खबरीलाल डेस्क
क्या भारत में भी इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्नैपचैट और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स 16 साल से कम उम्र के बच्चों की पहुंच से दूर हो जाएंगे? यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने शुक्रवार को एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाली टिप्पणी की है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि बच्चों की मानसिक सेहत और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, ऑस्ट्रेलिया (Australia) की तर्ज पर भारत में भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।READ ALSO:-Rapid Rail Shocker: 'मर्यादा' की पटरी से उतरी नमो भारत! 'गंदी बात' का Part-2 वायरल होने पर NCRTC ने की भावुक अपील, वीडियो लीक करने वाला 'घर का भेदी' नपा
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मदुरै बेंच की इस टिप्पणी ने देश भर में डिजिटल पेरेंटिंग, इंटरनेट की आजादी और बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने यह सुझाव उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें बच्चों को इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हो रही पोर्नोग्राफी (Pornography) और अश्लील सामग्री पर चिंता जताई गई थी।
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हाईकोर्ट की बेंच ने क्या कहा? 

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मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के जस्टिस जी. जयचंद्रन (Justice G. Jayachandran) और जस्टिस के.के. रामकृष्णन (Justice K.K. Ramakrishnan) की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। जजों ने माना कि अनियंत्रित इंटरनेट और सोशल मीडिया बच्चों के कोमल मन पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।
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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एस. विजयकुमार के वकील के.पी.एस. पलानीवेल राजन ने कोर्ट का ध्यान ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में पारित हुए उस ऐतिहासिक कानून की ओर खींचा, जिसके तहत वहां 16 साल से छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर पाबंदी लगा दी गई है।
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इस दलील से सहमत होते हुए बेंच ने कहा:
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"यह एक गंभीर मुद्दा है। केंद्र सरकार को ऑस्ट्रेलिया द्वारा उठाए गए कदमों का अध्ययन करना चाहिए और भारत में भी इसी तरह के प्रतिबंध लगाने पर विचार करना चाहिए ताकि हमारी भावी पीढ़ी को साइबर अपराधों और इंटरनेट की गंदगी से बचाया जा सके।"
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ISP पर नकेल: 'सिर्फ नेट न बेचें, सुरक्षा भी दें'

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हाईकोर्ट ने केवल सरकार को कानून बनाने की सलाह ही नहीं दी, बल्कि इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (ISPs) और मोबाइल कंपनियों को भी आड़े हाथों लिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट प्रदाता कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं।
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कोर्ट के प्रमुख निर्देश और सुझाव:

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    अनिवार्य पैरेंटल कंट्रोल (Mandatory Parental Control): कोर्ट ने सुझाव दिया कि सभी ISPs को अपने ग्राहकों को अनिवार्य रूप से 'पैरेंटल विंडो' या 'पैरेंटल कंट्रोल' की सुविधा देनी चाहिए। यह सुविधा इतनी सरल होनी चाहिए कि एक सामान्य माता-पिता भी इसे समझ सकें और अपने बच्चों की ऑनलाइन एक्टिविटी को फिल्टर कर सकें।
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    KYC और एक्सेस कंट्रोल: सिम कार्ड बेचते समय या इंटरनेट कनेक्शन देते समय ही ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे यह तय हो सके कि डिवाइस का इस्तेमाल बालिग कर रहा है या नाबालिग।
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    जागरूकता अभियान: जब तक कोई सख्त कानून नहीं बनता, तब तक केंद्र सरकार, राज्य सरकार और बाल अधिकार आयोगों को मिलकर स्कूलों और मीडिया के जरिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाना चाहिए।
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ऑस्ट्रेलिया का 'मॉडल' क्या है, जिसकी कोर्ट ने दी मिसाल?

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मद्रास हाईकोर्ट ने जिस 'ऑस्ट्रेलियाई मॉडल' का जिक्र किया, वह दुनिया का सबसे सख्त सोशल मीडिया कानून माना जा रहा है।
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ऑस्ट्रेलिया का 'ऑनलाइन सेफ्टी अमेंडमेंट बिल': नवंबर 2024 में ऑस्ट्रेलिया की संसद ने एक ऐतिहासिक बिल पास किया, जिसे 9 दिसंबर से लागू करने की बात कही गई है (समय सीमा के अनुसार प्रक्रियाधीन)। इस कानून के तहत:
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    उम्र सीमा: 16 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (जैसे TikTok, Instagram, Facebook, X, Snapchat) पर अपना अकाउंट नहीं बना सकता।
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    जिम्मेदारी कंपनियों पर: मजे की बात यह है कि अगर कोई बच्चा नियम तोड़कर अकाउंट बनाता है, तो सजा बच्चे या उसके माता-पिता को नहीं, बल्कि सोशल मीडिया कंपनी (Tech Giants) को मिलेगी। कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे 'एज वेरिफिकेशन' (Age Verification) की पुख्ता तकनीक अपनाएं।
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    जुर्माना: नियमों का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया कंपनियों पर 50 मिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर (अरबों रुपये) तक का भारी-भरकम जुर्माना लगाया जा सकता है।
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    अपवाद: गूगल क्लासरूम, यूट्यूब किड्स या पढ़ाई-लिखाई और स्वास्थ्य से जुड़े प्लेटफॉर्म्स को इस बैन से बाहर रखा गया है।
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ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीस ने इस कानून को पेश करते हुए कहा था, "सोशल मीडिया हमारे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है। अब समय आ गया है कि हम इसे रोकें। मैं चाहता हूं कि बच्चे अपने फोन से हटें और खेल के मैदान में जाएं।"
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याचिकाकर्ता की चिंता: 'बच्चों की जेब में अश्लीलता'

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यह पूरा मामला एस. विजयकुमार द्वारा दायर एक जनहित याचिका से शुरू हुआ। याचिका में बहुत ही गंभीर मुद्दे उठाए गए थे:
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    आसान पहुंच: आज के दौर में इंटरनेट डेटा बहुत सस्ता और सुलभ है। एक क्लिक पर बच्चों के सामने अश्लील और पोर्नोग्राफिक सामग्री आ जाती है।
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    कोई फिल्टर नहीं: मोबाइलों में डिफॉल्ट रूप से कोई ऐसा फिल्टर नहीं होता जो बच्चों को ऐसी साइटों पर जाने से रोक सके।
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    मांग: याचिका में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और तमिलनाडु बाल अधिकार आयोग को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे ISPs पर दबाव बनाएं और पैरेंटल लॉक सिस्टम लागू करवाएं।
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भारत में इसे लागू करने की चुनौतियां

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मद्रास हाईकोर्ट का सुझाव नेक इरादे से भरा है, लेकिन भारत जैसे विशाल देश में इसे लागू करना ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।
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    तकनीकी पेच (Technical Hurdles): भारत में करोड़ों यूजर्स हैं। 'एज वेरिफिकेशन' (उम्र की पुष्टि) कैसे होगी? क्या इसके लिए आधार कार्ड (Aadhaar) लिंक करना होगा? अगर ऐसा हुआ, तो निजता (Privacy) के उल्लंघन का मुद्दा खड़ा हो सकता है।
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    VPN का इस्तेमाल: आज के बच्चे तकनीक में बहुत तेज हैं। अगर सरकार ऐप्स बैन भी कर दे, तो वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) के जरिए प्रतिबंधों को बायपास किया जा सकता है।
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    व्यावहारिक दिक्कतें: भारत में कई बार एक ही फोन पूरा परिवार इस्तेमाल करता है। ऐसे में यह तय करना मुश्किल होगा कि स्क्रीन के सामने 16 साल का बच्चा है या 40 साल का पिता।
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    शिक्षा और डिजिटल साक्षरता: ग्रामीण भारत में कई माता-पिता खुद इंटरनेट का इस्तेमाल करना नहीं जानते। वे 'पैरेंटल कंट्रोल' जैसे टूल्स को कैसे मैनेज करेंगे, यह एक बड़ा सवाल है।
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क्यों जरूरी है ऐसा सख्त कदम? (विशेषज्ञों की राय)

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मनोवैज्ञानिकों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का सुझाव वक्त की मांग है।
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    मानसिक स्वास्थ्य संकट: सोशल मीडिया पर 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' की दौड़ बच्चों में डिप्रेशन, एंजाइटी (Anxiety) और हीन भावना पैदा कर रही है।
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    साइबर बुलिंग और ग्रूमिंग: ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया के जरिए पीडोफाइल्स (बच्चों का यौन शोषण करने वाले) बच्चों से दोस्ती करते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं।
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    डोपामाइन एडिक्शन: सोशल मीडिया का एल्गोरिदम ऐसा बनाया गया है कि बच्चे (और बड़े भी) इसके लती हो जाते हैं। इससे उनकी पढ़ाई और नींद पर बुरा असर पड़ता है।
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NCPCR और सरकार का रुख

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हालांकि केंद्र सरकार ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक कानून पेश नहीं किया है, लेकिन हाल के दिनों में सरकार ने भी सोशल मीडिया कंपनियों पर नकेल कसने के संकेत दिए हैं। डिजिटल इंडिया एक्ट (Digital India Act) के ड्राफ्ट में भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा (Online Safety) को लेकर कड़े प्रावधानों की बात कही गई है।
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हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब उम्मीद है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय (MeitY) इस दिशा में कोई ठोस गाइडलाइन जारी कर सकते हैं।
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अभिभावकों के लिए सलाह: जब तक कानून नहीं, तब तक क्या करें?

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हाईकोर्ट ने जब तक कानून नहीं बनता, तब तक जागरूकता पर जोर दिया है। अभिभावक अभी ये कदम उठा सकते हैं:
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    फैमिली लिंक ऐप्स: गूगल का 'Family Link' ऐप या अन्य पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स का इस्तेमाल करें।
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    खुला संवाद: बच्चों से सोशल मीडिया के खतरों पर खुलकर बात करें।
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    स्क्रीन टाइम: घर में स्क्रीन टाइम के नियम बनाएं।
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    चेकिंग: समय-समय पर बच्चों की ब्राउज़िंग हिस्ट्री और चैट चेक करते रहें (लेकिन उनकी निजता का हनन किए बिना विश्वास में लेकर)।
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एक सुरक्षित बचपन की ओर

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मद्रास हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भारत में डिजिटल नियमों के भविष्य की दिशा तय कर सकती है। ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया को एक रास्ता दिखाया है कि तकनीकी दिग्गजों (Big Tech) के मुनाफे से ज्यादा जरूरी बच्चों का बचपन है। अब देखना यह होगा कि भारत सरकार इस न्यायिक सुझाव को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या हम जल्द ही भारत में भी बच्चों के लिए एक 'डिजिटल लक्ष्मण रेखा' खिंचती देखेंगे।