खबरीलाल डेस्क
नई दिल्ली: विधानसभाओं से पारित विधेयकों (बिलों) पर राज्यपालों और राष्ट्रपति के फैसलों की समय सीमा तय करने वाली राष्ट्रपति रेफरेंस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज, गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि राज्यपालों को राज्य विधानसभाओं से पारित बिलों को अनिश्चितकाल तक रोक कर रखने का कोई "असीमित अधिकार" नहीं है, लेकिन साथ ही अदालतें इनके लिए कोई निश्चित समय सीमा भी तय नहीं कर सकतीं।READ ALSO:-मौत की रफ्तार! मेरठ में खड़ी स्कॉर्पियो से टकराई बेकाबू स्कूटी, सिर की चोट से युवक की दर्दनाक मौत, नहीं पहना था हेलमेट
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न्यायमूर्ति बीआर गवई की अगुवाई वाली पाँच जजों की संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर अपना फैसला सुनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल बिल मंजूरी (Governor Bill Assent) के मामले में 'रबर स्टैंप' नहीं हैं, लेकिन वे निर्वाचित सरकार की विधायी इच्छा को बाधित भी नहीं कर सकते।
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राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्यपाल के पास संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत केवल तीन विकल्प उपलब्ध हैं:
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    मंजूरी देना (Assent): विधेयक को तुरंत मंजूरी देकर कानून बना देना।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    पुनर्विचार के लिए लौटाना (Return for Reconsideration): विधेयक को कुछ टिप्पणियों के साथ विधानसभा को पुनर्विचार के लिए वापस भेजना।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    राष्ट्रपति के पास भेजना (Reserve for President): विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख लेना।
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कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल विधानसभा से पास बिलों को अनिश्चितकाल तक "रोककर" नहीं रख सकते। यदि वे बिल पर मंजूरी नहीं देना चाहते हैं, तो उन्हें उसे अनिवार्य रूप से विधानसभा को पुनर्विचार के लिए वापस भेजना होगा।
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समय सीमा तय करना 'शक्तियों के पृथक्करण' का उल्लंघन

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हालांकि, कोर्ट ने तमिलनाडु मामले में दो जजों की बेंच द्वारा पहले दी गई उस सलाह को खारिज कर दिया, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए बिलों पर फैसले के लिए समय सीमा (जैसे 3 महीने) तय की गई थी।
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पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि संवैधानिक अदालतों द्वारा संवैधानिक पदों के लिए समय सीमा तय करना शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के खिलाफ होगा और संविधान द्वारा प्रदान किए गए लचीलेपन का उल्लंघन करेगा। कोर्ट ने कहा कि "समयसीमा तय करना शक्तियों के पृथक्करण को कुचलना होगा।"
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कोर्ट ने 'डीम्ड असेंट' (Deemed Assent) यानी मानी हुई मंजूरी के विचार को भी असंवैधानिक बताया और कहा कि अदालतें राज्यपालों और राष्ट्रपति के संवैधानिक कार्यों पर कब्जा नहीं कर सकतीं।
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देरी हुई तो कोर्ट करेगा हस्तक्षेप

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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संतुलन बनाते हुए कहा कि राज्यपाल बिल मंजूरी के मामले में कोई निश्चित समय सीमा नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे अनंतकाल तक बिलों को रोककर रख सकते हैं। पीठ ने जोर दिया कि भारत के सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) में, राज्यपालों को अवरोध पैदा करने वाला दृष्टिकोण अपनाने के बजाय, राज्य विधानसभा के साथ "संवाद का रास्ता" अपनाना चाहिए।
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कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर कार्रवाई में अनुचित देरी की जाती है, तो न्यायिक हस्तक्षेप (Judicial Review) की सीमित अनुमति होगी और कोर्ट ऐसी देरी पर दखल दे सकता है।
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पृष्ठभूमि: तमिलनाडु विवाद और राष्ट्रपति रेफरेंस

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इस पूरे विवाद की जड़ तमिलनाडु सरकार और वहाँ के राज्यपाल के बीच लंबित बिलों को लेकर हुए टकराव में थी। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल के अपने एक फैसले में राज्यपाल की वीटो पावर को सीमित करते हुए राष्ट्रपति के लिए 3 महीने की समय सीमा तय की थी। इसी फैसले के बाद राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगी थी और 14 सवाल पूछे थे।
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कर्नाटक और पश्चिम बंगाल समेत विपक्ष शासित राज्यों ने इस मामले में केंद्र का विरोध करते हुए राज्यपालों के लिए समय सीमा की वकालत की थी, जबकि केंद्र और भाजपा शासित राज्यों ने अदालतों द्वारा समय सीमा तय करने का विरोध किया था। 
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सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल बिल मंजूरी के मामले में स्पष्ट किया है कि राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित बिलों को अनिश्चितकाल तक रोककर नहीं रख सकते और उन्हें मंजूरी, पुनर्विचार या राष्ट्रपति के पास भेजने के तीन विकल्पों में से किसी एक का तुरंत चुनाव करना होगा। हालांकि, अदालत ने समय सीमा तय करने से इनकार कर दिया, इसे संवैधानिक शक्तियों के उल्लंघन के रूप में देखा। देरी होने पर न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है, जिससे निर्वाचित सरकारों और संवैधानिक प्रमुखों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है।