खबरीलाल डेस्क
NEET पेपर लीक मामले में Gen-Z (जेन-जेड) के उग्र प्रदर्शन के बाद अब देश में शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए एक नया आंदोलन आकार ले रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने अब 'जेन-अल्फा' (Gen Alpha) के अधिकारों के लिए बिगुल फूंक दिया है।
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देश के भविष्य यानी हमारे स्कूली बच्चों के लिए एक मजबूत और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली की मांग करते हुए अभिजीत दीपके ने 'स्कूल ठीक करो' (School Theek Karo) नामक एक व्यापक देशव्यापी अभियान की शुरुआत की है। यह अभियान न केवल सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत पर सवाल उठा रहा है, बल्कि निजी स्कूलों द्वारा की जा रही खुली लूट पर भी नकेल कसने की पुरजोर वकालत कर रहा है।READ ALSO:-देशभर में कुदरत का प्रहार: यूपी में नदियां उफान पर, अरुणाचल में बादल फटा; जानिए पूर्वी और पश्चिमी यूपी के मौसम का ताजा हाल
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स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर पैतृक गांव से शंखनाद

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शनिवार को 78वें स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक मौके पर, जहाँ पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था, वहीं अभिजीत दीपके ने एक अलग ही तरह की आजादी—'अशिक्षा और बदहाल व्यवस्था से आजादी'—का संकल्प लिया। उन्होंने महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में स्थित अपने पैतृक गांव संतुक पिंपरी से इस बड़े अभियान का आधिकारिक तौर पर शुभारंभ किया।
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ध्वजारोहण समारोह में हिस्सा लेने के तुरंत बाद दीपके एक स्थानीय जिला परिषद स्कूल के निरीक्षण के लिए पहुंचे। वहां उन्होंने जो मंजर देखा, वह देश के विकास के दावों की पोल खोलने के लिए काफी था। यह अभियान यहीं से एक स्थानीय मुद्दे से उठकर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है।
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Gen-Z से Gen-Alpha तक: क्यों बदला दीपके का फोकस?

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यह समझना बेहद जरूरी है कि यह अभियान किस पीढ़ी के लिए लड़ा जा रहा है:
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    Gen-Z (1997-2012): यह वो पीढ़ी है जो इंटरनेट की दुनिया में बड़ी हुई। NEET पेपर लीक जैसे घोटालों के खिलाफ इस पीढ़ी ने हाल ही में अपनी ताकत दिखाई है, जिसके दबाव में पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।
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    Gen-Alpha (2013-2025): यह वह नई पीढ़ी है जो पूरी तरह से स्मार्टफोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टैबलेट की डिजिटल दुनिया में जन्म ले रही है। आज जो बच्चे प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में पढ़ रहे हैं, वे इसी श्रेणी में आते हैं।
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दीपके का तर्क स्पष्ट है: यदि हम इस AI-संचालित पीढ़ी को पीने का साफ पानी और बैठने के लिए बेंच तक नहीं दे सकते, तो हम विश्व गुरु बनने का सपना कैसे देख सकते हैं?
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जमीनी हकीकत: आजादी के 80 साल बाद भी प्यासे हैं स्कूल

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दीपके का संतुक पिंपरी स्कूल का दौरा सरकारी तंत्र पर एक करारा तमाचा था। उन्होंने स्कूल का निरीक्षण करने के बाद भारी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, "आजादी के 80 साल बाद भी अगर सरकारी स्कूलों के शौचालयों में पानी जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो हमारा देश कैसे विकसित होगा?"
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निरीक्षण के दौरान सामने आईं चौंकाने वाली खामियां:

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    सुविधाओं का घोर अभाव: स्कूल में छात्रों की संख्या अधिक है, लेकिन बैठने के लिए मात्र 4 बेंच उपलब्ध हैं। बाकी बच्चों को जमीन पर बैठने को मजबूर होना पड़ता है।
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    व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य: स्कूल की खिड़कियां टूटी हुई पाई गईं। हद तो तब हो गई जब यह पता चला कि इन टूटी खिड़कियों को छिपाने के लिए उन्हें महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बैनरों से ढका गया था। दीपके ने इसे "व्यवस्था पर सबसे बड़ा और कड़वा व्यंग्य" करार दिया।
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    दिखावे की सफाई: दीपके ने यह भी दावा किया कि उनके गांव के स्कूल का शौचालय उनके पहुँचने से ठीक कुछ मिनट पहले ही आनन-फानन में साफ किया गया था, जो प्रशासन के डर और लीपापोती को दर्शाता है।
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डेटा और तकनीक का इस्तेमाल: 'चेकलिस्ट फॉर्म' से बनेगी देशव्यापी रिपोर्ट

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यह आंदोलन केवल भाषणों तक सीमित नहीं है। CJP ने इसे एक डेटा-ड्रिवन (Data-Driven) अभियान बनाने की योजना बनाई है। इसके लिए एक विशेष 'चेकलिस्ट फॉर्म' तैयार किया गया है। इस फॉर्म के माध्यम से महाराष्ट्र और पूरे देश के स्कूलों में उपलब्ध बुनियादी ढांचे (पानी, शौचालय, शिक्षक, बेंच, इमारत की स्थिति) का सटीक डेटा एकत्र किया जाएगा। इस जमीनी डेटा के संकलन के बाद सरकार के सामने एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाएगी, जिससे कोई भी अधिकारी कागजी आंकड़ों के पीछे छिप न सके।
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प्राइवेट स्कूलों की लूट और 94,000 सरकारी स्कूलों पर ताला: एक गहरी साजिश?

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दीपके ने इस अभियान के जरिए सीधे केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा नीतियों पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार शिक्षा बजट में लगातार कटौती कर रही है। उनके द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार:
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    पिछले 10 सालों में देशभर में 94,000 से अधिक सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया गया है।
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    दीपके ने तीखा सवाल किया, "एक तरफ हमारी आबादी बढ़ रही है, हमें और स्कूल खोलने चाहिए, लेकिन स्कूल बंद करके देश को मजबूत कैसे बनाया जा सकता है?"
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उन्होंने स्पष्ट आरोप लगाया कि सरकारी स्कूलों को जानबूझकर खस्ताहाल किया जा रहा है ताकि प्राइवेट स्कूलों की लॉबी को फायदा पहुँचाया जा सके। आज एक आम मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार को अपने बच्चों की सामान्य शिक्षा के लिए 1 से 1.5 लाख रुपये तक की भारी-भरकम फीस चुकानी पड़ रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए दीपके ने निजी स्कूलों की फीस पर एक सख्त सीमा (Fee Cap) निर्धारित करने की बड़ी मांग उठाई है।
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डिजिटल युग और छात्रों का विद्रोह: वीडियो बनाकर खोल रहे पोल

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आज का छात्र जागरूक है। दीपके ने बताया कि अब छात्र चुपचाप अन्याय नहीं सह रहे हैं। गांव-देहात के कई छात्र अब खुद वीडियो बना रहे हैं और सोशल मीडिया पर दिखा रहे हैं कि उनके स्कूल पहुंचने के लिए ठीक सड़कें तक उपलब्ध नहीं हैं। जब बच्चे खुद आगे आकर सरकारी दावों की पोल खोल रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अगर सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधर जाए, तो कोई भी माता-पिता कर्ज लेकर अपने बच्चों को निजी स्कूलों में नहीं भेजेगा।
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शिक्षा के बाद स्वास्थ्य: सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा पर भी होगा हल्ला बोल

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'स्कूल ठीक करो' अभियान के साथ-साथ अभिजीत दीपके ने एक और बड़े जन-आंदोलन की चेतावनी दे दी है। सीजेपी जल्द ही देश के सार्वजनिक अस्पतालों की खस्ताहाल स्थिति को लेकर भी सड़कों पर उतरेगी। अस्पतालों की बदहाली का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज गरीबों को सरकारी अस्पतालों में:
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    बिस्तर न मिलने के कारण फर्श पर सोना पड़ता है।
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    जीवन रक्षक सर्जरी के लिए महीनों का लंबा इंतजार करना पड़ता है।
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    एक साधारण सीटी (CT) स्कैन कराने के लिए भी मरीजों को एक-एक सप्ताह तक लाइन में लगना पड़ता है।
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क्या 'स्कूल ठीक करो' अभियान लाएगा बदलाव?

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अभिजीत दीपके का यह अभियान केवल शिक्षा जगत के लिए एक चेतावनी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम को आईना दिखाने का एक साहसिक प्रयास है। Gen-Z ने अपनी ताकत से यह साबित कर दिया है कि युवा वर्ग जब अधिकारों के लिए खड़ा होता है, तो सत्ता के सिंहासन हिल जाते हैं। अब देखना यह होगा कि Gen-Alpha के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए शुरू किया गया 'स्कूल ठीक करो' अभियान पूरे देश में कितनी जल्दी आग पकड़ता है और क्या सरकारें निजी स्कूलों की फीस पर लगाम लगाने का कोई ठोस कदम उठाएंगी?
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देश का हर वो माता-पिता जो अपने बच्चों की फीस और स्कूल की बदहाली से परेशान है, अब इस कैंपेन को उम्मीद की किरण के रूप में देख रहा है।