संस्थागत भेदभाव का शिकार हो सकते हैं। उन्हें पूरी उम्मीद है कि NCSC की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच से CCSU के पत्रकारिता विभाग की असलियत सामने आएगी और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित होगी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अब सभी की निगाहें चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय प्रशासन पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि विश्वविद्यालय इस गंभीर मामले में क्या बचाव प्रस्तुत करता है और अपनी आंतरिक जांच रिपोर्ट में किन तथ्यों को उजागर करता है। यदि आरोप सत्य साबित होते हैं, तो यह विश्वविद्यालय की साख पर एक बहुत बड़ा दाग होगा और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों के लिए एक कड़ा सबक भी। समाज के हर तबके को समान शिक्षा का अधिकार है, और इस तरह के मामलों में त्वरित न्याय ही व्यवस्था में छात्रों का विश्वास बहाल कर सकता है।