नई दिल्ली (बिजनेस/इकोनॉमी डेस्क): दुनिया अभी पिछली आर्थिक मंदी और महंगाई के झटके से पूरी तरह उबर भी नहीं पाई थी कि मध्य पूर्व से आ रही युद्ध की खबरों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनें फिर से बढ़ा दी हैं। इस पूरे तनाव का सबसे बड़ा और सीधा असर अगर कहीं दिख रहा है, तो वह है 'कच्चे तेल' (Crude Oil) का बाजार।READ ALSO:-बिजनौर में खौफनाक हादसा! बंदर की एक छलांग ने उजाड़ दिया पूरा हंसता-खेलता परिवार, बिजली का तार गिरने से युवक की तड़प-तड़प कर दर्दनाक मौत
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक भीषण आग लग गई है। ब्रेंट क्रूड ऑयल का भाव तेजी से उछाल मारते हुए 100 डॉलर प्रति बैरल ($100/Barrel) के खतरनाक और मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब पहुंच गया है। ऊर्जा बाजार के जानकारों और आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व के हालात जल्द शांत नहीं हुए, तो यह आंकड़ा 100 डॉलर को भी पार कर जाएगा, जो पूरी दुनिया, विशेषकर भारत के लिए किसी 'आर्थिक सुनामी' से कम नहीं होगा।
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आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर कच्चे तेल में यह 'आग' क्यों लगी है और 100 डॉलर के क्रूड ऑयल का सीधा असर भारत के आम आदमी की जेब, रसोई और अर्थव्यवस्था पर कैसे पड़ेगा।
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क्यों उबल रहा है कच्चा तेल? क्या है मिडिल-ईस्ट का कनेक्शन?
\r\n\r\nकच्चे तेल की कीमतों का सीधा संबंध दुनिया की भू-राजनीतिक (Geopolitical) स्थिति से होता है। वर्तमान में कीमतों में आ रहे इस बेतहाशा उछाल के पीछे मुख्य कारण हैं:
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- \r\n मध्य पूर्व का सैन्य तनाव: मध्य पूर्व (Middle East) दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक और निर्यातक क्षेत्र है। हाल के दिनों में वहां सैन्य संघर्ष और तनाव चरम पर पहुंच गया है। इजरायल और पड़ोसी देशों/गुटों के बीच बढ़ते संघर्ष ने निवेशकों के मन में डर पैदा कर दिया है।\r\n \r\n
- \r\n सप्लाई चेन बाधित होने का डर: ऊर्जा विशेषज्ञों को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि अगर यह युद्ध और फैलता है, तो 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) जैसे प्रमुख समुद्री मार्ग बाधित हो सकते हैं। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी मार्ग से होकर गुजरता है। अगर यहाँ सप्लाई रुकी, तो तेल के दाम रातों-रात आसमान पर पहुंच जाएंगे।\r\n \r\n
- \r\n फियर प्रीमियम (Fear Premium): बाजार में असल कमी से ज्यादा 'डर' का माहौल है। निवेशकों को लग रहा है कि भविष्य में तेल नहीं मिलेगा, इसलिए वे भारी मात्रा में सुरक्षित निवेश कर रहे हैं, जिससे कीमतों में 'फियर प्रीमियम' जुड़ गया है और दाम बेतहाशा भाग रहे हैं।\r\n \r\n
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भारत के लिए यह खतरे की घंटी क्यों है?
\r\n\r\nभारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता (Oil Consumer) देश है। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम अपनी कुल ऊर्जा जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात (Import) करते हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में होने वाली 1 डॉलर की भी बढ़ोतरी भारत के आयात बिल (Import Bill) को हजारों करोड़ रुपये बढ़ा देती है।
\r\n\r\nयदि क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल के पास टिकता है, तो भारत पर निम्नलिखित गंभीर प्रभाव पड़ेंगे:
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1. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगेगा 'करंट'
\r\n\r\nसबसे पहला और सीधा असर आम आदमी के वाहन पर पड़ेगा। पिछले काफी समय से भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर (Stable) हैं। तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने घाटे की भरपाई कर ली थी, लेकिन 100 डॉलर का क्रूड ऑयल इन कंपनियों के मार्जिन को पूरी तरह खत्म कर देगा। अगर सरकार ने एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में कटौती नहीं की, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 5 से 10 रुपये प्रति लीटर तक का भारी उछाल देखने को मिल सकता है।
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2. महंगाई (Inflation) डायन फिर पसारेगी पैर
\r\n\r\nभारत में अधिकांश माल ढुलाई (Logistics) ट्रकों के जरिए होती है, जो डीजल से चलते हैं। डीजल महंगा होने का सीधा मतलब है 'ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट' (Transportation Cost) का बढ़ना। इसका असर यह होगा कि:
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- \r\n सब्जियां, फल और दूध जैसी रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाएंगी।\r\n \r\n
- \r\n एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर के उत्पाद (साबुन, तेल, बिस्किट आदि) के दाम बढ़ जाएंगे।\r\n \r\n
- \r\n कुल मिलाकर खुदरा महंगाई दर (Retail Inflation) जो अभी नियंत्रण में है, वह फिर से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के टॉलरेंस बैंड से बाहर जा सकती है।\r\n \r\n
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3. हवाई सफर और रसोई गैस (LPG) का गणित बिगड़ेगा
\r\n\r\nमहंगे कच्चे तेल का सीधा असर एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF - विमान ईंधन) पर पड़ता है। एयरलाइंस की कुल लागत का 40-50% हिस्सा ATF का होता है। अगर तेल 100 डॉलर पार गया, तो हवाई टिकटें 15 से 20 प्रतिशत तक महंगी हो सकती हैं। साथ ही, व्यावसायिक और घरेलू एलपीजी (LPG) सिलेंडरों के दाम भी बढ़ने का खतरा पैदा हो जाएगा।
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4. रुपया होगा कमजोर, बढ़ेगा चालू खाते का घाटा (CAD)
\r\n\r\nजब कच्चा तेल महंगा होता है, तो भारत को उसे खरीदने के लिए अधिक डॉलर (Dollars) खर्च करने पड़ते हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और भारतीय रुपया (Indian Rupee) कमजोर होकर गिरने लगता है। कमजोर रुपया आयात को और अधिक महंगा बना देता है। इसका सीधा असर सरकार के 'चालू खाते के घाटे' (Current Account Deficit - CAD) पर पड़ता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा रेड सिग्नल है।
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शेयर बाजार (Stock Market) पर असर और निवेशकों की चिंता
\r\n\r\nमहंगे कच्चे तेल की मार शेयर बाजार पर भी स्पष्ट दिखाई देती है। जब तेल 100 डॉलर के करीब पहुंचता है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालने लगते हैं।
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- \r\n प्रभावित होने वाले सेक्टर्स: पेंट कंपनियां (क्योंकि क्रूड उनका कच्चा माल है), टायर कंपनियां, एविएशन, और लॉजिस्टिक्स सेक्टर के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है।\r\n \r\n
- \r\n फायदे वाले सेक्टर्स: इसके विपरीत, ओएनजीसी (ONGC) और ऑयल इंडिया (Oil India) जैसी तेल उत्पादक कंपनियों को महंगे क्रूड से फायदा हो सकता है।\r\n \r\n
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आगे क्या होगा? (The Road Ahead)
\r\n\r\nपूरी दुनिया के केंद्रीय बैंक (Central Banks) इस समय सांस रोककर मध्य पूर्व के हालात पर नजर बनाए हुए हैं। अगर राजनयिक प्रयासों से युद्ध शांत होता है और सप्लाई चेन सुचारू रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है और यह वापस 80-85 डॉलर के दायरे में लौट सकता है।
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लेकिन, अगर इजरायल और अन्य देशों के बीच संघर्ष का दायरा बढ़ता है, तो 100 डॉलर प्रति बैरल का स्तर टूटना तय है। भारत सरकार और आरबीआई (RBI) दोनों के लिए आने वाले कुछ सप्ताह बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। आम आदमी को फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, बल्कि कमर कस लेनी चाहिए।