नई दिल्ली: हिंदू धर्म में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व है। इस दिन माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami) का निर्जला व्रत रखती हैं। यह व्रत करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद और दीपावली से लगभग आठ दिन पहले आता है।Read also:-दिवाली 2025: धनतेरस से छठ पूजा तक बैंक छुट्टियों की पूरी सूची जारी, 20, 21, 22 और 23 अक्टूबर को कहाँ-कहाँ रहेगी छुट्टी?
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वर्ष 2025 में, अहोई अष्टमी का व्रत सोमवार, 13 अक्टूबर को रखा जाएगा। इस दिन माता अहोई की पूजा की जाती है, जिन्हें माता पार्वती का ही एक रूप माना जाता है।
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अहोई अष्टमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त
\r\n\r\nपंचांग के अनुसार, इस साल अहोई अष्टमी के दिन कई शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ जाता है।
\r\n\r\n| \r\n विवरण \r\n | \r\n \r\n समय \r\n | \r\n
| \r\n अष्टमी तिथि आरंभ \r\n | \r\n \r\n 13 अक्टूबर 2025, दोपहर 12 बजकर 24 मिनट पर \r\n | \r\n
| \r\n अष्टमी तिथि समाप्त \r\n | \r\n \r\n 14 अक्टूबर 2025, सुबह 11 बजकर 09 मिनट पर \r\n | \r\n
| \r\n अहोई अष्टमी व्रत तिथि \r\n | \r\n \r\n 13 अक्टूबर 2025, सोमवार \r\n | \r\n
| \r\n पूजा का शुभ मुहूर्त (प्रदोष काल) \r\n | \r\n \r\n शाम 05 बजकर 53 मिनट से 07 बजकर 08 मिनट तक (अवधि: 1 घंटा 15 मिनट) \r\n | \r\n
| \r\n तारों को देखने का समय \r\n | \r\n \r\n शाम 06 बजकर 17 मिनट से \r\n | \r\n
| \r\n चंद्रोदय का समय \r\n | \r\n \r\n रात 11 बजकर 20 मिनट (कुछ स्थानों पर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है) \r\n | \r\n
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अहोई अष्टमी व्रत का महत्व और कथा
\r\n\r\nअहोई अष्टमी का व्रत माताओं के अपने बच्चों के प्रति असीम प्रेम और त्याग का प्रतीक है।
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व्रत का महत्व
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- \r\n संतान की दीर्घायु: माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और सुरक्षा के लिए यह निर्जला व्रत रखती हैं।\r\n \r\n
- \r\n संतान सुख: ऐसी मान्यता है कि जिन दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ है, यदि वे श्रद्धापूर्वक यह व्रत करें और राधा कुंड में स्नान करें, तो उन्हें संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।\r\n \r\n
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पौराणिक कथा का सार
\r\n\r\nप्राचीन काल में एक साहूकार की बहू ने अनजाने में जंगल में मिट्टी खोदते समय साही (स्याहू) के एक बच्चे को मार दिया था। इस पाप के कारण उसके एक-एक करके सातों बेटों की मृत्यु हो गई। शोक में डूबी बहू को एक बड़ी औरत ने अहोई माता का व्रत करने की सलाह दी। बहू ने सच्चे मन से माता अहोई (जो साही और उसके बच्चों के रूप में थीं) और साही के सात बच्चों का चित्र बनाकर उनकी पूजा की और क्षमा माँगी। उसके पश्चाताप से प्रसन्न होकर माता अहोई ने उसे क्षमा किया और उसके सातों बेटों को जीवनदान दिया। तभी से संतान की रक्षा के लिए यह व्रत किया जाता है, जिसका अर्थ है 'अनहोनी को होनी बनाना'।
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अहोई अष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि
\r\n\r\nयह व्रत करवा चौथ की तरह ही कठिन होता है, जिसे निर्जला रखा जाता है। पूजा संध्याकाल में शुभ मुहूर्त में की जाती है।
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1. व्रत का संकल्प (सुबह)
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- \r\n सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।\r\n \r\n
- \r\n निर्जला व्रत (या फलाहार, अपनी परम्परा अनुसार) का संकल्प लें और दिनभर माता अहोई का स्मरण करें।\r\n \r\n
- \r\n इस दिन जमीन की खुदाई करना और बागवानी से संबंधित काम वर्जित माने जाते हैं।\r\n \r\n
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2. संध्याकाल की पूजा विधि
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- \r\n चौकी/पट स्थापना: पूजा के शुभ मुहूर्त में, एक चौकी या पट पर लाल/पीला वस्त्र बिछाएँ।\r\n \r\n
- \r\n चित्रण: दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र (या उनका पोस्टर) बनाएं। चित्र में अहोई माता के साथ उनके आठ पुत्र और चाँदी की साही (सेही) की आकृति स्थापित करें।\r\n \r\n
- \r\n कलश स्थापना: चावलों का ढेर बनाकर उस पर जल से भरा कलश स्थापित करें। कलश पर रोली से स्वास्तिक बनाएं और उसके मुख पर मौली बांधें।\r\n \r\n
- \r\n पूजन: अहोई माता के चित्र पर रोली, अक्षत, फूलमाला और श्रृंगार सामग्री (चूड़ियाँ, बिंदी, आदि) अर्पित करें। देसी घी का दीपक और धूप जलाएँ।\r\n \r\n
- \r\n भोग और कथा: माता को पुए, हलवा, या मीठा भोजन अर्पित करें। हाथ में सात प्रकार का अनाज (या चावल) लेकर श्रद्धापूर्वक अहोई अष्टमी व्रत कथा सुनें या पढ़ें।\r\n \r\n
- \r\n बच्चों का आशीर्वाद: कथा सुनते समय अपनी संतान को अपने पास बिठाएँ। पूजा के बाद उन्हें तिलक लगाकर आशीर्वाद दें और उन्हें सबसे पहले प्रसाद खिलाएँ। कथा के बाद अनाज को किसी गाय को खिला दें या सुरक्षित रखें।\r\n \r\n
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3. व्रत पारण (तारों को अर्घ्य)
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- \r\n तारों को अर्घ्य: शाम को जब आसमान में तारे दिखाई देने लगें (शाम 6:17 बजे के बाद), तब पूजा स्थल पर या छत पर जाएँ। करवा में जल भरकर तारों को अर्घ्य दें और संतान की दीर्घायु की कामना करें।\r\n \r\n
- \r\n व्रत तोड़ना: तारों को अर्घ्य देने के बाद, अपने बच्चों के हाथ से पानी पीकर या माता को चढ़ाए गए भोग का सेवन करके व्रत का पारण करें। कुछ परम्पराओं में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है, लेकिन अहोई अष्टमी पर चंद्रोदय काफी देर से (रात 11:20 बजे) होता है।\r\n \r\n