सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम विपणन कंपनियां (OMCs) पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी न करने के कारण हो रहे भारी आर्थिक घाटे की भरपाई के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही हैं। खबर है कि ये कंपनियां रिफाइनरियों को पेट्रोल और डीजल की आयातित दरों से कम कीमत देने के विकल्प पर विचार कर रही हैं। आसान शब्दों में कहें तो पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रखने के लिए रिफाइनरी कीमतों पर 'रोक' लगाने की तैयारी चल रही है।Read also:-यूपी में मौसम का विकराल यू-टर्न, 15 शहरों में आंधी-पानी का तांडव, हाथरस में ढही कोल्ड स्टोरेज की दीवार; CM योगी ने संभाला मोर्चा
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इस अहम कदम का सीधा और सबसे बुरा असर एमआरपीएल (MRPL), सीपीसीएल (CPCL) और एचएमएल (HMEL) जैसी एकल रिफाइनरी (Standalone Refinery) कंपनियों पर पड़ना तय माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहे भारी तनाव और युद्ध की स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही हैं। संकट से पहले जो कच्चा तेल लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, वह अब उछलकर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। इसके बावजूद, भारत में आम जनता को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। इस कारण पेट्रोलियम विपणन कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) को कच्चे तेल की इस बढ़ी हुई कीमत का पूरा बोझ खुद उठाना पड़ रहा है।
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रिफाइनरी हस्तांतरण शुल्क (RTP) क्या है और इस पर रोक का क्या अर्थ है?
\r\n\r\nमामले की गहरी जानकारी रखने वाले सूत्रों ने बताया कि OMCs अब रिफाइनरी हस्तांतरण शुल्क (Refinery Transfer Price - RTP) पर रोक लगाने (Cap) या उस पर एक निश्चित छूट तय करने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रही हैं।
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आरटीपी (RTP) वह आंतरिक और आधिकारिक कीमत होती है, जिस पर रिफाइनरियां अपने विपणन खंड (Marketing Division) को ईंधन बेचती हैं। यह कीमत आमतौर पर आयात-समता लागत (Import Parity Price) के आधार पर तय होती है। इसका मतलब है कि अगर भारत बाहर से पेट्रोल-डीजल आयात करता, तो उसकी जो कीमत बंदरगाह पर होती, वही कीमत रिफाइनरियों को दी जाती है।
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लेकिन मौजूदा प्रस्तावित कदम का मुख्य मकसद रिफाइनरियों को पेट्रोल और डीजल की इस आयात-समता लागत से कम भुगतान करना है। यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं, तो इस प्रस्तावित कदम के लागू होने से रिफाइनरियां कच्चे तेल की बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ RTP के जरिये विपणन कंपनियों पर नहीं डाल पाएंगी। उन्हें इस प्रभाव और आर्थिक नुकसान का एक बड़ा हिस्सा खुद वहन करना होगा।
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MRPL, CPCL और HMEL पर क्यों पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
\r\n\r\nभारत के पेट्रोलियम उद्योग में मुख्य रूप से दो तरह की कंपनियां काम करती हैं—एकीकृत कंपनियां (Integrated Companies) और एकल रिफाइनरियां (Standalone Refineries)।
\r\n\r\nसूत्रों के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (HPCL) जैसी एकीकृत कंपनियां रिफाइनिंग (तेल साफ करने) और विपणन (तेल बेचने) दोनों क्षेत्रों में काम करती हैं। इसलिए, अगर उन्हें विपणन में घाटा होता है, तो वे अपने रिफाइनिंग मार्जिन से उस घाटे की कुछ हद तक भरपाई कर सकती हैं।
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दूसरी ओर, मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL), चेन्नई पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (CPCL) और एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी लिमिटेड (HMEL) जैसी एकल रिफाइनरियों का खुदरा बाजार (Retail Market) में कोई खास दखल नहीं है। उनके पास पेट्रोल पंपों का बड़ा नेटवर्क नहीं है। ये कंपनियां अपना अधिकांश उत्पादन इन्हीं तीन बड़ी OMCs को बेचती हैं। ऐसे में, जब OMCs रिफाइनरी कीमतों पर रोक लगाएंगी, तो इन एकल रिफाइनरियों के पास अपने उत्पाद को घाटे में बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इसका सबसे ज्यादा और सीधा असर उनके ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) और मुनाफे पर पड़ेगा।
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निजी रिफाइनरियों पर भी मंडरा रहा है खतरा
\r\n\r\nयह मामला केवल सरकारी रिफाइनरियों तक सीमित नहीं है। सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि RTP पर रोक या छूट का यह नियम निजी रिफाइनरियों पर भी लागू किया जाता है, तो नायरा एनर्जी (Nayara Energy) और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Reliance Industries Limited - RIL) जैसी दिग्गज रिफाइनरी कंपनियां भी इससे अछूती नहीं रहेंगी।
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ये दोनों निजी कंपनियां भारत में भारी मात्रा में कच्चे तेल को रिफाइन करती हैं और अपने उत्पादन का एक बहुत बड़ा हिस्सा घरेलू बाजार में OMCs को बेचती हैं। यदि उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले कम RTP मिलता है, तो उनके राजस्व में भी बड़ी सेंध लग सकती है। हालांकि, इन कंपनियों के पास अपने उत्पादों को निर्यात (Export) करने का विकल्प भी होता है, लेकिन घरेलू मांग को पूरा करने की सरकारी शर्तों के कारण उन्हें भी इस नीतिगत बदलाव का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
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पश्चिम एशिया का संकट और 100 डॉलर के पार कच्चा तेल
\r\n\r\nपेट्रोलियम क्षेत्र में इस उथल-पुथल की मुख्य वजह पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहा गंभीर भू-राजनीतिक संकट है। हाल ही में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जहां से दुनिया के कच्चे तेल का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है, वहां व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
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इस अस्थिरता के कारण ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) और डब्ल्यूटीआई क्रूड (WTI Crude) की कीमतों में 20% से अधिक का उछाल देखने को मिला है, जिससे कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गई हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85% हिस्सा आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में कोई भी उछाल सीधे तौर पर भारत के आयात बिल और पेट्रोलियम कंपनियों के बही-खातों पर असर डालता है।
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भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर क्यों हैं?
\r\n\r\nअंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आग लगी हुई है, लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें मई 2022 से लगभग स्थिर बनी हुई हैं। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 94.77 रुपये और डीजल की कीमत 87.67 रुपये प्रति लीटर के आसपास बनी हुई है।
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सरकार और तेल विपणन कंपनियों ने आम जनता को महंगाई से बचाने के लिए यह रणनीतिक फैसला लिया है। यदि कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ सीधे जनता पर डाल दिया जाए, तो इससे माल ढुलाई महंगी हो जाएगी, जिससे खाने-पीने की चीजों से लेकर हर जरूरी वस्तु की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रण में रखने के लिए OMCs फिलहाल यह घाटा खुद सह रही हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर के आसपास थीं, तब इन कंपनियों ने अच्छा मुनाफा कमाया था। सरकार का तर्क है कि उन दिनों कमाए गए मुनाफे का इस्तेमाल अब जनता को राहत देने के लिए किया जाना चाहिए।
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तेल कंपनियों की वित्तीय सेहत और आगे का रास्ता
\r\n\r\nOMCs के लिए यह स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है। जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा हो रहा है, इन कंपनियों का 'अंडर-रिकवरी' (Under-recovery) यानी घाटा बढ़ता जा रहा है। इसी घाटे को सीमित करने के लिए रिफाइनरी कीमतों पर रोक लगाने का यह मास्टरप्लान तैयार किया जा रहा है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम कुछ समय के लिए OMCs को राहत जरूर दे सकता है, लेकिन इससे MRPL और CPCL जैसी कंपनियों के शेयरों और उनके भविष्य के निवेश प्लान पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इन रिफाइनरियों को अपनी तकनीक को अपग्रेड करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए भारी पूंजी की आवश्यकता होती है। मुनाफे में कमी के कारण इनके विस्तार की योजनाएं खटाई में पड़ सकती हैं।
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इसके अलावा, यदि पश्चिम एशिया का संकट जल्दी नहीं सुलझता है और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार ही बनी रहती हैं, तो सरकार को अंतिम विकल्प के तौर पर या तो खुदरा कीमतों में मामूली बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है, या फिर तेल कंपनियों को सब्सिडी के रूप में आर्थिक पैकेज देना पड़ सकता है। हालांकि, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्पष्ट किया है कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है और सरकार उपभोक्ताओं को वैश्विक झटकों से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है।
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत के पेट्रोलियम सेक्टर के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। आम जनता को महंगाई की मार से बचाने और पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रखने के लिए OMCs अब जो रिफाइनरी कीमतों पर रोक लगाने की तैयारी कर रही हैं, वह एक तात्कालिक समाधान तो हो सकता है, लेकिन यह रिफाइनिंग सेक्टर के लिए नुकसानदेह साबित होगा। इस फैसले से MRPL, CPCL और HMEL जैसी कंपनियों का मार्जिन बुरी तरह सिकुड़ जाएगा। सरकार और तेल कंपनियों को एक ऐसा संतुलित रास्ता खोजना होगा, जिससे न तो आम उपभोक्ता पर महंगाई का बोझ पड़े और न ही देश की रिफाइनरियों को इतना आर्थिक नुकसान हो कि उनके अस्तित्व पर ही संकट आ जाए। कच्चे तेल के बाजार की अनिश्चितताओं के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस जटिल चुनौती से कैसे पार पाती है।