नई दिल्ली: भारत में करोड़ों नौकरीपेशा लोगों के लिए नौकरी बदलना अक्सर एक मानसिक तनाव का कारण होता है। नई नौकरी की खुशी से ज्यादा पुरानी कंपनी से अपना 'फुल एंड फाइनल' (Full and Final - F&F) सेटलमेंट निकलवाने की चिंता कर्मचारियों को सताती है। वर्तमान व्यवस्था में एचआर (HR) और फाइनेंस विभाग क्लीयरेंस के नाम पर कर्मचारियों को महीनों तक घुमाते हैं। लेकिन अब, केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए लेबर कोड (New Labour Codes) ने इस पूरी व्यवस्था को कर्मचारी के हित में पूरी तरह से पलट कर रख दिया है।READ ALSO:-कामकाजी वर्ग के लिए बड़ी खुशखबरी! अब 5 साल नहीं, सिर्फ 1 साल की नौकरी के बाद भी मिलेगी ग्रेच्युटी, केंद्र सरकार ने बदला दशकों पुराना नियम
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अब कर्मचारियों को अपनी ही मेहनत की कमाई के लिए कंपनियों के चक्कर नहीं काटने होंगे। भारत सरकार के इस ऐतिहासिक कदम से प्राइवेट और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले युवाओं को सबसे बड़ी आर्थिक राहत मिली है।
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क्या है '2 दिन' वाला नया सेटलमेंट नियम?
\r\n\r\nनए श्रम कानूनों के तहत लाए गए 'कोड ऑन वेजेस 2019' (Code on Wages, 2019) की धारा 17(2) में कर्मचारियों के वेतन और बकाया भुगतान को लेकर बेहद सख्त और स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं।
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इस नए नियम के अनुसार, यदि कोई कर्मचारी अपनी मर्जी से कंपनी से इस्तीफा देता है, या कंपनी किसी कारणवश उसे नौकरी से निकालती है, अथवा कंपनी खुद बंद हो जाती है, तो ऐसे सभी मामलों में एम्प्लॉयर (नियोक्ता) को कर्मचारी के अंतिम कार्य दिवस (Last Working Day) के बाद मात्र 2 वर्किंग डेज (कामकाजी दिनों) के भीतर उसका पूरा बकाया चुकाना होगा।
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वर्तमान व्यवस्था में कंपनियां आमतौर पर सेटलमेंट के लिए 45 से 90 दिनों का लंबा समय लेती हैं। इस देरी के कारण कई बार कर्मचारियों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। उनका घर का किराया रुक जाता है या बैंक लोन की ईएमआई (EMI) बाउंस हो जाती है। नया नियम कर्मचारियों को इसी आर्थिक तंगी से बचाने के लिए लाया गया है।
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फुल एंड फाइनल (F&F) सेटलमेंट में आपको क्या-क्या मिलेगा?
\r\n\r\nअक्सर लोग मानते हैं कि फुल एंड फाइनल सेटलमेंट का मतलब सिर्फ आखिरी महीने की बची हुई सैलरी मिलना होता है। लेकिन ऐसा नहीं है। 2 दिनों के भीतर कंपनी को जो पैसा आपके खाते में ट्रांसफर करना होगा, उसमें कई अन्य महत्वपूर्ण घटक शामिल होते हैं:
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- \r\n बकाया वेतन (Pending Salary): आपके द्वारा नोटिस पीरियड के दौरान या अंतिम महीने में काम किए गए सभी दिनों की पूरी सैलरी।\r\n \r\n
- \r\n लीव एनकैशमेंट (Leave Encashment): आपके खाते में बची हुई वे छुट्टियां (Earned Leaves या Privilege Leaves) जो आपने नहीं ली हैं, उन्हें नकद में बदला जाएगा और उसका पैसा आपको मिलेगा।\r\n \r\n
- \r\n बोनस और इंसेंटिव (Bonus & Incentives): यदि कंपनी की पॉलिसी के अनुसार आपका कोई पिछला प्रदर्शन आधारित बोनस या इंसेंटिव रुका हुआ है, तो वह भी इसी सेटलमेंट में दिया जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n ग्रेच्युटी (Gratuity): कंपनी में आपके द्वारा दी गई लंबी सेवाओं के प्रतिफल के रूप में मिलने वाली एकमुश्त राशि।\r\n \r\n
- \r\n प्रतिपूर्ति (Reimbursement): यदि आपने ऑफिस के काम से कोई यात्रा की है, या कंपनी के लिए अपनी जेब से कोई खर्च किया है (जैसे इंटरनेट बिल, क्लाइंट मीटिंग का खर्च), तो उसका बकाया भी चुकाया जाएगा।\r\n \r\n
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ग्रेच्युटी (Gratuity) के नियमों में हुआ ऐतिहासिक बदलाव
\r\n\r\nइस नए लेबर कोड का दूसरा सबसे क्रांतिकारी पहलू ग्रेच्युटी से जुड़ा है। दशकों से भारत में यह नियम चला आ रहा था कि किसी भी कर्मचारी को ग्रेच्युटी का लाभ तभी मिलेगा, जब वह एक ही संस्थान में लगातार कम से कम 5 साल तक अपनी सेवाएं दे।
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लेकिन आज के दौर में, जहां युवा अपने करियर ग्रोथ के लिए जल्दी-जल्दी नौकरियां बदलते हैं, यह नियम अव्यावहारिक हो गया था। इसे देखते हुए सरकार ने बड़ा बदलाव किया है। अब फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों (Fixed-Term Employees) के लिए इस 5 साल की सीमा को घटाकर महज 1 साल कर दिया गया है।
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यानी, यदि आप किसी कंपनी के साथ एक या दो साल के फिक्स्ड कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे हैं, तो एक साल पूरा होते ही आप ग्रेच्युटी के हकदार बन जाएंगे। हालांकि, जो कर्मचारी पर्मानेंट या रेगुलर (Regular) पेरोल पर हैं, उनके लिए अभी भी 5 साल का नियम ही लागू रहेगा। यह बदलाव देश में बढ़ रही 'गिग इकॉनमी' (Gig Economy) और कॉन्ट्रैक्ट आधारित नौकरियों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच है।
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कब से पूरी तरह प्रभावी होगा यह नियम?
\r\n\r\nलंबे समय से इन लेबर कोड्स को लागू करने की चर्चा चल रही थी। विभिन्न राज्यों के साथ सहमति बनने के बाद, नई प्रशासनिक रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार ने इन नियमों को 1 अप्रैल 2026 से पूरी तरह से प्रभावी कर दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि इस तारीख के बाद से भारत में काम करने वाली हर छोटी-बड़ी कंपनी, स्टार्टअप और मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन (MNC) को इस 48 घंटे (2 दिन) वाले नियम का सख्ती से पालन करना होगा।
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कर्मचारियों को फायदा, लेकिन कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती
\r\n\r\nजहां एक ओर यह नियम कर्मचारियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, वहीं दूसरी ओर कंपनियों के मानव संसाधन (HR) और वित्त (Finance) विभागों के लिए यह एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
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एचआर (HR) विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी जल्दी किसी कर्मचारी का 'नो ड्यूज' (No Dues) क्लीयरेंस करना आसान नहीं है। कंपनियों को अपना पेरोल (Payroll) सिस्टम, आईटी (IT) एसेट रिकवरी और एग्जिट प्रोसेस (Exit Process) को पूरी तरह से ऑटोमेट और अपग्रेड करना होगा। अगर कोई कंपनी 2 दिन के भीतर सेटलमेंट करने में विफल रहती है, तो नए कानून के तहत उस पर भारी जुर्माना लगाए जाने का भी प्रावधान है।
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कुल मिलाकर, भारत का श्रम बाजार अब एक नए और आधुनिक युग में प्रवेश कर चुका है, जहां कर्मचारियों के अधिकारों और उनकी मेहनत की कमाई की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा गया है।